

नई दिल्ली:
यूरोप के देशों को लेकर भारत में यह मानना रहा है कि वहां सर्दियां काफी अधिक होती हैं. वहां भारत के मुकाबले काफी कूल मौसम रहता है, लेकिन अब तस्वीर बदली दिख रही है. इस साल भारत की गर्मी तो लोग सह ले रहे हैं, लेकिन यूरोप की गर्मी जानें ले रही है. अकेले फ्रांस में ही 2000 मौतों की बात कही जा रही है. इसके अलावा ब्रिटेन, जर्मनी, पोलैंड जैसे देशों का भी बुरा हाल है. 40 डिग्री सेल्सियस तक के तापमान में ही इन देशों में हालात बिगड़ने लगे हैं. ऐसे में सवाल यह है कि क्या यूरोप में ऐसा अचानक हुआ है, जो अगले सालों में नहीं होगा या फिर अब वहां ऐसा ही मौसम भविष्य में भी रहने वाला है.
वर्ल्ड वेदर एट्रिब्यूशन की रिपोर्ट के अनुसाक बीते साल भी गर्मियों में यूरोप के 12 देशों में 2300 मौतें हो गई थीं. संस्था का कहना है कि 2003 में भी यूरोप में काफी गर्मी हुई थी, लेकिन इस बार प्रभाव कहीं ज्यादा है. वहीं विश्व स्वास्थ्य संगठन के यूरोप के डायरेक्टर डॉ. हंस क्लूग का कहना है कि भविष्य में भी यूरोप में गर्मी से मौतें होने के मामले आते रहेंगे. उनका कहना है कि यूरोप में मौसम तेजी से बदल रहा है. इसे लेकर क्लाइमेट एक्सपर्ट्स का कहना है कि शायद यूरोप में इतनी गर्मी अब नॉर्मल बात हो. ऐसा इसलिए क्योंकि यूरोप के औसत न्यूनतम तापमान में 1976 के मुकाबले 3.5 डिग्री सेल्सियस का इजाफा हो चुका है. यही नहीं 2003 की तुलना में ही 2 डिग्री की बढ़ोतरी हो गई है.
कुछ जानकारों का कहना है कि गैस उत्सर्जन का अब असर दिख रहा है. सालों से कार्बन उत्सर्जन को लेकर चिंता जताई जाती रही है, लेकिन अब इसका यूरोप में असर दिखने लगा है. यूरोप के तापमान को लेकर जो आंकड़े आए हैं, उससे पता चलता है कि महाद्वीप के करीब 95 फीसदी हिस्से में तापमान औसत से अधिक है.
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हालात ऐसे हैं कि यह समस्या तेजी से बढ़ रही है. इसके अलावा यूरोप के मकानों की डिजाइन और तकनीक भी गर्मी के संकट को बढ़ा रही है. यूरोप में मकानों को सर्दियों से बचाव के हिसाब से तैयार किया जा रहा है. ऐसी स्थिति में अब जब गर्मी 40 डिग्री वाली हो गई है तो वे मकान एक मुश्किल बन रहे हैं. ऐसे में तय है कि जब तक बदले हुए मौसम के हिसाब से यूरोप खुद को तैयार नहीं करता है, तब तक यह परेशानी उसे साल दर साल झेलनी पड़ सकती है.





