

अमेरिका-ईरान युद्ध के बाद स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को लेकर मिडिल ईस्ट में एक बड़ा यू-टर्न देखने को मिल रहा है. युद्ध के दौरान इस वैश्विक व्यापारिक मार्ग की नाकेबंदी करने के बाद, अब ईरान इसे पूरी तरह भुनाने यानी इससे कमाई करने की तैयारी में है. इस खेल में नया मोड़ तब आया जब अमेरिकी आपत्तियों को दरकिनार करते हुए ओमान ने जहाजों से ‘सर्विस फीस’ वसूलने का एक औपचारिक प्रस्ताव तैयार किया है. हालांकि, सवाल यह उठ रहा है कि क्या हमेशा तटस्थ रहने वाला ओमान अब पूरी तरह ईरान के पाले में खड़ा हो गया है? या फिर उसकी रणनीति कुछ और है?
न्यूयॉर्क टाइम्स ने कुछ राजनयिक सूत्रों के हवाले से बताया है कि ओमान ने यह प्रस्ताव अमेरिका और उसके पश्चिमी सहयोगियों को भेजा है. 28 फरवरी को ईरान पर अमेरिकी-इजरायली हमले के बाद यह पहला मौका है जब खाड़ी क्षेत्र में समीकरण इस कदर बदलते दिख रहे हैं. युद्ध से पहले तक इस अंतरराष्ट्रीय समुद्री मार्ग से तेल और गैस ले जाने वाले जहाजों को कोई टैक्स या फीस नहीं देनी पड़ती थी. लेकिन अब ओमान और ईरान मिलकर यहां से गुजरने वाले जहाजों से वसूली का नया फ्रेमवर्क तैयार कर रहे हैं. इस नए फ्रेमवर्क से ट्रंप प्रशासन की रातों की नींद उड़ जाएगी.
ओमान ने चल दी दोहरी चाल
इस पूरे घटनाक्रम पर जहां ईरानी अधिकारी इसे अनिवार्य वसूली बता रहे हैं, वहीं ओमान के रुख ने भ्रम की स्थिति पैदा कर दी थी. लेकिन इस बीच ओमान के विदेश मंत्री सैयद बद्र अल बुसैदी ने फ्रांस दौरे के दौरान साफ किया कि ओमान किसी भी कीमत पर अंतरराष्ट्रीय कानूनों और ‘UNCLOS’ का उल्लंघन नहीं करेगा. उन्होंने साफ शब्दों में कहा कि ओमान होर्मुज से गुजरने वाले जहाजों पर कोई ‘पारगमन शुल्क’ या टोल लगाने के पक्ष में नहीं है, क्योंकि अंतरराष्ट्रीय कानून में इसकी मनाही है.
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तो फिर ओमान का यह ‘फी प्लान’ आखिर है क्या? दरअसल, ओमान इस पूरे मामले में ‘मलक्का और सिंगापुर जलडमरूमध्य’ का मॉडल अपनाना चाहता है. वहां एक प्राइवेट फाउंडेशन के जरिए सुरक्षित नेविगेशन के लिए जहाजों से स्वैच्छिक योगदान लिया जाता है.
मस्कट में हाई-लेवल मीटिंग
इस बीच, खाड़ी में तनाव तब और बढ़ गया जब ईरान के उप विदेश मंत्री काजेम गरीबाबादी ने सोमवार को चेतावनी भरे लहजे में कहा कि तेहरान की प्राथमिकता ओमान के साथ समझौता करने की है. लेकिन अगर ओमान इसके लिए साझा फ्रेमवर्क पर राजी नहीं हुआ, तो ईरान इस रास्ते पर अकेले ही आगे बढ़ जाएगा. इस दबाव के बीच, दोनों देशों के बीच 29 जून को मस्कट में एक अत्यंत महत्वपूर्ण बैठक हुई है. इसमें इस नए मैनेजमेंट और नेविगेशन ड्यूज के स्केल पर गहन चर्चा की गई.
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खाड़ी देशों को भरोसे में ले रहा ओमान
अमेरिका और ईरान के बीच संतुलन बनाना ओमान के लिए हमेशा से टेढ़ी खीर रहा है. खुद को विवादों से दूर रखने के लिए ओमान अब इस मुद्दे पर अन्य खाड़ी सहयोग परिषद (GCC) देशों को भी भरोसे में ले रहा है.
वहीं, युद्ध के बाद स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में बिछाई गई बारूदी सुरंगों को हटाने का मुद्दा भी फंसा हुआ है. ओमान ने साफ कर दिया है कि अमेरिका के साथ हुए 14 सूत्रीय समझौते के तहत सुरंगों को साफ करने की मुख्य जिम्मेदारी ईरान की है. ओमान ने यह भी स्पष्ट किया है कि वह यूरोपीय नौसैनिक बल को तब तक इस क्षेत्र में ऑपरेशन की अनुमति नहीं देगा, जब तक ईरान इसके लिए तैयार न हो. साफ है कि ओमान ईरान के साथ आकर भी पूरी तरह अमेरिका को नाराज नहीं करना चाहता, बल्कि वह इस संकट को एक बिजनेस मॉडल में बदलने की कूटनीति पर चल रहा है.
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