
कोलकाता:
पश्चिम बंग दिवस के आयोजन में पीएम नरेंद्र मोदी बंगाल के तारकेश्वर पहुंचे हैं. मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने इस मौके पर संबोधित करते हुए पीएम मोदी के दौरे को बंगाल की अस्मिता से जोड़ा है. उन्होंने कहा कि 1947 के बाद पहली बार यहां इस तरह का आयोजन हो रहा है. 1947 में यहां श्यामा प्रसाद मुखर्जी के नेतृत्व में हिंदू महासभा के बैनर तले एक आयोजन हुआ था. अब 79 साल बाद पीएम नरेंद्र मोदी यहां पहुंचे हैं तो एक बार फिर से भारत विभाजन, बांग्लादेश और बंगाल अस्मिता वाली बहस तेज हो गई है. बता दें कि भारत विभाजन के दौरान पश्चिम बंगाल के विधायकों ने भारत के पक्ष में रहने के लिए वोट दिया था और फिर बंगाल के दो हिस्से हुए. एक हिस्सा पूर्वी पाकिस्तान के रूप में सामने आया, जो 1971 में बांग्लादेश बना और एक पश्चिम बंगाल राज्य है.
पीएम नरेंद्र अब जब पश्चिम बंग दिवस के मौके पर बंगाल पहुंचे हैं तो करीब 80 साल पुरानी बातें फिर से याद की जा रही हैं. भाजपा ने इस आयोजन को बंगाल की अस्मिता से जोड़ा है, जिसकी बात अकसर ममता बनर्जी करती रही हैं. लेकिन अब भाजपा ने बंगाल की अस्मिता को राष्ट्रवाद से सीधे तौर पर जोड़ा है. पश्चिम बंग दिवस को पश्चिम बंगाल की स्थापना के दिन के तौर पर मनाया जाता है. देश के अन्य राज्यों में भी स्थापना दिवस के आयोजन होते हैं, लेकिन बंगाल में यह बंटवारे की याद से भी जुड़ा है. 20 जून ही वह दिन था, जब अविभाजित बंगाल के पश्चिमी हिस्से के विधायकों ने भारत के साथ रहने के लिए मतदान किया था.
भाजपा ने पुराने इतिहास को फिर जिंदा करने की कोशिश की
अब भाजपा की सरकार राज्य में है तो उसने पुराने इतिहास को फिर से जिंदा करने की कोशिश की है. इस आयोजन को लेकर भाजपा सांसद राहुल सिन्हा ने कहा कि कांग्रेस, सीपीएम और टीएमसी इस इतिहास को छिपाते रहे हैं. ऐसा इसलिए क्योंकि इसमें श्यामा प्रसाद मुखर्जी की अहम भूमिका थी. पश्चिम बंगाल के गठन में राष्ट्रवादी आंदोलन की भूमिका थी और उसे ये लोग छिपाने की कोशिश करते रहे हैं. दरअसल बंगाल की कहानी में इतिहासकार अकसर 1906 के शिमला डेपुटेशन को एक अहम मोड़ मानते हैं, जब आगा खान की अगुवाई में मुस्लिम नेताओं ने वायसराय लॉर्ड मिंटो से अलग चुनाव क्षेत्रों की मांग की थी.
कैसे बढ़ता गया तनाव और बंट गया बंगाल, 20 जून को क्या हुआ था
इस मांग को बाद में 1909 के इंडियन काउंसिल एक्ट में शामिल कर लिया गया, जिससे सांप्रदायिक प्रतिनिधित्व की व्यवस्था जुड़ गई. उसी साल ढाका में ऑल इंडिया मुस्लिम लीग का गठन हुआ और उसके बाद सांप्रदायिक राजनीति के बढ़ने से धीरे-धीरे बंगाल का राजनीतिक माहौल बदल गया. 1940 के दशक तक पाकिस्तान की मांग वाले आंदोलन ने जोर पकड़ लिया था. विशेष तौर पर बंगाल जैसे मुस्लिम-बहुल प्रांतों में ऐसा हुआ था. अगस्त 1946 में मुस्लिम लीग के ‘डायरेक्ट एक्शन डे’ के आह्वान के बाद हुई सांप्रदायिक हिंसा और उसी साल बाद में हुए नोआखली दंगों ने बंगाल में राजनीतिक सोच पर गहरा असर डाला. अंत में हालात ऐसे बदले कि भारत का विभाजन हुआ और कई राज्य भारत से अलग हुए. बंगाल और पंजाब जैसे अहम सूबे बंट गए और आज भी दोनों राज्यों के लोग इस बंटवारे के दर्द को भूले नहीं हैं.
(इस खबर को एनडीटीवी टीम ने संपादित नहीं किया है. यह सिंडीकेट फीड से सीधे प्रकाशित की गई है।)
लेखक के बारे में
डॉ. सूर्यप्रकाश
Deputy Editor
और पढ़ें



