

नई दिल्ली:
अक्तूबर का यह महीना अब तक दिल्ली में आंदोलनों वाला रहा है. राहुल गांधी ने ज्यादातर दिनों सड़क पर उतरकर प्रदर्शन किए हैं. चुनाव आयोग के कामकाज और SIR की प्रक्रिया को लेकर विपक्ष के असंतोष को वह धार देने में जुटे हैं और फ्रंट से लीड कर रहे हैं. इससे पहले जुलाई में भी पीएम आवास के सामने भी वह धरना देकर बैठ गए थे. इस तरह बीते तीन महीनों के घटनाक्रम में राहुल गांधी पहले से काफी मजबूत होकर उभरे हैं. एक तरफ लगातार आयोजनों से उन्होंने कांग्रेस को धार दी है तो वही उनकी अपनी इमेज मेकओवर भी हुई है. खासतौर पर वह विपक्ष के सबसे बड़े नेता बनते दिख रहे हैं, जिसके लिए बीते साल नवंबर तक उन्हें सहयोगी दल ही मिसफिट बता रहे थे.
महाराष्ट्र और हरियाणा के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस की करारी हार के बाद तो कल्याण बनर्जी ने खुलकर कहा था कि अब समय है कि INDIA अलायंस का नेतृत्व ममता बनर्जी जैसी किसी नेता को मिले. फिर बंगाल चुनाव हुए तो मई 2026 में ममता को करारी हार मिली और वह अपनी भी सीट हार गईं. लेकिन राहुल गांधी के लिए यह साल रीलॉन्च या फिर कहें कि इमेज मेकओवर का रहा है. तमिलनाडु में चुनाव हुए तो डीएमके सत्ता से ही बाहर हो गई और टीवीके के साथ कांग्रेस सरकार में बनी हुई है. इस तरह डीएमके गठबंधन से बाहर है. अखिलेश यादव यूपी में सत्ता के लिए संघर्ष कर रहे हैं. शरद पवार खुद पार्टी तक को बचाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं.
उद्धव ठाकरे और उमर अब्दुल्ला जैसे नेता भी राहुल गांधी के मुकाबले किसी स्थिति में नहीं हैं. ऐसे में राहुल गांधी फिलहाल विपक्ष के टॉप लीडर बनते दिख रहे हैं. ऐसे में सवाल है कि क्या विपक्ष उन्हें नेता के रूप में स्वीकार करेगा. आज सु्प्रीम कोर्ट तक हुए मार्च में जो तस्वीर दिखी, उससे तो ऐसा ही लग रहा है कि राहुल गांधी अब लीडरशिप रोल में हैं और विपक्ष स्वीकार भी कर रहा है. उनके आह्वान पर अखिलेश यादव, तेजस्वी यादव, टीएमसी के नेता, मुस्लिम और तमाम अन्य दलों के लोग जुटे. इसके अलावा सुप्रीम कोर्ट में दाखिल याचिका में भी पहला नाम राहुल गांधी का रहा.
बीते कुछ महीनों से निरंतर जमीन पर दिख रहे राहुल गांधी
जानकार मानते हैं कि राहुल गांधी के तेवर तो काफी दिन से दिख रहे थे, लेकिन जमीन पर उतरकर संघर्ष करने में निरंतरता का अभाव था. अब बीते कुछ महीनों से वह लगातार सक्रिय हैं. ऐसे में कांग्रेसी भी एक दशक से ज्यादा के वक्त के बाद उत्साहित दिख रहे हैं. यह राहुल गांधी के लिए पॉजिटिव है. वह पार्टी में मजबूत हुए हैं और अब समूचे विपक्ष का भी नेता बनने की ओर अग्रसर दिख रहे हैं.





