

‘द लैंसेट’ की एक नई रिपोर्ट में चेतावनी दी गई है कि परमाणु युद्ध और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) का गलत इस्तेमाल इंसानों के भविष्य के लिए खतरा बन सकता है. रिपोर्ट के मुताबिक, इन खतरों की वजह से सन 2100 तक इंसानी आबादी खत्म हो सकती है. हालांकि, ऐसा होने की संभावना कम है.
क्या है रिपोर्ट में
‘लैंसेट कमीशन ऑन 21st सेंचुरी ग्लोबल थ्रेट्स टू हेल्थ’ नाम की इस रिपोर्ट में कहा गया है कि ये समस्याएं आपस में जुड़ी हुई हैं और इनसे मिलकर निपटने की ज़रूरत है. हालांकि, जानकारों का कहना है कि सरकारें अभी भी इन खतरों को कम करने और आने वाली पीढ़ियों की सुरक्षा के लिए कदम उठा सकती हैं. रिपोर्ट में चेतावनी दी गई है कि AI का गलत इस्तेमाल करके ऐसे बायोलॉजिकल हथियार बनाए जा सकते हैं, जिनसे नुकसान हो सकता है. ऐसे हथियार लाखों लोगों की जान खतरे में डाल सकते हैं और बहुत गंभीर स्थिति में इंसानों के अस्तित्व के लिए खतरा बन सकते हैं. कमीशन के को-चेयर और यूनिवर्सिटी ऑफ़ वॉशिंगटन के ‘इंस्टीट्यूट फ़ॉर हेल्थ मेट्रिक्स एंड इवैल्यूएशन’ के डायरेक्टर प्रोफ़ेसर क्रिस्टोफ़र मरे ने कहा, “आज नेता जो फ़ैसले लेंगे, वे आने वाली पीढ़ी की सेहत और भलाई तय करेंगे.”परमाणु युद्ध से भी इंसानियत को खतरा हो सकता है. इससे बड़ी मात्रा में कण ऊपरी वायुमंडल में जा सकते हैं, जिससे सूरज की रोशनी रुक सकती है और खाने-पीने की चीज़ों के उत्पादन पर असर पड़ सकता है. इससे बड़े पैमाने पर अकाल पड़ सकता है और इंसानों के अस्तित्व पर खतरा मंडरा सकता है.
15 और बड़े खतरे
‘द लैंसेट’ में रिपोर्ट के साथ छपे एक संपादकीय में यह भी चेतावनी दी गई है कि अगर ये खतरे सच साबित होते हैं, तो इनसे इंसानियत को बहुत नुकसान हो सकता है. परमाणु युद्ध और AI के गलत इस्तेमाल के अलावा, कमीशन ने इंसानी सेहत के लिए 15 और बड़े खतरों की पहचान की है.इनमें वायु प्रदूषण, जलवायु परिवर्तन, एंटीमाइक्रोबियल रेजिस्टेंस, बच्चों में कुपोषण, पारंपरिक युद्ध, अंतरराष्ट्रीय मदद में कटौती, शराब का ज़्यादा सेवन, हाई ब्लड प्रेशर, आय में असमानता, शिक्षा का कम स्तर, प्राकृतिक महामारी, मोटापा, खराब मानसिक स्वास्थ्य, धूम्रपान और अस्वस्थ बुढ़ापा शामिल हैं.
जलवायु परिवर्तन कितना खतरनाक
रिसर्च करने वालों ने इस बात का अध्ययन किया कि हर खतरे की वजह से बीमारी, विकलांगता या समय से पहले मौत के कारण कितने साल की स्वस्थ ज़िंदगी का नुकसान हो सकता है. असर का अंदाज़ा लगाने के लिए उन्होंने ‘डिसएबिलिटी-एडजस्टेड लाइफ़ इयर्स’ (DALYs) नाम के पैमाने का इस्तेमाल किया. रिपोर्ट में उन खतरों को ‘बड़ी तबाही वाले खतरे’ माना गया है, जिनकी वजह से एक अरब से ज़्यादा स्वस्थ जीवन-वर्षों का नुकसान हो सकता है.आकलन में पाया गया कि अगर दुनिया का तापमान बढ़ता रहा, तो जलवायु परिवर्तन का इंसानी सेहत पर बहुत बुरा असर पड़ सकता है. रिपोर्ट के मुताबिक, ग्लोबल वार्मिंग को 4.4 डिग्री सेल्सियस तक पहुंचने देने के बजाय इसे लगभग 1.8 डिग्री सेल्सियस तक सीमित रखने से 1.89 अरब स्वस्थ जीवन-वर्षों के नुकसान को रोका जा सकता है.
मोटापा-कुपोषण भी बड़े खतरे
आकलन के अनुसार, अंतरराष्ट्रीय स्वास्थ्य सहायता में भारी कटौती या उसके बंद होने से 2100 तक 1.5 अरब तक स्वस्थ जीवन-वर्षों का नुकसान हो सकता है. इनमें से लगभग 70% नुकसान सब-सहारा अफ्रीका में हो सकता है, जहां बच्चों में कुपोषण पहले से ही एक बड़ी चिंता का विषय है. रिपोर्ट में यह भी पाया गया कि सेहत के लिए सबसे बड़े खतरे अलग-अलग इलाकों में अलग-अलग होते हैं. ज़्यादा आय वाले इलाकों में मोटापा और खराब मानसिक स्वास्थ्य जैसी समस्याएं मुख्य चिंता का विषय थीं. कम आय वाले इलाकों में शिक्षा की कमी और बचपन में कुपोषण से स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं हो सकती हैं. मरे ने कहा, “हमने तीन साल पहले यह प्रक्रिया शुरू की थी, यह सोचकर कि तीन बड़े खतरे हैं: संघर्ष, जलवायु और महामारी. लेकिन अब ऐसे कई और खतरे हैं जिनके बारे में हमें चिंता करने की ज़रूरत है. सरकारों को इन अलग-अलग तरह के खतरों का अंदाज़ा लगाने, उन्हें रोकने और उनसे निपटने की तैयारी के लिए कुछ पैसे और स्टाफ़ लगाने की ज़रूरत है.” कमीशन का प्लान है कि वह हर साल अपनी रिपोर्ट को अपडेट करे ताकि मौजूदा खतरों की समीक्षा की जा सके और नए खतरों की पहचान की जा सके.
यह भी पढ़ें-
रूस-यूक्रेन के बीच तत्काल प्रभाव से लागू हुआ एनर्जी सीजफायर… ट्रंप ने किया बड़ा दावा





