धर्म

Jitiya Paran: जितिया खोलने से पहले सूर्य को अर्घ्य क्यों देते हैं?


Jitiya Paran Surya Arghya: सुबह पारण की तैयारी है. घर में खाना बन चुका है. लेकिन मां खाने से पहले जल का लोटा लेकर सूर्य को अर्घ्य देने जाती हैं. जितिया रखने वाले कई घरों में यह परंपरा है. यहीं एक सवाल उठता है. जब व्रत जीमूतवाहन का है, तो इसे खोलने से पहले सूर्य की पूजा क्यों?

इसका जवाब जितिया की पूजा और उससे जुडी लोकपरंपरा में है. जीमूतवाहन की आराधना संतान की रक्षा की कामना से होती है. वहीं, सूर्य को अर्घ्य देकर श्रद्धा और मंगल की प्रार्थना की जाती है. दोनों एक ही व्रत में शामिल हो सकते हैं, लेकिन उनकी भूमिका अलग है. पारण से पहले सूर्य अर्घ्य देने की परंपरा का उल्लेख भी मिलता है.

जीमूतवाहन की पूजा क्यों होती है?

जितिया की प्रसिद्ध कथा में जीमूतवाहन एक नाग की जान बचाने के लिए अपना शरीर गरुड के सामने अर्पित कर देते हैं. वह नाग की मां का दुख देखकर उसकी संतान को बचाने का निर्णय लेते हैं.

कथा में किसी दूसरे की संतान के लिए अपना जीवन दांव पर लगाने का भाव है. इसी कारण संतान की दीर्घायु और रक्षा की कामना के साथ जीमूतवाहन की पूजा की जाती है. कई धार्मिक पत्रिकाओं में जितिया को जीमूतवाहन की आराधना और लोकमान्यताओं से जुडा पर्व बताया गया है.

फिर सूर्य को जल चढाने का क्या अर्थ है?

सूर्य को अर्घ्य देना जितिया तक सीमित नहीं है. हिंदू उपासना में सुबह और शाम सूर्य को जल अर्पित करने की अलग परंपरा है. सूर्य अर्घ्य की प्रार्थना में उन्हें प्रकाश और ऊर्जा का स्रोत मानकर अपना अर्पण स्वीकार करने की विनती की जाती है.

जितिया के पारण में इस पूजा को संतान के मंगल की प्रार्थना से जोडकर समझा जा सकता है. जीमूतवाहन की कथा रक्षा और करुणा का भाव सामने रखती है. सूर्य उपासना में प्रकाश और जीवन को सहारा देने वाली शक्ति के प्रति श्रद्धा व्यक्त होती है. यह परंपरा की भावार्थपरक व्याख्या है. इसे जितिया के किसी विशेष श्लोक का शब्दशः अर्थ समझना सही नहीं होगा.

क्या अर्घ्य देते ही व्रत खोल सकते हैं?

यह सबसे जरूरी फर्क है. सूर्य को अर्घ्य देना और पारण का समय होना, दो अलग बातें हैं.

यदि आपके यहां सूर्य अर्घ्य की परंपरा है, तो उसका पालन करें. लेकिन सिर्फ सूर्योदय हो जाने या जल चढा देने से पारण का समय तय नहीं होता. जितिया में तिथि और मान्य पंचांग के अनुसार पारण का समय देखा जाता है. ‘धर्मायण’ के विवरण में भी निर्धारित पारण समय का पालन करने पर जोर है.

इसलिए किसी पुराने साल की खबर या दूसरे शहर का समय देखकर व्रत न खोलें. अपने स्थान के पंचांग और परिवार में मानी जाने वाली पूजा पद्धति के अनुसार समय स्पष्ट करें.

जितिया की रीति घर और क्षेत्र के अनुसार बदल सकती है. सूर्य अर्घ्य को हर परिवार के लिए एक जैसा अनिवार्य नियम बताना ठीक नहीं. जहां यह परंपरा निभाई जाती है, वहां मां जल अर्पित करते हुए वही कामना करती हैं जिसके लिए उन्होंने व्रत रखा था, संतान का जीवन सुखी और सुरक्षित रहे.

Disclaimer: यहां मुहैया सूचना सिर्फ मान्यताओं और जानकारियों पर आधारित है. यहां यह बताना जरूरी है कि ABPLive.com किसी भी तरह की मान्यता, जानकारी की पुष्टि नहीं करता है. किसी भी जानकारी या मान्यता को अमल में लाने से पहले संबंधित विशेषज्ञ से सलाह लें.



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