
Lord Krishan: भगवान श्रीकृष्ण का व्यक्तित्व जितना रहस्यमयी है, उतना ही बहुमुखी भी. उन्हें धर्म, नीति, राजनीति, संगीत, कला, युद्धकौशल और कूटनीति का अद्भुत ज्ञाता माना जाता है. पौराणिक परंपरा में श्रीकृष्ण की शिक्षा से जुड़ा एक बेहद रोचक प्रसंग मिलता है. कहा जाता है कि उज्जैन स्थित गुरु सांदीपनि के आश्रम में श्रीकृष्ण और बलराम ने शिक्षा ग्रहण की और बाल गोपाल ने 64 कलाओं को 64 दिनों में सीख लिया था.
ये सिर्फ श्रीकृष्ण की प्रतिभा और स्मरण शक्ति को ही नहीं दर्शाता, बल्कि ज्योतिषीय नजरिए से भी इसे खास माना जाता है. वैदिक ज्योतिष में तेज बुद्धि, सीखने की क्षमता, तर्कशक्ति और ज्ञान को समझने के लिए मुख्य रूप से बुध, गुरु और पंचम भाव को देखा जाता है. श्रीकृष्ण के जन्म के समय कुंडली में कई ऐसे योग बताए जाते हैं, जो उनकी अद्भुत प्रतिभा और बहुमुखी व्यक्तित्व से जोड़े जाते हैं.
तेज बुद्धि का कारक है बुध
ज्योतिष में बुध को बुद्धि, वाणी, तर्क, गणना, स्मरण शक्ति और सीखने की क्षमता का कारक ग्रह माना गया है. जब कुंडली में बुध मजबूत स्थिति में हो या शुभ ग्रहों से उसका संबंध बने, तो व्यक्ति की सीखने और चीजों को जल्दी समझने की क्षमता बढ़ने की मान्यता है.
श्रीकृष्ण के 64 कलाओं में निपुण होने के प्रसंग को ज्योतिषीय दृष्टि से देखते समय बुध की स्थिति और भद्र महापुरुष योग का विशेष उल्लेख किया गया है.
कुंडली में बताए जाते हैं पांच महापुरुष योग
श्रीकृष्ण की कुंडली के बारे में ज्योतिषीय ग्रंथों और परंपराओं में अलग-अलग मत मिलते हैं. कहा जाता है कि उनकी कुंडली में रूचक, भद्र, हंस, मालव्य और शश इन पांच महापुरुष योग एकसाथ बने थे. पंचमहापुरुष योग मंगल, बुध, गुरु, शुक्र और शनि के विशेष स्थिति में होने से बनते हैं. हर योग का अपना महत्व और लाभ मिलता है.
भद्र योग से बुद्धि और वाणी का संबंध
पंचमहापुरुष योगों में भद्र योग बुध से संबंधित है. ज्योतिषीय मान्यता के अनुसार यह योग व्यक्ति को बुद्धिमान, चतुर, तार्किक और प्रभावशाली वाणी वाला बना सकता है. ऐसे व्यक्ति परिस्थितियों को जल्दी समझने और उचित सलाह देने में सक्षम माने जाते हैं. यही कारण है कि श्रीकृष्ण के व्यक्तित्व में दिखाई देने वाली तीव्र बुद्धि, संवाद-कौशल और परिस्थिति के अनुसार निर्णय लेने की क्षमता को भद्र योग से जोड़कर देखा जाता है.
गुरु का प्रभाव देता है ज्ञान और विवेक
बुध जहां बुद्धि और तर्क का प्रतिनिधित्व करता है, वहीं गुरु को ज्ञान, विवेक, अध्यात्म और उच्च शिक्षा का कारक माना जाता है. ज्योतिषीय दृष्टि से बुध और गुरु का शुभ प्रभाव व्यक्ति को केवल तेज दिमाग ही नहीं बल्कि ज्ञान का सही इस्तेमाल करने की क्षमता भी प्रदान करता है. श्रीकृष्ण के व्यक्तित्व में ज्ञान और नीति का अद्भुत मेल दिखाई देता है. महाभारत में अर्जुन को दिया गया गीता ज्ञान इसका सबसे बड़ा उदाहरण माना जाता है.
छठे भाव में शनि और तुला राशि
श्रीकृष्ण की प्रचलित कुंडली संबंधी कुछ ज्योतिषीय व्याख्याओं में शनि को छठे भाव में तुला राशि में बताया गया है. तुला शनि की उच्च राशि मानी जाती है. ज्योतिष में छठा भाव संघर्ष, शत्रु, प्रतिस्पर्धा और चुनौतियों से जुड़ा माना जाता है. इसलिए यहां मजबूत शनि को कठिन परिस्थितियों में धैर्य बनाए रखने और विरोधियों पर रणनीतिक बढ़त हासिल करने की क्षमता से जोड़ा जाता है. हालांकि श्रीकृष्ण की जन्मकुंडली को लेकर अलग-अलग परंपराओं में ग्रह स्थितियों के मत मिलते हैं.
पांचों योगों का अलग-अलग प्रभाव
- रूचक योग- मंगल से बनने वाला यह योग साहस, पराक्रम, नेतृत्व क्षमता और तुरंत निर्णय लेने की शक्ति से जोड़ा जाता है.
- भद्र योग – बुध का यह योग बुद्धि, तर्क, वाणी, चतुराई और सीखने की क्षमता से संबंधित माना जाता है.
- हंस योग- गुरु से बनने वाला हंस योग ज्ञान, विवेक, अध्यात्म और उच्च विचारों का प्रतीक माना जाता है.
- मालव्य योग- शुक्र से बनने वाला यह योग कला, सौंदर्य, आकर्षण और रचनात्मक प्रतिभा से जोड़ा जाता है.
- शश योग- शनि से बनने वाला यह योग धैर्य, रणनीति, अनुशासन, न्यायप्रियता और प्रशासनिक क्षमता का संकेत माना जाता है.
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