
धरती के मौजूदा नक्शे में यूरोप ऊपर है, अफ्रीका उसके नीचे. ग्रीनलैंड लगभग अफ्रीका जितना बड़ा दिखाई देता है. रूस, कनाडा और दूसरे उत्तरी देश असाधारण रूप से विशाल नजर आते हैं. लेकिन क्या धरती वास्तव में ऐसी दिखती है? और अरबों सालों में धरती का आकार कैसे-कैसे बदला? आज जिस तरह देश और महाद्वीप हैं क्या ये सब पहले इसी तरह स्थित थे या कोई बदलाव भी आया है?
जिस नक्शे को हम बचपन से देखते आए हैं, वह धरती की तस्वीर नहीं, बल्कि धरती को दो आयामों में दिखाने का एक तरीका है. यानी 2D में हमने दुनिया के नक्शे को देखा है.
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4 सितंबर 2026 को संयुक्त राष्ट्र महासभा (UNGA) ने इसी सवाल को फिर से दुनिया के सामने ला दिया है. Togo की अगुवाई में लाए गए ‘Correct the Map’ प्रस्ताव को 164 देशों ने समर्थन दिया, एक देश ने विरोध किया और छह देश मतदान से दूर रहे. प्रस्ताव का मकसद ऐसे वर्ल्ड मैप को बढ़ावा देना है जो अलग-अलग महाद्वीपों और क्षेत्रों का वास्तविक क्षेत्रफल को ज्यादा सही तरीके से दिखाएं. खासकर अफ्रीका के क्षेत्रफल को जायज तरीके से दिखाने की मांग है.
लेकिन दुनिया का नक्शा यहां से शुरू नहीं होता. इंसान के नक्शे बनाने से बहुत पहले धरती खुद बदल रही थी. इस दौरान महाद्वीप एक साथ जुड़े, टूटे, फिर अलग-अलग दिशाओं में चले. समुद्र बने, पहाड़ उठे और फिर इंसान ने इस बदलती धरती को समझने की कोशिश की.
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इस आर्टिकल में हम आपको वही समझाने की कोशिश करेंगे कि धरती का आकार कब-कब बदला और नक्शे में कब-कब सुधार हुआ है?
पैंजिया से आज की वर्ल्ड मैप तक
अमेरिकी ज्योलॉजिकल सर्वे के मुताबिक, करीब 300 से 200 मिलियन साल पहले आज के कई महाद्वीप एक विशाल सुपरकॉन्टिनेंट के हिस्सा थे. इसे पैंजिया (Pangaea) कहा जाता है. बाद में यह सुपरकॉन्टिनेंट टूटने लगा और इसके हिस्से अलग-अलग दिशाओं में चले गए. हालांकि ये मूवमेंट कोई साल दो साल में नहीं हुई. इसके लिए हजारों-लाखों साल का वक्त लगा.
वैज्ञानिक मानते हैं कि महाद्वीपों को देखें तो इंसानी समय के हिसाब से लगभग स्थिर रहते हैं. लेकिन ज्योलॉजिकल टाइम में वे लगातार चलते हैं. पृथ्वी की बाहरी कठोर परत कई बड़ी और छोटी टेक्टॉनिक प्लेट्स में बंटी है. ये प्लेट्स नीचे मौजूद अधिक गर्म और गतिशील पदार्थ के ऊपर धीरे-धीरे मूव करती हैं.
इसी मूवमेंट की देन है कि आज की दुनिया का ज्योग्राफिक अरेंजमेंट बना है.

Photo Credit: NDTV
क्या साउथ अमेरिका और अफ्रीका कभी एक ही थे?
साउथ अफ्रीका का इस्टर्न कोस्टलाइन और अफ्रीका का वेस्टर्न कोस्टलाइन देखकर लंबे समय से वैज्ञानिकों को यह सवाल परेशान करता रहा. 1912 में जर्मन वैज्ञानिक अलफ्रेड वेगेनर (Alfred Wegener) ने कॉन्टिनेंटल ड्रिफ्ट थ्योरी को व्यवस्थित तरीके से दुनिया के सामने रखा था.
उनका तर्क सिर्फ यह नहीं था कि दोनों महाद्वीप puzzle pieces की तरह फिट होते हैं. बल्कि दोनों तरफ एक जैसे ही जीवाश्म के टुकड़े और ज्योलॉजिकल स्ट्रक्चर के सुराग भी मिले.
USGS के अनुसार साउथ अमेरिका और अफ्रीका में मिले समान फॉसिल रिकॉर्ड कॉन्टिनेंटल ड्रिफ्ट के अंश मिले हैं.
दुनिया के पास मौजूद सबसे पुराने मैप में धरती कैसी है?
जैसे की हमने बताया कि महाद्वीपों की मूवमेंट लाखों-करोड़ों साल में हुई. इंसान की नक्शा बनाने का इतिहास इसके मुकाबले बेहद छोटी है. हमारे पास मौजूद सबसे पुराने दुनिया के नक्शों में से एक Babylonian clay tablet है.
करीब 6वीं century BCE की इस clay tablet में दुनिया को एक सर्कुलर फॉर्म में दिखाया गया है. Babylon, Euphrates और आसपास के क्षेत्रों को प्रमुखता दी गई है और दुनिया के चारों ओर पानी की एक रिंग दिखाई गई है.

Photo Credit: British Museum
लेकिन इसके बावजूद उनका नक्शा आज की दुनिया जैसी नहीं थी. कई जगहों की लोकेशन गलत थी, क्योंकि उस समय दुनिया के बड़े हिस्से के बारे में जानकारी ही नहीं थी. लेकिन टॉलेमी का इस बात को तूल देते थे कि दुनिया एक कागज पर अंदाज में खींची लकीर न हो, बल्कि कोऑर्डिनेट्स और मैथेमेटिकल तरीके से समझने की कोशिश हो.
1492 के बाद दुनिया अचानक बड़ी हो गई, लेकिन इस नक्शे में भी समस्या बनी रही
15वीं और 16वीं शताब्दी में समुद्री यात्राओं और दुनिया को जानने समझने की चाहत ने यूरोप को लोगों की समझ में इजाफा किया. लोग जब समंदर की यात्रा करने लगे तो नई तटवर्ती मैप होने लगीं. लेकिन इसके बाद एक नई समस्या सामने थी. यानी गोल धरती को सपाट पेपर पर कैसे दिखाया जाए?

15वीं और 16वीं शताब्दी में समुद्री यात्राओं के लिए इस नक्शे का इस्तेमाल होता है. ये नेविगेशन के लिहाज से बहुत अच्छा माना जाता था.
Photo Credit: British Museum
1569 में Mercator ने दुनिया को नया नक्शा दिया
1569 में गेरार्डस मर्केटर (Flemish cartographer Gerardus Mercator) ने अपना प्रसिद्ध वर्ल्ड मैप प्रकाशित किया. मर्केटर के नक्शे का सबसे बड़ा फायदा नेविगेशन था. ये गोल पृथ्वी का एक सपाट नक्शा था. इससे समुद्री नेविगेशन बहुत आसान हो गया था. ये भी सबसे सटीक साबित नहीं हो सका क्योंकि गोल पृथ्वी को को बिना कुछ खींचे या सिकोड़े, दो-डायमेंशनल सतह पर समतल करना मैथमेटिकली नामुमकिन है.
इस मैप में उच्च अक्षांशों पर जमीन के क्षेत्रफल वास्तविक क्षेत्रफल की तुलना में बहुत बड़े दिखाई देते हैं. और यहीं से शुरू होती है अफ्रीका आपत्ति की कहानी.
उदाहरण के लिए, मर्केटर मानचित्र में ग्रीनलैंड लगभग अफ्रीका के बराबर दिखाई देता है, जबकि वास्तविकता में अफ्रीका ग्रीनलैंड से करीब 14 गुना बड़ा है.
नक्शा सिर्फ भूगोल नहीं, राजनीति के साथ भी बदलता रहा
महाद्वीपों की करोड़ों साल पुरानी हलचल के अलावा आधुनिक दौर में भी दुनिया का नक्शा कई बार बदला है. प्रथम विश्व युद्ध (1914-18) और द्वितीय विश्व युद्ध (1939-45) के बाद कई साम्राज्य टूटे, नई सीमाएं खींची गईं और नए देशों का जन्म हुआ. ऑस्ट्रो-हंगेरियन और ओटोमन साम्राज्य के विघटन के बाद यूरोप और पश्चिम एशिया का नक्शा बदला, जबकि द्वितीय विश्व युद्ध के बाद जर्मनी का विभाजन के बाद भी विश्व मानचित्र में बड़ा बदलाव हुआ.
इसी तरह 1991 में सोवियत संघ (USSR) के विघटन ने दुनिया का नक्शा एक बार फिर बदल दिया. सोवियत संघ के टूटने के बाद रूस के अलावा यूक्रेन, कजाकिस्तान, उज़्बेकिस्तान, एस्टोनिया, लातविया, लिथुआनिया समेत 15 स्वतंत्र देश अस्तित्व में आए. दूसरी ओर, कार्टोग्राफी की दुनिया में भी समय-समय पर सुधार हुए.

सोवियत विघटन से पहले का मानचित्र
अफ्रीका को आखिर क्या आपत्ति है वो समझिए
अफ्रीकी देशों और कई विद्वानों का तर्क है कि यह समस्या केवल भौगोलिक नहीं बल्कि मानसिक और राजनीतिक भी है. उनका कहना है कि सदियों तक स्कूलों, एटलस और सरकारी संस्थानों में इस्तेमाल किए गए मर्केटर मानचित्र ने यूरोप और उत्तरी अमेरिका को वास्तविकता से अधिक बड़ा और प्रभावशाली दिखाया, जबकि अफ्रीका, दक्षिण अमेरिका और अन्य विकासशील क्षेत्रों का महत्व कम करके प्रस्तुत किया गया. इससे लोगों के मन में दुनिया की शक्ति और महत्व का एक विकृत चित्र बना.

अफ्रीका और ग्रीनलैंड नक्शे पर बराबर दिखते हैं लेकिन क्षेत्रफल का अंतर 14 गुणा है
इसी वजह से 20वीं सदी के उत्तरार्ध में कई शिक्षाविदों और अफ्रीकी बुद्धिजीवियों ने मर्केटर प्रोजेक्शन का विरोध शुरू किया. उनका कहना था कि विश्व मानचित्र केवल भूगोल दिखाने का माध्यम नहीं है, बल्कि यह इस बात को भी प्रभावित करता है कि लोग दुनिया को कैसे देखते हैं. इसलिए ऐसे मानचित्रों को बढ़ावा दिया गया जो महाद्वीपों के वास्तविक क्षेत्रफल को अधिक सटीक तरीके से दिखाते हैं, जैसे कि पीटर्स, रॉबिन्सन और विंकेल ट्रिपल प्रोजेक्शन.
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