

नई दिल्ली:
दिल्ली की एक अदालत ने मंगलवार को दिल्ली रेस क्लब को दिए गए बेदखली के आदेश पर रोक लगाने से इनकार कर दिया. क्लब को यह आदेश एस्टेट ऑफिसर ने जारी किया था. अदालत ने कहा कि क्लब को अपना पक्ष रखने के लिए पर्याप्त मौके दिए गए थे, लेकिन उसने इन मौकों का इस्तेमाल नहीं किया.
रेस क्लब की दलील पर अदालत ने क्या कहा है
अदालत ने कहा कि एस्टेट ऑफिसर ने न केवल केंद्र सरकार की ओर से दाखिल याचिका की कॉपी क्लब को दी थी, बल्कि जवाब दाखिल करने के लिए भी पर्याप्त समय दिया था. इसके बाद भी क्लब ने कोई जवाब दाखिल नहीं किया. दिल्ली की पटियाला हाउस अदालत के जिला और सत्र न्यायाधीश पितांबर दत्त ने अपने आदेश में कहा कि रिकॉर्ड से साफ है कि एस्टेट ऑफिसर ने क्लब को अपना जवाब और सबूत पेश करने के लिए पर्याप्त अवसर दिए. लेकिन क्लब ने ऐसा नहीं किया. इसके बाद एस्टेट ऑफिसर को क्लब का जवाब दाखिल करने का अधिकार खत्म करना पड़ा और मामले में आदेश सुरक्षित करना पड़ा.
क्लब की ओर से पेश वरिष्ठ वकील ने दलील दी कि प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का उल्लंघन हुआ है, क्योंकि एस्टेट ऑफिसर ने क्लब को केंद्र सरकार की याचिका की कॉपी नहीं दी थी. हालांकि, अदालत ने उनकी इस दलील को खारिज कर दिया. अदालत ने कहा कि 27 अप्रैल 2026 के आदेश में एस्टेट ऑफिसर ने साफ तौर पर लिखा था कि याचिका की कॉपी क्लब को दे दी गई थी.
अदालत ने कहा कि इस आदेश पर क्लब के सचिव और कानूनी प्रतिनिधि कर्नल एसके बख्शी के हस्ताक्षर भी थे. इसके बाद किसी भी सुनवाई में क्लब ने एस्टेट ऑफिसर से यह शिकायत नहीं की कि उसे याचिका की कॉपी नहीं मिली है. इससे साफ है कि क्लब को याचिका की कॉपी दी गई थी. क्लब ने पर्याप्त मौके मिलने के बाद भी अपना जवाब और सबूत पेश नहीं किए. क्लब को पहले ही जमीन खाली करने का नोटिस दिया गया था.
रेस क्लब ने नहीं खाली किया परिसर
केंद्र सरकार की ओर से एस्टेट ऑफिसर के सामने पब्लिक प्रिमाइसेज एक्ट की धारा 5 के तहत कार्रवाई शुरू करने से पहले क्लब को 12 मार्च 2026 को नोटिस दिया गया था. इस नोटिस में क्लब से 15 दिन में जमीन खाली कर पूरे परिसर का शांतिपूर्ण कब्जा लैंड एंड डेवलपमेंट ऑफिस को सौंप दे. ऐसा नहीं करने पर भारत सरकार ने कानून के मुताबिक बेदखली और जमीन का कब्जा वापस लेने की कार्रवाई शुरू करने की चेतावनी दी थी.
अदालत ने कहा कि क्लब को यह नोटिस सही तरीके से दिया गया था. इसके बाद क्लब ने इस नोटिस के खिलाफ दिल्ली हाई कोर्ट में सिविल मुकदमा दायर किया. हाई कोर्ट ने शुरुआत में क्लब को अंतरिम राहत दी थी.
सुनवाई में केंद्र सरकार के वकील ने हाई कोर्ट में कहा था कि कानूनी प्रक्रिया का पालन किए बिना क्लब को बेदखल नहीं किया जाएगा. इस बयान के बाद हाई कोर्ट ने नौ अप्रैल 2026 को क्लब का मुकदमा निपटा दिया था. इसके बाद केंद्र सरकार ने एस्टेट ऑफिसर के सामने याचिका दाखिल की. क्लब को कारण बताओ नोटिस भी दिया गया. अदालत के मुताबिक, नोटिस मिलने के बाद भी क्लब ने इस कार्रवाई का विरोध नहीं किया और अपना जवाब भी दाखिल नहीं किया.
अब कब होगी इस मामले की सुनवाई
इस वजह से अदालत ने क्लब की उस दलील को भी खारिज कर दिया, जिसमें कहा गया था कि एस्टेट ऑफिसर की कार्रवाई ‘रेस ज्यूडिकाटा’ यानी पहले से तय मामले के कारण दोबारा नहीं की जा सकती.
क्लब ने यह भी दलील दी कि वह लगातार किराया चुका रहा है, इसलिए उसे अनधिकृत कब्जेदार नहीं कहा जा सकता.इस पर अदालत ने कहा कि 1994 के बाद केंद्र सरकार की ओर से लीज को आगे बढ़ाने या नवीनीकरण करने वाला कोई दस्तावेज जारी नहीं किया गया. अदालत ने कहा कि सिर्फ लीज की अवधि खत्म होने के बाद किराया देते रहने से लीज अपने आप नवीनीकृत नहीं हो जाती. अदालत ने माना कि क्लब इस मामले में पहली नजर में ऐसा कोई मजबूत आधार नहीं दिखा पाया, जिसके आधार पर 11 अगस्त 2026 को एस्टेट ऑफिसर द्वारा दिए गए बेदखली के आदेश पर रोक लगाई जा सके. इसलिए अदालत ने क्लब की अंतरिम राहत की याचिका खारिज कर दी.अब इस मामले में मुख्य अपील पर 26 सितंबर को सुनवाई होगी.
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