

नई दिल्ली:
गिरते रुपये को मजबूत करने और देश में डॉलर को लाने के लिए रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) ने 8 जून को ‘स्पेशल स्वैप स्कीम’ शुरू की थी. RBI की ये स्कीम लॉन्च होते ही सुपरहिट साबित हुई है. महज 11 हफ्तों में ही इसके जरिए लगभग 21 अरब डॉलर आ गए हैं, जो मार्केट की उम्मीद से कहीं ज्यादा है.
RBI ने एक बयान में बताया है कि स्वैप स्कीम में लोगों ने काफी दिलचस्पी दिखाई है और 8 जून से लगातार विदेशी मुद्रा आ रही है. RBI ने बताया कि फॉरेन करेंसी नॉन-रेसिडेंट (बैंक) या FCNR(B) डिपॉजिट के जरिए बड़ी मात्रा में फंड जुटाया है.
कहां से आए 21 अरब डॉलर?
RBI ने 20 जुलाई को इस स्कीम के तहत आए फंड का डेटा जारी किया है. इसमें बताया है कि 8 जून से 17 जुलाई के बीच इस स्कीम के जरिए 20.7 अरब डॉलर आए हैं. यानी सिर्फ 40 दिन में ही लगभग 2 लाख करोड़ रुपये आ गए.
RBI के मुताबिक, जितना फंड आया है, उसमें से 17.4 अरब डॉलर सिर्फ FCNR(B) से आया. ये डॉलर फॉरेन बैंक या NRI के जरिए आया है. कुल फंड में 84% हिस्सा इसी का है.
इसके अलावा फॉरेन करेंसी बॉरोइंग्स (OFCBs) से 1.97 अरब डॉलर और एक्सटर्नल कमर्शियल बॉरोइंग्स (ECBs) से 1.34 अरब डॉलर आया है. OFCB मतलब बैंकों का विदेशी कर्ज और ECB का मतलब कंपनियों का विदेशी कर्ज होता है.
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इस स्कीम की जरूरत क्यों पड़ी?
डॉलर के मुकाबले रुपया लगातार कमजोर हो रहा है. बुधवार को भी रुपया 28 पैसा टूटकर डॉलर के मुकाबले 96.53 के स्तर पर पहुंच गया. अमेरिका-ईरान जंग और वैश्विक अनिश्चितता के कारण रुपये पर दबाव बढ़ गया है. शेयर मार्केट से भी विदेशी निवेशक अपना पैसा निकाल रहे थे.
RBI ने कहा कि बैलेंस ऑफ पेमेंट को मजबूत करने और कैपिटल इनफ्लो को बढ़ावा देने के मकसद से कई उपाय शुरू किए गए थे, जिनमें FCNR(B) डिपॉजिट, OFCB और ECB इनफ्लो के लिए रियायती स्वैप की सुविधा देना भी शामिल था.
इस स्कीम से सबसे बड़ा फायदा ये होता है कि विदेशी मुद्रा भंडार में जमा डॉलर निकालने की जरूरत नहीं पड़ती और बाहर से नया डॉलर आता रहता है.
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ये स्कीम काम कैसे करती है?
आमतौर पर जब भारतीय बैंक विदेशों से डॉलर भारत लाते हैं तो उन्हें करेंसी रिस्क यानी हेजिंग कॉस्ट उठानी पड़ती है. इसका मतलब हुआ कि अगर भविष्य में डॉलर के मुकाबले रुपया कमजोर या मजबूत हुआ तो बैंकों को नुकसान हो सकता है.
ऐसे में डॉलर लाने के लिए RBI ने स्कीम शुरू की थी. इस स्कीम के तहत RBI बैंक विदेशों से NRI से डॉलर लाते हैं तो उन डॉलर को रुपये में कन्वर्ट करने के बदले कम चार्ज लेगा.
हालांकि, इस स्कीम को RBI हमेशा चालू नहीं रखता है. इसे आमतौर पर संकट के समय शुरू किया जाता है. इससे पहले 2013 में जब रुपया सबसे निचले स्तर पर पहुंच गया था, तब तत्कालीन गवर्नर रघुराम राजन ने इस स्कीम को पहली बार शुरू किया था. इस स्कीम ने भारतीय रुपये को संभाल लिया था.
अभी भी RBI ने जो स्कीम शुरू की है, वह कुछ महीनों के लिए है. FCNR(B) डिपॉजिट के लिए ये स्कीम 30 सितंबर 2026 और OFCBs और ECBs के लिए 31 दिसंबर 2026 तक चालू है.
कितना डॉलर आने की उम्मीद?
कमजोर रुपये को संभालने के मकसद से 8 जून से RBI ने इस स्कीम को शुरू किया था. इसका मकसद ग्लोबल मार्केट में अनिश्चितता के बीच विदेशी मुद्रा का फ्लो बनाए रखना है. शुरुआती अनुमानों के मुताबिक, इस स्कीम से 70 अरब डॉलर तक की विदेशी मुद्रा आ सकती है. 2013 में इस स्कीम से 34 अरब डॉलर आए थे.
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