
नीट परीक्षा पेपर लीक और अन्य मुद्दों को लेकर आज दिल्ली की सड़कों पर उतरे प्रदर्शनकारी संसद की दहलीज तक पहुंच गए. पिछले 12 वर्षों में ऐसा प्रदर्शन नहीं हुआ था. कुछ लोगों को सोमवार के प्रदर्शन ने निर्भया मामले की याद दिला दी, जब प्रदर्शनकारी छात्र और छात्राएं विजय चौक तक पहुंच गए थे. हालांकि, सरकार को सोमवार के प्रदर्शन के बारे में अंदाजा था और उसने इसके लिए व्यापक तैयारियां पहले से ही कर रखी थीं.

सोमवार को संसद भवन में गृह मंत्री अमित शाह जब करीब साढ़े ग्यारह बजे पहुंचे तब तक प्रदर्शन शुरू हो चुका था. उधर, दोनों सदन लगातार थोड़ी-थोड़ी देर में स्थगित होते रहे, इधर, शाह वरिष्ठ मंत्रियों के साथ लगातार हालात पर नजर रखे हुए थे. वे दिल्ली पुलिस कमिश्नर, गृह सचिव और खुफिया विभाग के प्रमुख से संपर्क में थे. दिल्ली पुलिस को स्पष्ट निर्देश था कि संयम बनाए रखें, उकसावे में न आएं और ऐसी कोई कार्रवाई न करें जिससे गलत संदेश जाए. यही कारण है कि कुछ प्रदर्शनकारियों के पथराव करने और पुलिसकर्मियों पर हमला करने के बावजूद पुलिस ने कुछ जगहों पर ही हल्का लाठीचार्ज किया और आंसू गैस के गोलों से तितर-बितर किया. प्रदर्शनकारियों के हमले में पचास से अधिक पुलिसवाले जख्मी हुए लेकिन पुलिस उकसावे में नहीं आई. संसद भवन के नजदीक रेल भवन तक प्रदर्शनकारियों को पहुंचने दिया गया. यह भी प्रबंधन की रणनीति का ही हिस्सा था.

इस बीच, सरकार को कॉकरोच जनता पार्टी की ओर से बातचीत का प्रस्ताव मिल चुका था. सरकार ने सीजेपी से चर्चा के लिए स्वास्थ्य मंत्री जे पी नड्डा को जिम्मेदारी सौंपी. नीट परीक्षा वैसे तो शिक्षा मंत्रालय के अंतर्गत आने वाला स्वायत्त एनटीए आयोजित करता है, लेकिन इसका सीधा संबंध स्वास्थ्य मंत्रालय से ही है. स्वास्थ्य मंत्रालय के तहत काम करने वाला एनएमसी नीट के लिए पाठ्यक्रम, न्यूनतम पात्रता और कट ऑफ से जुड़े नियम तय करता है. एमबीबीसी और बीडीएस की सीटें, ऑल इंडिया कोट काउंसिलिंग और राज्य स्तर के समन्वय की जिम्मेदारी भी स्वास्थ्य मंत्रालय की है. ऐसे में यह उचित समझा गया कि नीट से जुड़े मुद्दों पर नड्डा प्रदर्शनकारियों से बातचीत करें. राज्य सभा के नेता होने के कारण नड्डा की सदन में उपस्थिति अपेक्षित थी लेकिन वे सदन की कार्यवाही बीच में छोड़कर अपने आवास गए जहां सीजेपी के दो प्रतिनिधि पहले से मौजूद थे. सूत्रों के अनुसार सीजेपी के प्रतिनिधियों और नड्डा के बीच दो बार मुलाकात हुई.

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पहली मुलाकात सुबह करीब 11.50 पर हुई, जब सीजेपी के प्रतिनिधि जेपी नड्डा से मिलने पहुंचे. नड्डा ने बात की और पूछा क्या मांग है. तब सीजेपी के प्रतिनिधियों ने मांगों की लिस्ट बताई. तब नड्डा ने कहा कि लिखित में मांग नहीं लाए? अपनी मांग लिखित में दीजिए. जिसके बाद दोनो प्रतिनिधियों ने केंद्रीय मंत्री जेपी नड्डा को 4 बजे मांगों का लिखित ज्ञापन दिया. सूत्रों के अनुसार बैठक में जेपी नड्डा की तरफ से CJP की तीनों मांगों या इनमें से किसी भी मांग पर कोई आश्वासन या कमिटमेंट नहीं दिया गया है. हालांकि, नड्डा ने बैठक में अनुरोध किया कि वे अपने धरने को समाप्त करें और सामान्य स्थिति बहाल करने में प्रशासन की मदद करें.
अमित शाह के लगातार संपर्क में थे नड्डा
उधर, नड्डा लगातार अमित शाह के संपर्क में थे. शाह के साथ वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल, शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान और संसदीय कार्यमंत्री किरेन रीजीजू उनके संसद भवन कार्यालय में तीन घंटे से भी अधिक समय तक मौजूद रहे. सरकार दो मोर्चों पर काम कर रही थी- पहला संसद के बाहर सड़कों पर प्रदर्शन को संभालना और दूसरा संसद के भीतर विपक्ष के आक्रामक तेवरों का सामना करना. सरकार का आकलन है कि सोमवार के प्रदर्शन को राजनीतिक समर्थन दिया गया. According to government intel, इसमें मुख्य रूप से चंद्रशेखर की आजाद समाज पार्टी, समाजवादी पार्टी, आम आदमी पार्टी और वामपंथी छात्र संगठनों के कार्यकर्ता शामिल हुए. करीब हजार-डेढ़ हजार छात्र भी थे जिनके अपने जायज मुद्दे थे. लेकिन वे राजनीतिक कार्यकर्ताओं की भीड़ का हिस्सा बन कर रह गए.

छात्र और अभ्यर्थी कम, फिर कहां से जुट गए इतने लोग?
दिल्ली पुलिस ने सेंट्रल दिल्ली की जबर्दस्त नाकाबंदी कर रखी थी. जगह-जगह बैरीकेड लगा दिए गए थे. जानकारी के अनुसार इस प्रदर्शन में हिस्सा लेने के लिए बड़ी संख्या में लोग पड़ोसी राज्यों से ट्रेनों, बसों आदि के जरिए दिल्ली पहुंचे. यहां तक कि गुजरात से भी आम आदमी पार्टी के कार्यकर्ता ट्रेनों के माध्यम से दिल्ली पहुंचे थे. सेंट्रल दिल्ली के संसद भवन के आसपास के मेट्रो स्टेशन बंद कर दिए गए थे, ताकि जिन्हें आना हो उन्हें लंबी दूरी तक पैदल चलना पड़े.

सरकार का कहना है कि अब तक आयोजित तीन प्रमुख परीक्षाओं नीट (NEET), जेईई (JEE) और सीयूईटी (CUET)—में लगभग 50 लाख से ज्यादा छात्र शामिल हो चुके हैं. इनमें से करीब 10 लाख छात्रों ने साझा परीक्षा में हिस्सा लिया होगा, जबकि 40 लाख से अधिक छात्र देशभर में आयोजित विभिन्न प्रवेश परीक्षाओं में शामिल हुए हैं. ऐसे में कई मामलों में काउंसलिंग और प्रवेश प्रक्रिया पहले ही शुरू हो चुकी है. सरकार के आकलन के अनुसार, वास्तविक अभ्यर्थियों का ध्यान इस समय प्रवेश और काउंसलिंग पर केंद्रित है, इसलिए उनके इन विरोध प्रदर्शनों में बड़ी संख्या में शामिल होने की संभावना अपेक्षाकृत कम मानी जा रही है.
राजनीतिक एंगल से भी प्रदर्शन को देख रही है सरकार
सरकार के सूत्र का ये भी कहना है कि यदि नीट की परीक्षा के रिजल्ट देखे जाएं तो टॉपर्स ज्यादातर पहली बार परीक्षा देने वाले छात्र हैं और इसमें से भी काफी ज्यादा गरीब और निम्न मध्यम बैकग्राउंड से है. सूत्रों का ये भी कहना है कि परीक्षा प्रश्नपत्र लीक होने के बाद तुरंत जिम्मेदारी लेते हुए एक महीने के अंदर हीं छात्रों के भविष्य की चिंता करते हुए पुनः परीक्षा कराई गई और रिजल्ट भी निकाला गया और जिनसे गलती हुई उनकी जिम्मेदारी भी तय की गई.

इसलिए इस तरह के प्रदर्शन के पीछे राजनीतिक मकसद अधिक लगता है. यह बात इस प्रदर्शन में बड़ी संख्या में शामिल हुए राजनीतिक दलों के कार्यकर्ताओं से भी पता चलती है. जिस तरह समाजवादी पार्टी के सांसदों ने उनके समर्थन में मार्च निकाला, उससे भी यह बात साबित होती है कि यूपी विधानसभा चुनाव के मद्देनजर समाजवादी पार्टी इस मुद्दे को लपकना चाहती है. जबकि अभी तक वह राम मंदिर की चढ़ावा चोरी के मामले को तूल दे रही थी. वहीं कांग्रेस पेपर लीक के मसले पर मुखर थी, लेकिन अब वह चढ़ावा चोरी के मामले को उठाना चाह रही है. सोमवार के प्रदर्शन से कांग्रेस की दूरी भी यही बात दिखा रही है.

कॉकरोच पार्टी से अगले राउंड की बात होगी या नहीं?
सरकार का कहना है कि नड्डा से बातचीत में सीजेपी की मांगों को लेकर कोई आश्वासन नहीं दिया गया है. शिक्षा मंत्री को हटाने की मांग राजनीतिक है, जिसे पूरा करने का सवाल ही नहीं है. पेपर लीक की सीबीआई जांच चल रही है और इससे संबंधित अधिकारियों को हटा दिया गया था. सोनम वांगचुक अस्पताल में हैं और उन्हें वहां से छुट्टी देना उनके स्वास्थ्य और डॉक्टरों पर निर्भर है. वहीं जहां तक आत्महत्या करने वाले छात्रों के परिवारवालों को एक-एक करोड़ रुपये देने का सवाल है, इस पर अभी कोई विचार नहीं किया गया है. अभी यह भी स्पष्ट नहीं है कि क्या सरकार और सीजेपी के प्रतिनिधियों के बीच आगे भी बातचीत होगी या नहीं. सड़क पर विरोध का सामना करने के बाद अब सरकार की दूसरी चुनौती संसद के भीतर विपक्ष के हमलों को झेलने की है. सरकार विपक्ष से दोनों सदन सुचारूढंग से चलाने की अपील करेगी. हालांकि, इस बात की संभावना कम है कि विपक्ष इसके लिए तैयार होगा. ऐसे में माना जा रहा है कि अगर गतिरोध नहीं सुलझा तो मॉनसून सत्र का पहला सप्ताह धुल सकता है.
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