
हिमालय के ग्लेशियर 65% तेजी से पिघल रहे हैं, जिससे बड़ा खतरा मंडरा रहा है. यह आंकड़ा एक दशक पहले की तुलना में बहुत ज्यादा है. हाल ही में हुई एक स्टडी में इसका खुलासा हुआ है. इसका मुख्य कारण ब्लैक कार्बन बताया गया है. इतनी तेजी से ग्लेशियर पिघलने की वजह से पानी की सुरक्षा पर खतरा मंडरा रहा है क्योंकि यह इलाका सदी के मध्य तक ‘पीक वॉटर’ की ओर बढ़ रहा है. यह जानकारी अगस्त के आखिर में नेपाल-तिब्बत सीमा पर हिमालयी ग्लेशियर के टूटने की घटना के बाद सामने आई है.
यह स्थिति क्यों खतरनाक है?
‘पीक वॉटर’ वह स्थिति होती है, जब जलवायु परिवर्तन के कारण ग्लेशियरों के तेजी से पिघलने से नदियों का जलप्रवाह अपने उच्चतम स्तर पर पहुंच जाता है, और उसके बाद पानी का स्तर हमेशा के लिए घटने लगता है. क्योंकि इसके बाद ग्लेशियर इतने छोटे हो जाते हैं कि नदियों में पानी की आपूर्ति भारी मात्रा में कम हो जाती है.

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यह स्टडी सस्टेनेबिलिटी एडवाइजरी फर्म ‘सिस्टेमिक’ (Systemiq) ने ‘इंटीग्रेटेड माउंटेन इनिशिएटिव’, ‘इंटरनेशनल सेंटर फॉर इंटीग्रेटेड माउंटेन डेवलपमेंट’ और भारत के ‘जी.बी. पंत नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ हिमालयन एनवायरनमेंट’ के साथ मिलकर तैयार की है.
स्टडी में पाया गया कि हाल के दशकों में हिमालय के ग्लेशियरों के पिघलने की रफ्तार में तेजी आई है. हिंदू कुश-हिमालय क्षेत्र में करीब 40 हजार ग्लेशियर हैं. यह एक बड़ा पहाड़ी इलाका है, जो अफगानिस्तान से म्यांमार तक आठ देशों में फैला है. लेकिन अभी जमीन पर सिर्फ़ 21 ग्लेशियरों की ही निगरानी की जा रही है.
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भारत के लिए क्यों अलर्ट अलार्म?
भारत में करीब 200 ग्लेशियर झीलों की पहचान ज्यादा जोखिम वाली झीलों के तौर पर की गई है, जिनमें से 56 को ‘बहुत ज्यादा जोखिम’ वाली कैटेगरी में रखा गया है. इससे नीचे की तरफ रहने वाले लाखों लोग खतरे की जद में हैं.
हिमालय भारत की GDP में 20% से ज्यादा का योगदान देता है, इसलिए यह इलाका देश के राष्ट्रीय आर्थिक बुनियादी ढांचे का एक अहम हिस्सा है, जिस पर करोड़ों लोग निर्भर हैं.
हालांकि, हिमालयी इलाका भारत के कुल जमीनी हिस्से का करीब 18% है, लेकिन देश में होने वाली प्राकृतिक आपदाओं में इसकी हिस्सेदारी लगभग 35% है.
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