
Kathua Railway Station: भारतीय सेना के जिस शहीद कैप्टन सुनील कुमार चौधरी के नाम पर अब कठुआ का रेलवे स्टेशन होगा, उनकी शहादत की कहानी रौंगटे खड़े कर देने वाली है. सामने के एक घर में आतंकवादी छिपे थे, जो अंधाधुंध गोलीबारी कर रहे थे. सीने में गोली लगने के बावजूद बहादुर फौजी सुनील कुमार चौधरी शेर की तरह लड़ते रहे और आतंकवादी को मौत के घाट उतारकर वीरगति को प्राप्त हो गए.
उधर, केंद्रीय विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी और पृथ्वी विज्ञान राज्य मंत्री डॉ. जितेंद्र सिंह ने सोशल मीडिया पर लिखा कि लोगों की भारी मांग पर, कठुआ रेलवे स्टेशन का नाम बदलकर ‘शहीद कैप्टन सुनील कुमार चौधरी रेलवे स्टेशन कठुआ’ कर दिया गया है. केंद्रीय मंत्री डॉ. जितेंद्र सिंह ने उत्तरी रेलवे द्वारा जम्मू डिवीजन के कठुआ रेलवे स्टेशन का नाम तत्काल प्रभाव से बदलकर ‘शहीद कैप्टन सुनील कुमार चौधरी कठुआ रेलवे स्टेशन’ करने संबंधी परिपत्र भी साझा किया.
अनारक्षित और यात्री आरक्षण प्रणाली में अब दिखेगा ‘एमएस केटी’ कोड
17 जुलाई 2026 को जारी एक परिपत्र में कहा गया है कि कठुआ रेलवे स्टेशन का नया अल्फा कोड केटीएचयू की जगह एमएस केटी होगा, जबकि अन्य सभी विवरण अपरिवर्तित रहेंगे. अनारक्षित टिकट प्रणाली और यात्री आरक्षण प्रणाली में अब यह स्टेशन ‘एमसी सुनील कठुआ’ के रूप में दिखाई देगा.

kathua railway station renamed after martyr captain sunil kumar choudhary kirti chakra

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कौन थे शहीद कैप्टन सुनील कुमार चौधरी? जानिए उनका सफर
- भारतीय सेना के जांबाज कैप्टन सुनील कुमार चौधरी मूल रूप से जम्मू-कश्मीर में कठुआ के पास स्थित गोविंदसर गांव के रहने वाले थे. उनका जन्म 22 जून 1980 को एक प्रतिष्ठित सैन्य परिवार में हुआ था. वे लेफ्टिनेंट कर्नल पी.एल. चौधरी और सत्या चौधरी के तीन बेटों में सबसे बड़े थे. परिवार और दोस्त उन्हें प्यार से ‘सोनी’ कहते थे.
- उन्होंने विभिन्न केंद्रीय विद्यालयों से अपनी स्कूली शिक्षा पूरी की. इसके बाद पुणे के गरवारे कॉलेज ऑफ कॉमर्स से स्नातक और गढ़वाल विश्वविद्यालय से स्नातकोत्तर की उपाधि प्राप्त की. इसके बाद उन्होंने एमबीए में दाखिला लिया, मगर एमबीए की डिग्री पूरी करने से पहले ही वे भारतीय सेना में शामिल हो गए. उन्होंने संयुक्त रक्षा सेवा परीक्षा उत्तीर्ण की और 1 जुलाई 2003 को भारतीय सैन्य अकादमी में प्रवेश लिया.
- 10 दिसंबर 2004 को उन्हें 11 गोरखा राइफल्स रेजिमेंट की 7/11 गोरखा राइफल्स बटालियन में कमीशन प्राप्त हुआ. उनकी पहली पोस्टिंग कोलकाता के फोर्ट विलियम स्थित 7/11 गोरखा राइफल्स में हुई थी. भारतीय सेना में उनकी अंतिम रैंक कैप्टन थी. 27 जनवरी 2008 को वे देश के लिए शहीद हो गए.

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क्या था रंगागढ़ अभियान, जिसमें कैप्टन सुनील ने आतंकियों को खदेड़ा?
- भारतीय सेना के विशेष ऑपरेशनों में से एक ‘रंगागढ़ अभियान’ की कहानी 26 जनवरी 2008 से शुरू होती है. उस दिन कैप्टन सुनील कुमार चौधरी को असम के तिनसुकिया जिले के नौपथर गांव में यूनाइटेड लिबरेशन फ्रंट ऑफ असम के आतंकवादियों के खिलाफ असाधारण वीरता प्रदर्शित करने के लिए “सेना पदक” से सम्मानित किया गया था.
- अगले दिन 27 जनवरी 2008 को, अपने कमांडिंग ऑफिसर कर्नल प्रमित सक्सेना द्वारा दिनजान में आयोजित “सेना पदक” के उपलक्ष्य में आयोजित भोज में उन्हें 19 पंजाब बटालियन के लेफ्टिनेंट वरुण राठौर के साथ शामिल होना था. कार्यक्रम स्थल पर पहुंचने से पहले ही भारतीय सेना को खुफिया सूचना मिली कि रंगागढ़ गांव में 7 से 9 उल्फा (ULFA) आतंकवादी छिपे हुए हैं.
- सूचना पाते ही कैप्टन सुनील कुमार चौधरी, लेफ्टिनेंट वरुण राठौर और पांच जवानों के साथ रंगागढ़ अभियान के लिए निकल पड़े. वे दोपहर 12:40 बजे रंगागढ़ गांव पहुंचे. कैप्टन सुनील कुमार चौधरी की रणनीति के तहत लेफ्टिनेंट वरुण राठौर और तीन जवानों ने गांव के दाहिने हिस्से की घेराबंदी की, जबकि खुद कैप्टन सुनील आतंकवादियों से मुकाबला करने के लिए आगे बढ़े.
- एक घर में छिपे आतंकवादियों ने सेना पर अंधाधुंध गोलीबारी शुरू कर दी और पास के जंगल की ओर भागने का प्रयास करने लगे. कैप्टन सुनील ने उनका पीछा किया. भारी गोलीबारी के बीच भागते हुए आतंकवादियों को खदेड़ते हुए उन्होंने शुरुआती मुठभेड़ में ही एक आतंकवादी को मार गिराया.

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कैप्टन सुनील कुमार चौधरी के सीने के बाईं ओर लगी गोली
इसी गोलीबारी के दौरान कैप्टन सुनील कुमार चौधरी के सीने के बाईं ओर एक गंभीर गोली लगी. सीने में गोली लगने और अत्यधिक खून बहने के बावजूद उन्होंने दूसरे आतंकवादी को गोली मारकर घायल कर दिया और जंगल की ओर भाग रहे तीसरे आतंकवादी का भी पीछा किया. उन्होंने उस आतंकवादी को घेरकर उसके भागने का रास्ता पूरी तरह बंद कर दिया और बेहद करीब से आमने-सामने की मुठभेड़ की. उन्होंने उस आतंकवादी को भी मार गिराया और इस प्रकार खतरे को पूरी तरह से समाप्त कर दिया.
इस भीषण मुठभेड़ के तुरंत बाद, महज 27 वर्ष की आयु में कैप्टन सुनील कुमार चौधरी अपनी गंभीर चोटों के कारण वीरगति को प्राप्त हो गए. उनके इस अदम्य साहस और सर्वोच्च बलिदान के लिए उन्हें मरणोपरांत देश के दूसरे सर्वोच्च शांतिकालीन वीरता पुरस्कार, ‘कीर्ति चक्र’ से सम्मानित किया गया. कैप्टन सुनील का नाम उल्फा उग्रवादियों की हिट लिस्ट में था. ‘ए’ कंपनी का कार्यभार संभालने के महज एक महीने के भीतर ही उन्होंने उल्फा के दो ग्रुप कमांडरों को मार गिराया था. उनके इसी अदम्य साहस के लिए उन्हें 26 जनवरी 2008 को सेना पदक से नवाजा गया था.
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