
Pitru Paksha 2026: हिंदू धर्म में पितृ पक्ष का विशेष महत्व है. पितरों का आशीर्वाद प्राप्त करने और उनके प्रति आदर-भाव प्रकट करने के लिए यह समय अत्यंत फलदायी माना गया है. पितृ पक्ष या श्राद्ध करीब 16 दिनों तक चलते हैं.
पाल बालाजी ज्योतिष संस्थान (जयपुर-जोधपुर) के निदेशक एवं ज्योतिषाचार्य डॉ. अनीष व्यास के अनुसार, इस बार पितृ पक्ष का आरंभ 26 सितंबर से हो रहा है, जिसका समापन 10 अक्तूबर को सर्वपितृ अमावस्या के साथ होगा. पंचांग के अनुसार, पितृपक्ष की शुरुआत भाद्रपद माह की पूर्णिमा तिथि से होती है और आश्विन माह के कृष्ण पक्ष की अमावस्या पर यह समाप्त होता है.
पितृ लोक से धरती पर आते हैं पूर्वज ज्योतिषाचार्य डॉ. अनीष व्यास ने बताया कि देवी-देवताओं के साथ-साथ पितर भी हमारे जीवन और मंगलकार्यों के लिए महत्वपूर्ण हैं. पूर्वज पितृ लोक में वास करते हैं और श्राद्ध पक्ष के 16 दिनों के लिए धरती पर आते हैं. उनकी आत्मा की शांति और मोक्ष के लिए तर्पण, अर्पण व पिंडदान का विधान है.
मान्यता है कि यमराज श्राद्ध पक्ष में जीवों को मुक्त कर देते हैं ताकि वे अपने स्वजनों के पास जाकर तर्पण ग्रहण कर सकें. परिवार का कोई भी सदस्य, विवाहित या अविवाहित, बच्चा, बुजुर्ग, स्त्री या पुरुष, जिसकी मृत्यु हो चुकी है, वह पितर कहलाता है. यदि पितरों की कृपा न मिले, तो जातक की कुंडली में ‘पितृ दोष’ बनता है, जिससे जीवन में कलह, आकस्मिक दुर्घटनाएं और वैवाहिक समस्याएं उत्पन्न होती हैं.
पिंडदान, तर्पण और हवन का महत्व भविष्यवक्ता एवं कुंडली विश्लेषक डॉ. अनीष व्यास के अनुसार, पितृपक्ष में हर साल परिजन अपनी-अपनी तिथियों के अनुसार पूर्वजों का श्राद्ध करते हैं. जो लोग तर्पण नहीं करते, उन्हें पितृदोष का सामना करना पड़ता है. अनेक श्रद्धालु पितरों की मुक्ति के लिए गया जाकर पिंडदान करते हैं. श्राद्ध के दिन कौवे को भोजन कराने की विशेष परंपरा है, क्योंकि माना जाता है कि कौवे के माध्यम से भोजन सीधे पितरों तक पहुंचता है.
वर्जित रहते हैं मांगलिक कार्य पितरों को समर्पित इन 16 दिनों में कोई भी शुभ या मांगलिक कार्य नहीं किया जाता. गृह प्रवेश, मुंडन, कानछेदन, सगाई और विवाह जैसे कार्यों पर रोक रहती है. साथ ही इन दिनों नए वस्त्र खरीदना और पहनना भी वर्जित माना जाता है.
दोपहर में होता है श्राद्ध का समय डॉ. अनीष व्यास ने स्पष्ट किया कि जहां देवी-देवताओं की पूजा सुबह और शाम होती है, वहीं पितरों के लिए दोपहर का समय (कुतुप व रोहिणी मुहूर्त) निश्चित है. दोपहर करीब 12:00 बजे श्राद्ध कर्म, तर्पण और ब्राह्मण भोज कराया जाना श्रेष्ठ माना जाता है.
पितृ पक्ष 2026: श्राद्ध की प्रमुख तिथियां
- 26 सितंबर: पूर्णिमा श्राद्ध
- 27 सितंबर: प्रतिपदा श्राद्ध
- 28 सितंबर: द्वितीया श्राद्ध
- 29 सितंबर: तृतीया श्राद्ध
- 30 सितंबर: चतुर्थी श्राद्ध एवं पंचमी श्राद्ध
- 1 अक्तूबर: षष्ठी श्राद्ध
- 2 अक्तूबर: सप्तमी श्राद्ध
- 3 अक्तूबर: अष्टमी श्राद्ध
- 4 अक्तूबर: नवमी श्राद्ध
- 5 अक्तूबर: दशमी श्राद्ध
- 6 अक्तूबर: एकादशी श्राद्ध
- 7 अक्तूबर: द्वादशी श्राद्ध
- 8 अक्तूबर: त्रयोदशी श्राद्ध
- 9 अक्तूबर: चतुर्दशी श्राद्ध
- 10 अक्तूबर: सर्वपितृ अमावस्या (अज्ञात तिथियों वाले पितरों का श्राद्ध)
- 11 अक्तूबर: मातामह (नाना) श्राद्ध
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