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ब्रिक्स सम्मेलन में भारत की सबसे बड़ी जीत क्या रही, नई दिल्ली घोषणापत्र में खास क्या है | BRICS Delhi Declaration How India Turned Diversity into Consensus at New Delhi Summit


नई दिल्ली में समाप्त हुए ब्रिक्स शिखर सम्मेलन की सबसे बड़ी उपलब्धि कोई नई संस्था, साझा मुद्रा या पश्चिम-विरोधी घोषणा नहीं है. उसकी असली उपलब्धि है सहमति. 11 ऐसे देशों ने, जिनकी राजनीतिक व्यवस्थाएं, आर्थिक जरूरतें और सुरक्षा हित बहुत अलग हैं, 45 पन्नों और 140 बिंदुओं वाले नई दिल्ली घोषणापत्र को सर्वसम्मति से स्वीकार किया. बातचीत सुबह चार बजे तक चली. कुछ महीने पहले ब्रिक्स देशों के विदेश मंत्री संयुक्त वक्तव्य तक जारी नहीं कर सके थे; अब भारत ने शीर्ष नेताओं को एक साझा दस्तावेज पर सहमत करा दिया.

कितना जटिल संगठन है ब्रिक्स

विस्तार के बाद ब्रिक्स अधिक प्रभावशाली, लेकिन भीतर से अधिक जटिल हुआ है. इसमें लोकतंत्र, राजशाहियां, ऊर्जा निर्यातक-आयातक और अमेरिका के सहयोगी-विरोधी सभी हैं. विद्वानों ने बढ़ती सदस्यता को उसकी ताकत और एकता की परीक्षा दोनों बताया था. दिल्ली घोषणापत्र ने विरोधाभास मिटाए नहीं, उन्हें संभालने का व्यावहारिक रास्ता निकाला. ब्रिक्स सैन्य गठबंधन नहीं, बल्कि ग्लोबल साउथ की संवाद और सौदेबाजी की शक्ति है.

घोषणापत्र की पहली विशेषता उसका सुधारवादी चरित्र है. ब्रिक्स मौजूदा विश्व व्यवस्था तोड़ना नहीं, उसमें उचित हिस्सेदारी चाहता है. दस्तावेज संयुक्त राष्ट्र, आईएमएफ, विश्व बैंक और डब्ल्यूटीओ को अधिक प्रतिनिधित्वपूर्ण बनाने और डब्ल्यूटीओ की दो-स्तरीय विवाद-निपटान व्यवस्था बहाल करने पर जोर देता है. चीन और रूस ने सुरक्षा परिषद में भारत और ब्राजील की बड़ी भूमिका की आकांक्षा का फिर समर्थन किया. संदेश साफ है- बहुपक्षवाद तभी विश्वसनीय होगा जब वह आज की शक्ति-सच्चाई दिखाएगा, न कि 1945 की दुनिया.

दूसरी विशेषता मजबूत आर्थिक भाषा है. घोषणापत्र एकतरफा शुल्क, गैर-शुल्क बाधाओं, बाहरी असर वाले प्रतिबंधों और पर्यावरण के नाम पर संरक्षणवाद का विरोध करता है. वह दंडात्मक कार्बन सीमा करों पर भी सवाल उठाता है. पर न अमेरिका का नाम है, न डोनाल्ड ट्रंप का. यह कमजोरी नहीं, कूटनीतिक सावधानी है. इससे सदस्य आर्थिक दबाव का विरोध कर सके, लेकिन ब्रिक्स अमेरिका-विरोधी मोर्चा बनने से बच गया.

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डॉलर विरोध का मंच नहीं बना ब्रिक्स

तीसरी विशेषता यह है कि भारत ने विमर्श को सनसनीखेज ‘डॉलर-विरोध’ से उपयोगी वित्तीय सहयोग की ओर मोड़ा. साझा ब्रिक्स मुद्रा की घोषणा नहीं हुई. इसके बदले तेज और सस्ते सीमा-पार भुगतान, भुगतान प्रणालियों के बीच तालमेल, स्थानीय मुद्राओं में व्यापार और न्यू डेवलपमेंट बैंक से स्थानीय मुद्रा में ऋण पर बल दिया गया. इन उपायों को राष्ट्रीय प्राथमिकताओं के अनुसार स्वैच्छिक ढंग से बढ़ाया जाएगा. लक्ष्य डॉलर को एक झटके में हटाना नहीं, देशों को अधिक विकल्प देना है. यह नारे से अधिक व्यवहार पर भारत की छाप है.

दस्तावेज आपूर्ति शृंखलाओं, महत्वपूर्ण खनिजों, डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना, कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई), खेती, जलवायु, स्वास्थ्य और छोटे उद्योगों जैसी विकास चुनौतियों से भी जुड़ता है. भारत की पहल पर डिजिटल अवसंरचना का साझा संग्रह, निर्यातक लघु उद्योगों के बिल जल्दी भुनाने वाला ‘जयपुर कंसेंसस’, स्वस्थ जीवनशैली अभियान और निमहांस द्वारा समन्वित मानसिक स्वास्थ्य नेटवर्क सामने आए. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ब्रिक्स को भाषण देने वाला मंच नहीं, समाधान देने वाला तंत्र बनाने पर जोर दिया.

जलवायु-ऊर्जा पर दस्तावेज विकसित देशों की अधिक जिम्मेदारी, पर्याप्त वित्त और महत्वपूर्ण खनिजों पर संप्रभु अधिकार मानता है.इसके साथ ही, अलग ऊर्जा जरूरतों और जीवाश्म ईंधन की मौजूदा अहमियत को स्वीकारता है. यह तेल-गैस निर्यातकों, कोयला-निर्भर अर्थव्यवस्थाओं और नवीकरणीय ऊर्जा समर्थकों को साथ रखने का समझौता है.

BRICS, BRICS Summit 2026 Delhi,

दिल्ली में आयोजित ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में आतंकवाद पर बनी सहमति भारत के लिए बड़ी कूटनीतिक जीत है.
Photo Credit: PTI

ब्रिक्स सम्मेलन पर पश्चिम एशिया संकट का असर

सबसे कठिन मतभेद पश्चिम एशिया पर था. ईरान चाहता था कि अमेरिका-इजरायल सैन्य कार्रवाई और सुरक्षित परमाणु ठिकानों पर हमलों का स्पष्ट उल्लेख हो. अमेरिका का निकट सहयोगी और ईरान का प्रतिद्वंद्वी यूएई ऐसी भाषा से असहज था. अंततः दस्तावेज ने ‘गहरी चिंता’ जताई, ‘अधिकतम संयम’ की अपील की और संप्रभुता, नागरिकों, ऊर्जा आपूर्ति और समुद्री मार्गों की सुरक्षा पर जोर दिया. शांतिपूर्ण परमाणु प्रतिष्ठानों पर हमलों की आलोचना हुई, पर जिम्मेदार देश का नाम नहीं लिया गया.’अपने-अपने राष्ट्रीय रुख को याद करते हुए’ जैसे शब्द सजावट नहीं, सर्वसम्मति की कीमत हैं.

गाजा पर भाषा अधिक स्पष्ट है. दस्तावेज युद्धविराम, निर्बाध मानवीय सहायता, फिलिस्तीनियों के जबरन विस्थापन की रोकथाम, आत्मनिर्णय और दो-राष्ट्र समाधान के तहत संयुक्त राष्ट्र की पूर्ण सदस्यता का समर्थन करता है. दूसरी ओर यूक्रेन का उल्लेख नहीं है. रूस आरोप स्वीकार नहीं करता, जबकि दूसरे सदस्य युद्ध का समर्थन नहीं करना चाहते. इसलिए मौन ही समझौता बना. यह ब्रिक्स की सुरक्षा सीमा और विवादों को अलग रखकर सहयोग बचाने की क्षमता दोनों दिखाता है.

दिशा पर भी मतभेद हैं. चीन, रूस और ईरान इसे पश्चिमी शक्ति का संतुलन मानते हैं. भारत के लिए ब्रिक्स ‘गैर-पश्चिमी’ है, ‘पश्चिम-विरोधी’ नहीं, टकराव का खेमा नहीं, सुधार का पुल. रूस और चीन डॉलर से तेज दूरी चाहते हैं, जबकि भारत स्थानीय मुद्रा में स्वैच्छिक व्यापार तो चाहता है, पर ऐसी साझा मुद्रा नहीं जो चीनी प्रभुत्व बढ़ाए या पश्चिमी प्रतिक्रिया को दावत दे. इसीलिए दस्तावेज में स्वैच्छिकता, चरणबद्ध अमल, संप्रभुता और राष्ट्रीय परिस्थितियों की भाषा बार-बार आती है.

आतंकवाद के मुद्दे पर मिली भारत को सफलता

आतंकवाद पर सहमति भारत की महत्वपूर्ण सफलता है. ब्रिक्स ने 22 अप्रैल 2025 को जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में हुए आतंकवादी हमले की स्पष्ट निंदा की. उसने सीमा-पार आतंकवाद, वित्तपोषण और सुरक्षित ठिकानों का उल्लेख किया, दोहरे मानदंड खारिज किए और संयुक्त राष्ट्र द्वारा घोषित आतंकियों और संगठनों के विरुद्ध कार्रवाई की मांग की. पाकिस्तान का नाम नहीं है, फिर भी भाषा भारत के इस तर्क के अनुकूल है कि आतंकवाद को अच्छे और बुरे आतंकवाद में नहीं बांटा जा सकता.

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इस सहमति में डोनाल्ड ट्रंप की अनचाही भूमिका भी रही. समझौता ट्रंप ने नहीं कराया, श्रेय भारतीय कूटनीति को है. पर उनके शुल्कों की धमकी, प्रतिबंध नीति, रूस और ईरान पर दबाव और ईरान से जुड़े युद्ध ने अलग-अलग देशों को अमेरिकी शक्ति के सामने साझा असुरक्षा का अनुभव कराया. ट्रंप ब्रिक्स की कथित ‘अमेरिका-विरोधी’ नीति से जुड़ने वाले देशों पर अतिरिक्त 10 फीसद शुल्क और डॉलर को चुनौती देने पर 100 फीसद शुल्क की धमकी दे चुके हैं. रणनीतिक विकल्प खोजने को शत्रुता मानकर उन्होंने बिखरे देशों को साझा आर्थिक शिकायत दे दी. फिर भी यह अमेरिका-विरोधी गठबंधन नहीं है. सदस्य पश्चिमी बाजार, पूंजी और तकनीक से जुड़े हैं और डॉलर के विकल्प पर एकमत नहीं हैं. ट्रंप ने बस इतना साझा आधार बनाया कि आर्थिक सुरक्षा के लिए बाजार, भुगतान मार्ग, ऊर्जा आपूर्ति और साझेदारियां विविध होनी चाहिए. घोषणापत्र में उनका नाम न होना बताता है कि सदस्य अमेरिका से संबंध भी बचाना चाहते हैं और उसकी अनिश्चितता के विरुद्ध सामूहिक बीमा भी.

भारत बना ईरान और यूएई के बीच पुल

भारत के लाभ ठोस हैं. नई दिल्ली ने ईरान और यूएई के बीच पुल बनाया, चीन-रूस के साथ काम किया और ब्रिक्स को पश्चिम-विरोधी मंच बनने से रोका. उसे आतंकवाद पर अनुकूल भाषा, सुरक्षा परिषद में बड़ी भूमिका का समर्थन और डिजिटल व्यवस्था, स्वास्थ्य, एमएसएमई और विकास अनुभव को वैश्विक मंच देने का अवसर मिला. सम्मेलन ने भारत-चीन संबंधों में सावधान सुधार को भी बढ़ाया, दोनों नेताओं ने व्यापार असंतुलन, आपूर्ति शृंखला और बाजार पहुंच पर काम करने की सहमति जताई.

भारत की बड़ी जीत वैचारिक है. उसने ब्रिक्स को साझा मुद्रा के दावों से हटाकर व्यावहारिक रणनीतिक स्वायत्तता की राह दिखाई, जहां संभव हो पुरानी संस्थाओं को सुधारिए, जहां जरूरी हो नए विकल्प बनाइए और विरोधी खेमों के बीच भी संबंध रखिए. बंटी हुई दुनिया में शक्ति केवल उसके पास नहीं जो एक पक्ष चुन ले, शक्ति उसके पास भी है जो प्रतिद्वंद्वियों को एक मेज पर लाकर सहमति बना सके. भारत ने दिखाया है कि आज सहमति भी शक्ति है और भारत उसे बनाना सीख चुका है.​

(डिस्क्लेमर: लेखक द इंडियन फ्यूचर्स थिंक टैंक के संस्थापक और दिल्ली के जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के स्कूल ऑफ इंटरनेशनल स्टडीज में एसोसिएट प्रोफेसर हैं. इस लेख में व्यक्त किए गए विचार उनके निजी हैं, उनसे एनडीटीवी का सहमत या असहमत होना जरूरी नहीं है.)



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