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शशि थरूर का लेख-इंडिया-पाकिस्तान न्यू कोल्ड वॉर; जयशंकर ने एनडीटीवी के मंच से दिया था हिंट | Shashi Tharoor article on the new India-Pakistan Cold War



एनडीटीवी वर्ल्ड समिट में भारतीय विदेश मंत्री एस जयशंकर पहुंचे तो उन्होंने पाकिस्तान के साथ संबंधों पर बात की. उन्होंने साफ तौर पर कहा कि भारत हमेशा पाकिस्तान समेत अपने सभी पड़ोसी देशों से अच्छे संबंध चाहता है. मगर अच्छे संबंधों के लिए आतंकवाद को नजरअंदाज नहीं कर सकता. भारत सरकार लगातार ये बात कहती आई है. मगर, अब कांग्रेस के नेता शशि थरूर ने जापान टाइम्स में एक लेख लिखकर भारत-पाकिस्तान रिश्तों को बहुत ही गहराई और तथ्यात्मक तरीके से रखा है. पढ़िए शशि थरूर का लेख- 

दशकों तक, दक्षिण एशिया संघर्ष मैनेजमेंट के एक कभी न खत्म होने वाले चक्र में फंसा रहा. भारत और पाकिस्तान के बीच छोटी-मोटी सैन्य झड़पें होती थीं, फिर तनाव कम होता था और औपचारिक शांति वार्ता फिर से शुरू हो जाती थी, लेकिन अंततः यह सब फिर से किसी नए संघर्ष की ओर ले जाता था.
लेकिन अब यह सिलसिला टूट गया है. 2016 के बाद से दोनों देशों के बीच कोई उच्च-स्तरीय बातचीत नहीं हुई है. यह केवल कुछ समय के लिए कूटनीतिक नाराजगी भर नहीं है, बल्कि भारत की विदेश नीति में आए एक बड़े बदलाव को दर्शाता है, जिसने उपमहाद्वीप के सुरक्षा ढांचे को स्थायी रूप से बदल दिया है.

इस गतिरोध की जड़ें पिछली कूटनीति की संरचनात्मक विफलताओं में खोजी जा सकती हैं. 1947, 1965 और 1971 में पाकिस्तान ने पारंपरिक युद्ध शुरू किए, लेकिन इनमें से किसी से भी उसे मनचाहे नतीजे नहीं मिले. तीसरे युद्ध का परिणाम यह हुआ कि पाकिस्तान के दो टुकड़े हो गए और एक स्वतंत्र देश ‘बांग्लादेश’ का जन्म हुआ.

इन अनुभवों, और साथ ही 1980 के दशक के आखिर में अफगानिस्तान में सोवियत सेना के खिलाफ अमेरिका समर्थित मुजाहिदीनों की सफलता ने पाकिस्तान की सेना को एक नई रणनीति अपनाने के लिए प्रेरित किया. यह रणनीति ‘असममित युद्ध’ पर आधारित थी — या सीधे शब्दों में कहें तो, आतंकवाद पर. 1989 से 1993 के बीच, जब भारत में आतंकवादी हमलों की वजह से बड़ी संख्या में आम नागरिक मारे गए, तब पाकिस्तानी अधिकारी डींगें हांकते हुए कहते थे कि वे “भारत को ‘हजार घाव’ देकर धीरे-धीरे खत्म कर देंगे.”

इसके बावजूद, भारतीय नेताओं को पूरा भरोसा था कि व्यवस्थित बातचीत के जरिए वे पाकिस्तान को इस रणनीति को छोड़ने के लिए मना सकते हैं. इसी विश्वास के चलते 1990 के दशक के आखिर में ‘कंपोजिट डायलॉग’ (व्यापक बातचीत) ढांचे की शुरुआत हुई. यह एक प्रशासनिक तंत्र था जिसे इस तरह तैयार किया गया था कि कश्मीर से लेकर व्यापार और मानवीय मुद्दों जैसे विवादित विषयों को अलग-अलग रखा जा सके, ताकि किसी एक मुद्दे पर होने वाला टकराव अन्य क्षेत्रों में हो रही प्रगति को बाधित न करे.

बस एक समस्या थी: भारत की शांति की हर बड़ी पहल के जवाब में कोई न कोई सैन्य या आतंकवादी उकसावे की कार्रवाई हुई, जिसे रोकने में पाकिस्तानी सरकार या तो असमर्थ थी या फिर वह रोकना ही नहीं चाहती थी. 1999 में, जब तत्कालीन भारतीय प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने एक ऐतिहासिक शांति घोषणापत्र पर हस्ताक्षर करने के लिए लाहौर तक बस यात्रा की, तो उसी समय पाकिस्तानी सैनिक लद्दाख के कारगिल जिले में घुसपैठ कर रहे थे — इसी के चलते कारगिल युद्ध हुआ (जिसमें पाकिस्तान की हार हुई). 2008 में, जब पर्दे के पीछे की कूटनीति कश्मीर मुद्दे का कोई ऐसा समाधान निकालने के करीब थी जिसमें सीमाओं में बदलाव की जरूरत नहीं पड़ती, तब पाकिस्तान स्थित आतंकवादियों ने मुंबई में सुनियोजित आतंकी हमले किए, जिनमें 166 निर्दोष नागरिक मारे गए.

रिश्तों का टर्निंग प्वाइंट

इस घटनाक्रम ने पाकिस्तान के भीतर मौजूद एक गहरे संस्थागत बिखराव को उजागर कर दिया. वहां की नागरिक सरकारों के पास न तो इतनी ताकत थी और न ही वे इतने लंबे समय तक सत्ता में रहीं कि बातचीत की मेज पर किए गए वादों को पूरा कर सकें. वहीं, पाकिस्तान का सैन्य-खुफिया तंत्र भारत के साथ शांति को अपने घरेलू वर्चस्व के लिए एक बड़े खतरे के रूप में देखता था.

अब, भारत का धैर्य जवाब दे चुका है. मगर फिर भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शुरुआत में शांति स्थापित करने के उसी पुराने तरीके को अपनाया. उन्होंने 2014 में अपने शपथ ग्रहण समारोह में पाकिस्तान के तत्कालीन प्रधानमंत्री नवाज शरीफ को आमंत्रित किया, और अगले साल वे खुद लाहौर गए. यहां तक ​​कि जब इस दौरे के बाद पठानकोट में भारतीय वायुसेना अड्डे पर आतंकी हमला हुआ, तब भी मोदी ने शरीफ को इस घटना की आधिकारिक जांच में शामिल होने का न्योता दिया.

फिर एक ऐसी घटना घटी जिसने रही-सही कसर भी पूरी कर दी: पाकिस्तान की संयुक्त जांच टीम ने यह निष्कर्ष निकाला कि यह हमला “भारत द्वारा पाकिस्तान को बदनाम करने के लिए रचा गया एक नाटक” था. इसके बाद, भारत ने ‘रणनीतिक संयम’ की अपनी नीति को त्याग दिया और एक नया सिद्धांत अपनाया: “बातचीत और आतंकवाद एक साथ नहीं चल सकते”. भारत तभी बातचीत की मेज पर वापस आएगा, जब पाकिस्तान अपने यहां से संचालित आतंकवादी नेटवर्कों को पूरी तरह से और सत्यापन योग्य तरीके से खत्म कर देगा.

इस राजनयिक बदलाव के साथ-साथ भारत की सैन्य नीति में भी एक बुनियादी परिवर्तन आया. लगभग तीन दशकों तक, पाकिस्तान को यह लगता रहा कि उसके सामरिक परमाणु हथियारों के कारण भारत, आतंकवादी हमलों के जवाब में कोई पारंपरिक सैन्य कार्रवाई करने से डरेगा. लेकिन फिर भारत ने पाकिस्तान के इस भ्रम को तोड़ने का फैसला किया — जिसका सबसे प्रमुख उदाहरण पिछले साल का “ऑपरेशन सिंदूर” था.

सीमा पार सर्जिकल स्ट्राइक से लेकर पाकिस्तानी क्षेत्र के भीतर गहराई में स्थित आतंकवादी बुनियादी ढांचे पर सटीक हवाई हमलों जैसी जवाबी कार्रवाइयों के जरिए, भारत ने यह दिखा दिया कि वह अपने पड़ोसी देश को भारी नुकसान पहुंचाने के लिए तनाव बढ़ने के जोखिम को उठाने को भी तैयार है. यह स्पष्ट संकेत देकर कि प्रायोजित आतंकवाद का जवाब निश्चित रूप से पारंपरिक सैन्य कार्रवाई से दिया जाएगा, भारत ने दक्षिण एशिया में ‘डिटरेंस’ (प्रतिरोध) के नियमों को फिर से लिखने की कोशिश की है.

आगे रिश्तों का भविष्य

मौजूदा गतिरोध बिल्कुल भी ठीक नहीं है. परमाणु हथियारों से लैस पड़ोसी देशों के बीच कूटनीतिक बातचीत का कोई रास्ता न होना, क्षेत्रीय और वैश्विक स्थिरता के लिए गंभीर खतरा पैदा करता है. मानवीय मुद्दों, व्यापारिक रुकावटों और पानी के बंटवारे जैसे बुनियादी द्विपक्षीय मामलों को भी अब ‘राष्ट्रीय सुरक्षा’ के चश्मे से देखा जा रहा है, जिसमें राजनीति बहुत ज्यादा हावी हो गई है. और अगर कोई नया संकट खड़ा हो जाता है, तो उसे संभालने के लिए कौन सा तंत्र मौजूद है? अब किसी भी गलत फैसले की गुंजाइश बहुत कम है, और ऐसी गलती बहुत खतरनाक साबित हो सकती है.

लेकिन कूटनीतिक स्तर पर किसी बड़ी सफलता की उम्मीद न के बराबर है. पाकिस्तान का सैन्य नेतृत्व आज भी अपनी घरेलू राजनीतिक वैधता को, कुछ हद तक, भारत के प्रति दुश्मनी से जोड़कर देखता है—भले ही उनका देश गहरे आर्थिक संकट से जूझ रहा हो. वहीं, भारत के पास अपनी बढ़ती आर्थिक ताकत और पारंपरिक सैन्य बढ़त को देखते हुए, अपने मुख्य सुरक्षा हितों से समझौता करने का कोई ठोस कारण नहीं है.

अमेरिका भी भारत को अपने इस रुख पर पुनर्विचार करने के लिए प्रोत्साहित नहीं कर रहा है. डोनाल्ड ट्रंप के प्रशासन ने न केवल अमेरिका की ‘इंडो-पैसिफिक’ रणनीति को लगभग छोड़ ही दिया है—जिसमें उभरते चीन को संतुलित करने के लिए भारत एक अहम भूमिका निभाता था—बल्कि उसने पाकिस्तान को भी गले लगा लिया है. पाकिस्तान, जो खुद आर्थिक अस्थिरता से जूझ रहा है और चीन के काफी करीब है, उसने ट्रंप से जुड़ी एक कंपनी के साथ क्रिप्टोकरेंसी का एक फायदेमंद सौदा करके और ट्रंप को नोबेल शांति पुरस्कार के लिए नामांकित करके अमेरिकी प्रशासन को खुश कर लिया है.

भारत-पाकिस्तान संघर्ष की जड़ें बहुत गहरी हैं, इसलिए मौजूदा गतिरोध को बातचीत के दौरों के बीच का एक ठहराव नहीं, बल्कि ‘अलग होने’ की एक सोची-समझी रणनीति का हिस्सा माना जाना चाहिए. जब ​​तक पाकिस्तान में कोई ऐसा राजनीतिक बदलाव न आए जो उसकी सुरक्षा संबंधी सोच को पूरी तरह बदल दे, या कोई ऐसी अप्रत्याशित घटना न घटे जो क्षेत्रीय प्राथमिकताओं को नए सिरे से तय करने पर मजबूर कर दे, तब तक पूरे उपमहाद्वीप में यह खामोशी बनी रहेगी — और किसी बड़ी और विनाशकारी गलती का खतरा भी बना रहेगा.

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