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मायावती, अखिलेश और चंद्रशेखर में मेरठ कांड के बाद क्यों मची होड़, क्या है 200 सीटों वाला गेम | why akhilesh yadav chandrashekhar azad and mayawati fight on lalita gautam murder



लखनऊ:

मेरठ की दलित छात्रा ललिता गौतम हत्याकांड से यूपी की राजनीति भी गरमा गई है. पीड़ित परिवार से सपा सांसद इकरा हसन के साथ जाकर अखिलेश यादव ने मुलाकात की है. इसके अलावा अपने तीखे तेवरों के लिए चर्चित चंद्रशेखर आजाद ने भी ललिता के परिवार वालों से एक टोल पर मुलाकात की. उन्हें परिवार से मिलने घर तक नहीं जाने दिया गया था. यही नहीं चंद्रशेखर की आजाद समाज पार्टी के समर्थकों ने बवाल भी काटा और पुलिस से भी झड़प के हालात बन गए. इसी को लेकर मायावती ने तंज कसा कि कुछ लोग दलितों को उकसा रहे हैं. 

इस मामले में चंद्रशेखर आजाद ने प्रतिक्रिया भी दी और मायावती से कहा कि वह घर में बैठकर ही ट्वीट करती हैं. आखिर पीड़ितों से मिलने के लिए क्यों नहीं निकलतीं. यूपी विधानसभा चुनाव से कुछ पहले हुई इस घटना को लेकर राजनीतिक दलों की सक्रियता बता रही है कि आने वाले समय में दलित वोट कितना महत्वपूर्ण हो सकता है. यही कारण है कि मायावती और चंद्रशेखर पहली बार इस मामले में आमने-सामने आ गए. अब तक दोनों के बीच इशारों में ही वार-प्रतिवार होते थे. पहली बार मायावती ने उनका नाम लेकर हमला किया और चंद्रशेखर आजाद ने भी फिर खुलकर जवाब दिया. अब सवाल है कि आखिर एक घटना पर तीन दलों के नेता क्यों आमने-सामने हैं.

इसकी वजह दलित वोटों का 21 फीसदी वाला गणित और 200 सीटों का समीकरण माना जा रहा है. आंकड़े बताते हैं कि यूपी में दलित वोट बैंक किसी भी दल की किस्मत बदलने की ताकत रखता है. यूपी की कुल आबादी में दलित करीब 21 प्रतिशत हैं. सूबे में 84 विधानसभाएं दलितों के लिए आरक्षित हैं. इसके अलावा समाज के वोटर यूपी की 140 से अधिक सीटों पर सीधे परिणाम तय करते हैं, जबकि 60 से 70 सीटों पर वे निर्णायक भूमिका में होते हैं. ऐसे में सपा, बसपा और चंद्रशेखर आजाद उनकी अनदेखी नहीं करना चाहते. बसपा जिस दौर में कमजोर है, उसमें अखिलेश यादव इस जमीन को हथियाना चाहते हैं. 

अखिलेश ने कांशीराम और आंबेडकर जयंती भी नीले गमछे में मनाई

आंकड़े साफ करते हैं कि बसपा की ताकत उसका जाटव वोट बैंक रहा है. चंद्रशेखर आजाद सीधे तौर पर मायावती के इसी सबसे मजबूत जाटव वोट बैंक में सेंधमारी करने की कोशिश कर रहे हैं. वहीं, अखिलेश यादव का ‘PDA’ फॉर्मूला भाजपा के पास गए गैर-जाटव दलितों और बसपा के पारंपरिक वोट बैंक को अपनी तरफ खींचने की जुगत में है. जहां संभव है, वहां जाटवों को भी अखिलेश लुभाने में जुटे हैं. बता दें कि कांशीराम जयंती, आंबेडकर जयंती मनाने में सपा आगे रही है. अखिलेश यादव खुद नीले गमछे में भी नजर आए थे. इसके पीछे वजह यही है कि 200 सीटों पर दलित समाज का असर है. 

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