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महाराष्ट्र की सियासत को हिलाने वाले मनोज जरांगे अपने ही गांव में क्यों हारे? 3 साल से सजे मंच का पैकअप, महिलाएं भी खिलाफ | manoj jarange patil stage was removed antarwali sarati village jalna in maratha agitation in maharashtra



मनोज जरांगे पाटिल का अनशन खत्म हो चुका है. इस बीच मराठा आरक्षण आंदोलन का केंद्र बने जालना जिले के अंतरवाली सराटी गांव से मनोज जरांगे के अनशन के लिए बनाया गया मंडप और मंच भी हटा दिया गया है. करीब तीन साल से ज्यादा समय तक आंदोलन का केंद्र रहा यह मंडप अब इतिहास बन गया है. हालांकि मनोज जरांगे पाटिल ने साफ कर दिया है कि मंच भले हट गया हो, लेकिन आंदोलन खत्म नहीं हुआ है. उन्होंने सरकार को तीन महीने का अल्टीमेटम देते हुए चेतावनी दी है कि मांगें पूरी नहीं हुईं तो आंदोलन पाटोदा से आगे बढ़ते हुए मुंबई तक पहुंच सकता है.

अंतरवाली सराटी गांव का था आंदोलन का केंद्र

जालना जिले का अंतरवाली सराटी गांव मराठा आरक्षण आंदोलन का सबसे बड़ा केंद्र माना जाता है. 29 अगस्त 2023 को शुरू हुए आंदोलन के दौरान यहां अनशन के लिए एक मंडप और विशाल मंच बनाया गया था. लगभग तीन साल और 27 दिनों तक यह मंच आंदोलन का प्रतीक बना रहा. लेकिन अब ग्राम पंचायत, स्थानीय ग्रामसभा और आंदोलन की कोर कमेटी के बीच हुई चर्चा के बाद इस मंच को हटाने का फैसला लिया गया. निर्णय के कुछ घंटों के भीतर ही पूरा मंडप और मंच हटा दिया गया. हालांकि उनका मनोज जरांगे का कहना है कि अब आंदोलन राज्य के किसी भी हिस्से में हो सकता है. चाहे वह येवला हो, परळी हो, पाटोदा हो या फिर पश्चिम महाराष्ट्र का कोई इलाका. आंदोलन जारी रहेगा और जरूरत पड़ने पर इसे नए स्वरूप में आगे बढ़ाया जाएगा.

मनोज जरांगे ने गांव के लोगों का जताया आभार 

मनोज जरांगे पाटिल ने अंतरवाली सराटी के ग्रामीणों का आभार भी व्यक्त किया. उन्होंने कहा कि आंदोलन के दौरान गांव के लोगों ने हर संभव सहयोग किया. कई लोगों ने अपनी जमीन आंदोलन के लिए उपलब्ध कराई, तो कई लोगों ने संघर्ष के दौरान कठिनाइयों का सामना किया. उन्होंने कहा कि यह आंदोलन सिर्फ एक गांव का नहीं बल्कि पूरे मराठा समाज के अधिकारों का आंदोलन है और इसे आगे भी जारी रखा जाएगा. 

महिलाओं ने उठाए सवाल 

हालांकि इसी गांव की ललिता तारख ने अब मनोज जरांगे पाटील के खिलाफ नाराजगी जाहिर की है. उन्होंने कहा कि 29 अगस्त को जब आंदोलन शुरू हुआ था, तब वे खुद जरांगे के साथ थीं और उनके चौथे अनशन को खत्म कराने में भी उनकी भूमिका रही थी. तारख का कहना है कि आंदोलन के दौरान गांव के लोगों ने दिन-रात मेहनत की. चाय-पानी, भोजन और अन्य व्यवस्थाओं की जिम्मेदारी गांव वालों ने संभाली, लेकिन बदले में उन्हें कोई फायदा नहीं मिला. ललिता तारख ने कहा कि अंतरवाली सराटी में हैदराबाद गजट के आधार पर कुणबी प्रमाणपत्र के लिए उन्होंने आवेदन किया था. आवेदन किए हुए करीब दस महीने बीत चुके हैं, लेकिन अब तक कोई लाभ नहीं मिला. उन्होंने सवाल उठाया कि आंदोलन के नाम पर लगातार आश्वासन दिए गए, लेकिन जिन लोगों ने आंदोलन को सफल बनाने के लिए संघर्ष किया, उन्हें आज तक आरक्षण का प्रत्यक्ष लाभ क्यों नहीं मिला। उन्होंने मांग की कि मनोज जरांगे इस सवाल का जवाब दें. 

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123 गांव के लोगों की उम्मीदें बिखरी 

ललिता तारख ने आरोप लगाया कि आंदोलन के दौरान महिलाओं की भावनाओं का इस्तेमाल किया गया. उन्होंने कहा कि गांव की माताएं और बहनें आंदोलन स्थल पर रात-रात भर रुकती थीं. लेकिन आज उनकी समस्याओं का समाधान नहीं हुआ. तारख ने कहा कि आंदोलन के दौरान लोगों को भावनात्मक रूप से जोड़ा गया, लेकिन अब उन्हें लगता है कि उनसे किए गए कई वादे पूरे नहीं हुए हैं. उन्होंने यह भी दावा किया कि अंतरवाली सराटी ही नहीं, बल्कि 123 गांवों के लोगों को भी आंदोलन के नाम पर उम्मीदें दिखाई गईं. उनका कहना है कि यदि बड़े पैमाने पर कुणबी नोंदों का लाभ मिला है, तो उसके स्पष्ट आंकड़े सामने लाए जाने चाहिए. ललिता तारख ने यह भी आरोप लगाया कि गांव वालों ने आंदोलन बचाने के लिए हरसंभव प्रयास किया, लेकिन मंच हटाए जाने के समय मनोज जरांगे ने अपेक्षित भूमिका नहीं निभाई. 

तारख ने कहा कि जब आंदोलन का मंडप हटाने की कोशिश की जा रही थी, तब गांव की कई महिलाएं वहां मौजूद थीं और उन्होंने मंडप को बचाने का प्रयास किया. उनका आरोप है कि उस समय आंदोलन का नेतृत्व करने वाले लोग आगे नहीं आए. उन्होंने चेतावनी देते हुए कहा कि जरूरत पड़ने पर वे आंदोलन और अनशन से जुड़े कई मुद्दों पर खुलकर बोलेंगी. 

इनपुट: राजश्री बब्रुवन वाघमारे

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