खबर

बेटे के इंतजार में बीती जिंदगी, फिर खुद ही सजाई चिता, 12 इंटरनेशनल अवॉर्ड जीतकर दुनियाभर में छाई ये फिल्म | waited 28 years for his son then built his own pyre this true story of uttarakhand left the world in tears won 12 international awards



पहाड़ों की खूबसूरत वादियां, कल-कल बहती नदियां, नीला आसमान और ठंडी हवाएं… उत्तराखंड का नाम सुनते ही मन में ऐसी ही तस्वीर उभरती है. शहरों की भागदौड़ से दूर पहाड़ों में कुछ दिन बिताना भले ही सुकून का एहसास कराता हो, लेकिन वहां रहने वाले लोगों की जिंदगी इतनी आसान नहीं होती. सड़क, अस्पताल, बिजली और दूसरी बुनियादी सुविधाओं की कमी पहाड़ी इलाकों में रहने वालों के लिए बड़ी परेशानी है. पलायन के कारण कई गांव धीरे-धीरे खाली हो रहे हैं. इसी दर्द, अकेलेपन और रिश्तों की गहराई को दिखाती है फिल्म ‘पायरे’ (Pyre), जिसने अपनी सादगी और भावुक कहानी से दुनियाभर के दर्शकों का दिल जीत लिया है.

क्या है ‘पायरे’ की कहानी? 

‘पायरे’ का मतलब चिता होता है. फिल्म की कहानी उत्तराखंड के कुमाऊं क्षेत्र के एक दूरदराज गांव में रहने वाले 80 साल के पदम सिंह और उनकी पत्नी तुलसी के इर्द-गिर्द घूमती है. गांव में न सड़क है, न अस्पताल और न ही बिजली की पर्याप्त सुविधा. पलायन के चलते ज्यादातर लोग यहां से जा चुके हैं. बुजुर्ग दंपति के अलावा गांव में महज सात लोग बचे हैं.

एक दिन तुलसी की तबीयत बिगड़ जाती है. पदम उसे अस्पताल पहुंचाने के लिए गांव के दो युवाओं से मदद मांगता है. इसके बदले वह अपनी बकरियां तक देने को तैयार हो जाता है. डॉक्टर तुलसी को दोबारा जांच के लिए बुलाता है, लेकिन समस्या यह है कि गांव के दोनों नौजवान भी वहां से जाने की तैयारी कर रहे हैं. ऐसे में पदम के सामने सबसे बड़ा सवाल अपनी पत्नी को अस्पताल पहुंचाने का खड़ा हो जाता है.

इस मुश्किल के बीच दोनों को अपने बेटे की याद भी सताती है, जो 28 साल पहले शहर चला गया था. एक दिन उसके लौटने की खबर मिलती है. बुजुर्ग दंपति खुश हो जाते हैं, लेकिन उनका इंतजार खत्म नहीं होता. धीरे-धीरे गांव में उनके साथ रहने वाले लोग भी चले जाते हैं. अब उन्हें अपने अंतिम समय और अंतिम संस्कार की चिंता सताने लगती है.

पति की मौत के बाद अकेली रह गई तुलसी

पदम एक दिन घर के बाहर दो चिताएं बनाता है और तुलसी के सामने साथ में जान देने की बात रखता है. उसका मानना है कि कम से कम गांव में बचे लोग उनका अंतिम संस्कार कर सकेंगे. हालांकि तुलसी इस बात को गंभीरता से नहीं लेती. लेकिन एक सुबह उसकी जिंदगी पूरी तरह बदल जाती है. पदम चिता पर लेटा मिलता है और काफी कोशिशों के बाद भी नहीं उठता. तुलसी अपने जीवनसाथी को खो देती है और अकेले ही उसका अंतिम संस्कार करती है. कुछ समय बाद बेटे के नाम से एक और चिट्ठी आती है. इसके बाद तुलसी जो खुलासा करती है, वह फिल्म की कहानी को एक बेहद भावुक मोड़ पर पहुंचा देता है.

सच्ची घटना से प्रेरित है फिल्म

निर्देशक विनोद कापड़ी ने इस फिल्म को उत्तराखंड के मुनस्यारी में मिले एक वास्तविक बुजुर्ग दंपति की जिंदगी से प्रेरित होकर बनाया है. ट्रैकिंग के दौरान उनकी मुलाकात इस दंपति से हुई थी. उनकी जिंदगी और संघर्ष ने निर्देशक को इतना प्रभावित किया कि उन्होंने इस कहानी को फिल्म के रूप में दुनिया के सामने लाने का फैसला किया. फिल्म बनाने में उन्हें करीब आठ साल लगे. इसमें पदम सिंह कापरी और हीरा देवी ने मुख्य किरदार निभाए हैं.

‘पायरे’ को कई प्रतिष्ठित अंतरराष्ट्रीय फिल्म समारोहों में सराहना मिली है. फिल्म ने टालिन ब्लैक नाइट्स फिल्म फेस्टिवल में ऑडियंस अवॉर्ड, लंदन और बर्मिंघम इंडियन फिल्म फेस्टिवल में बेस्ट फिल्म ऑडियंस अवॉर्ड और शिकागो साउथ एशियन फिल्म फेस्टिवल में ऑडियंस च्वॉइस अवॉर्ड समेत कई सम्मान हासिल किए. इसके अलावा स्टटगार्ट, नोवी साद और एशियन समर फिल्म फेस्टिवल में भी फिल्म को पुरस्कार मिले.

ये भी पढ़ें: 60 साल पुराना गाना, गुरु दत्त की फिल्म से किया गया था डिलीट, 4 साल बाद 30 साल के धर्मेंद्र का वही गीत, हेमंत कुमार की आवाज में हुआ अमर

करीब 115 मिनट की यह फिल्म सिर्फ एक बुजुर्ग जोड़े की कहानी नहीं है, बल्कि पहाड़ों से हो रहे पलायन, बदलते सामाजिक रिश्तों और बुढ़ापे में अकेलेपन की गंभीर तस्वीर पेश करती है. 30 अक्टूबर को सिनेमाघरों में रिलीज हुई इस फिल्म को दर्शकों की ओर से सकारात्मक प्रतिक्रिया मिल रही है. बड़े सितारों और भारी बजट के बिना बनी ‘पायरे’ यह दिखाती है कि सिनेमा की असली ताकत एक सच्ची और दिल को छू लेने वाली कहानी में होती है.
 




Source link

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button