
मेवाड़ के इतिहास में अहम स्थान रखने वाली ‘पन्नाधाय’ की जाति को लेकर विवाद गहरा गया है. पुस्तक ‘भारत के नारी रत्न’ में पन्नाधाय को ‘खींची राजपूत वंश की क्षत्राणी’ बताया गया है. जबकि गुर्जर समाज का कहना है कि वह गुर्जर जाति से थीं. इस मामले में मेवाड़ के इतिहास की जानकारी रखने वाले प्रसिद्ध इतिहासकार प्रो. चंद्रशेखर शर्मा ने भी राय रखी. पन्नाधाय को 16वीं शताब्दी की मेवाड़ की एक महान वीरांगना के रूप में याद किया जाता है, जिन्होंने राणा सांगा के छोटे पुत्र और महाराणा प्रताप के पिता उदयसिंह की जान बचाने के लिए अपने ही सगे पुत्र चंदन का बलिदान दे दिया था. प्रो. शर्मा ने महाराणा प्रताप पर रिसर्च की है और उनके ही तथ्यों के आधार पर पहली बार ‘हल्दीघाटी युद्ध में प्रताप विजेता रहे’ का अध्याय पाठ्यपुस्तक में भी जोड़ा गया. उन्होंने मेवाड़ से जुड़े इतिहास के तथ्यों पर एनडीटीवी से खास बातचीत की.
ऐसे शुरू हुआ विवाद
दरअसल, सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय के प्रकाशन विभाग द्वारा 2022 में (आठवां पुनर्मुद्रण) प्रकाशित पुस्तक ‘भारत के नारी रत्न’ के पृष्ठ संख्या 8 पर पन्नाधाय की जीवनी दी गई है. इसमें उनकी मूल ऐतिहासिक पहचान और जाति (गुर्जर) को बदलकर उन्हें ‘खींची राजपूत वंश की क्षत्राणी’ दर्शाया गया है. गुर्जर समाज की सेवा समिति ने इस तथ्यों का बदलना पन्नाधाय के बलिदान का अपमान बताया है. गुर्जर समाज ने कहा कि आने वाली पीढ़ियों के सामने गलत इतिहास परोसने का गंभीर कृत्य है.

‘भारत के नारी रत्न’ पुस्तक में पन्नाधाय की जाति को लेकर विवाद
क्या कहते हैं इतिहासकार?
प्रो. चंद्रशेखर शर्मा का कहना है कि पन्नाधाय एक संज्ञा नहीं, बल्कि विशेषण है, जिन्होंने स्वामिभक्ति, वात्सल्य और राष्ट्रनिष्ठा(मेवाड़) त्याग और बलिदान का अनूठा उदाहरण पेश किया. उन्होंने बताया कि उनकी जाति को लेकर भ्रांति या विवाद की शुरुआत ब्रिटिश अधिकारी और इतिहासकार कर्नल जेम्स टॉड से हुई, जिसे इतिहास की किताब ‘वीर विनोद’ में भी दोहराया गया. कर्नल टॉड सामाजिक जातिगत ज्ञान से अनभिज्ञ था.
इतिहासकार के मुताबिक, “राजपूतों के अलावा खींची गोत्र गुर्जरों में भी मिलती है. गुर्जर प्रतिहार वंशों के मूल इतिहास को देखेंगे तो इनके समाज की गोत्र परंपरा मिलती जुलती रही. धायभाई , जिसे आज धाबाई गोत्र से जाना जाता है, उसका संबंध गुर्जर जाति से है. इन्हें जो जागीर और हवेलियां दी गईं, उनके उल्लेख ऐतिहासिक ताम्रपत्र में भी उपलब्ध है.”

प्रो. चंद्रशेखर शर्मा रिसर्च के आधार पर ‘राष्ट्ररत्न महाराणा प्रताप’ पुस्तक लिख चुके हैं.
प्रो. शर्मा बताते हैं कि उदयसिंह ने राजस्थान का शहर उदयपुर बसाया. वहां गोवर्धन विलास की जमीनें गुर्जरों को अनुदान में दी गई और उन्हें यह जमीन उदयपुर के सिटी पैलेस के पास दी. ये अनुदान खींची राजपूतों को नहीं मिले, जिससे यह साबित होता है कि उसका संबंध गुर्जर जाति से है.
ऐतिहासिक प्रमाण
पन्नाधाय का परिवार और उनका ससुराल गुर्जर वंश से ताल्लुक रखता था. इसका जिक्र शिशुपाल सिंह हाकड़ा की रिसर्च ‘पन्नाधाय गुर्जर’ और राजेंद्र शंकर भट्ट की किताब ‘मेवाड़ के महाराणा और शहंशाह अकबर’ में भी मिलता है. इसके अलावा फतेहलाल गुर्जर की किताब पन्नाधाय गुर्जर (प्रकाशक- राजस्थानी ग्रंथागार), उदयलाल धाबाई की किताब मेवाड़ का ऐतिहासिक इतिहास और धाबाई वंश में भी मिलता है.
हालांकि, प्रसिद्ध इतिहासकार गौरी शंकर हीराचंद ओझा की किताब ‘उदयपुर राज्य का इतिहास’ में सिर्फ पन्नाधाय लिखा गया. उन्होंने एक अन्य पुस्तक ‘प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास’ पुस्तक में गुर्जर जाति की धाय परंपरा का जिक्र किया है. राजस्थान सरकार के कला एवं संस्कृति विभाग के पैनोरमा से मिले प्रमाण भी गुर्जर जाति से जुड़े तथ्यों को सही साबित करते हैं.
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