
श्रीनगर (जम्मू-कश्मीर): शारदीय नवरात्रि के पावन अवसर पर कश्मीर घाटी का माहौल पूरी तरह भक्तिमय हो उठा है. नवरात्रि के दूसरे दिन श्रीनगर के डलगेट इलाके में मौजूद ऐतिहासिक दुर्गा नाग मंदिर में श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ी. सुबह से ही मंदिर परिसर में माता के जयकारों और वैदिक मंत्रोच्चार की गूंज सुनाई दी.
इस दौरान एक विशेष महापूजा का आयोजन हुआ, जिसमें शामिल सैकड़ों भक्तों ने माता रानी के चरणों में शीश नवाकर पूरे जम्मू-कश्मीर में अमन, शांति और समृद्धि के लिए सामूहिक प्रार्थना की.
आस्था का केंद्र: शंकराचार्य पहाड़ी की गोद में बसा धाम
डलगेट में प्रसिद्ध शंकराचार्य पहाड़ी की तलहटी में स्थित यह मंदिर सदियों पुराना और ऐतिहासिक है. नवरात्रि के इन नौ पवित्र दिनों के दौरान यह स्थान स्थानीय कश्मीरी पंडितों के साथ-साथ देश के अलग-अलग हिस्सों से आए पर्यटकों और श्रद्धालुओं के लिए आस्था का प्रमुख केंद्र बन जाता है. मंदिर परिसर को फूलों और रंग-बिरंगी रोशनियों से भव्य रूप से सजाया गया है. स्थानीय लोगों के अनुसार, यहाँ आने मात्र से मन को अद्भुत शांति और आध्यात्मिक ऊर्जा का अनुभव होता है.
कलश यात्रा और पारंपरिक अनुष्ठान से हुई शुरुआत
उत्सव की शुरुआत नवरात्रि के पहले दिन पारंपरिक ‘घटस्थापना’ (पवित्र कलश की स्थापना) के साथ विधिवत संपन्न हुई. इस दौरान एक भव्य कलश यात्रा निकाली गई. कश्मीरी सनातन परंपरा के अनुसार, श्रद्धालु पवित्र नदी और स्थानीय प्राकृतिक जल स्रोतों (झरनों) से जल भरकर मंदिर परिसर लेकर आए, जिससे घटस्थापना और पूजा-अर्चना के विधान शुरू किए गए. पूरे नौ दिनों तक चलने वाले इस अनुष्ठान में प्रतिदिन दुर्गा सप्तशती का पाठ और हवन का आयोजन किया जा रहा है.
प्राचीन ‘शक्ति पूजा’ परंपरा और आदि शंकराचार्य का संबंध
दुर्गा नाग मंदिर की जड़ें कश्मीर की सदियों पुरानी ‘शक्ति पूजा’ परंपरा से जुड़ी हैं. इतिहास और मान्यताओं के अनुसार:
- शारदा मठ के रूप में पहचान: इस पवित्र स्थल को पहले ‘शारदा मठ’ के नाम से जाना जाता था.
- आदि शंकराचार्य का आगमन: मान्यता है कि 8वीं शताब्दी ईस्वी में जब जगद्गुरु आदि शंकराचार्य कश्मीर प्रवास पर आए थे, तब वे इसी पावन स्थल पर ठहरे थे और साधना की थी.
- शक्ति और शिव का अद्भुत संगम: परिसर में माँ दुर्गा और देवाधिदेव महादेव (भगवान शिव) दोनों के विग्रह स्थापित हैं, जो शैव और शाक्त परंपरा के सुंदर समन्वय को दर्शाते हैं.
क्या है ‘दुर्गा नाग’ नाम का रहस्य?
कश्मीरी भाषा में प्राकृतिक जल स्रोतों या भूमिगत मीठे पानी के झरनों को ‘नाग’ कहा जाता है. मंदिर परिसर के भीतर एक अत्यंत पवित्र और अविरल भूमिगत जल स्रोत बहता है. इस प्राकृतिक जल कुंड (नाग) के कारण ही इस धाम का नाम ‘दुर्गा नाग’ पड़ा. श्रद्धालु इस पवित्र जल को चरणामृत के रूप में ग्रहण करते हैं.
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