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तीन महीने और एकतरफा तलाक… क्या है मुस्लिमों की तलाक-ए-हसन प्रथा, जिस पर अब सुप्रीम कोर्ट करेगा सुनवाई | what is talaq e hasan muslim divorce practice supreme court hearing



नई दिल्ली:

मुस्लिमों में तीन तलाक पर भले ही कानूनी रोक लग गई हो, लेकिन तलाक को लेकर अब भी कुछ प्रथाएं जारी हैं. इसे ही तलाक-ए-हसन और तलाक-ए-अहसन जैी प्रथाओं के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में कई याचिकाएं दायर हुई थीं, जिन पर अब सुनवाई शुरू होने वाली है. सुप्रीम कोर्ट इन याचिकाओं पर 27 अक्टूबर को सुनवाई करेगा.

इस मामले पर सुप्रीम कोर्ट पहले ही नोटिस जारी कर चुका है. अगर सरकार की तरफ से या अन्य पक्षकारों की तरफ से इस मामले में कोई जवाब नहीं दिया जाता तो भी 27 अक्टूबर से 10 मुस्लिम महिलाओं की तरफ से दाखिल याचिकाओं पर सुनवाई शुरू हो जाएगी.

क्या है पूरा मामला?

सुप्रीम कोर्ट में पत्रकार बेनजीर हीना समेत कई महिलाओं ने याचिकाएं दाखिल की थीं. इसमें मुस्लिमों की तलाक प्रथाओं को चुनौती दी गई थी. 

पत्रकार बेनजीर हीना ने अपनी याचिका में तलाक-ए-हसन को संविधान के अनुच्छेद 14, 15, 21 और 25 के तहत मिले मौलिक अधिकारों का उल्लंघन बताया था. उन्होंने सुप्रीम कोर्ट का तब रुख किया था जब उनके पति ने कथित तौर पर तलाक-ए-हसन का नोटिस भेज दिया था.

उनके अलावा और कई महिलाओं ने याचिका में आरोप लगाया है कि उनके पति ने उन्हें वॉट्सऐप या ईमेल के जरिए तलाक भेज दिया. कुछ की शिकायत यह है कि उनके अशिक्षित होने का फायदा उठाते हुए उनके पति ने कोरे कागज पर उनसे दस्तखत करवा लिए.

चीफ जस्टिस सूर्यकांत की अगुवाई वाली बेंच के सामने इन प्रथाओं पर रोक लगाने की मांग की गई है. अदालत को बताया गया है कि कुछ मुस्लिम पुरुष वॉट्सऐप और ईमेल के जरिए वर्चुअल तलाक देने की कोशिश कर रहे हैं.

इस मामले पर कोर्ट का कहना था कि अदालत को सभी धर्मों का सम्मान करते हुए धार्मिक मामलों में कम से कम दखल देना चाहिए, लेकिन धार्मिक मान्यताएं अगर सीधे मानवाधिकारों को प्रभावित कर रही हैं तो फिर कोर्ट को दखल देना होगा.

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तलाक-ए-हसन और तलाक-ए-अहसन क्या है?

2017 में सुप्रीम कोर्ट ने तलाक-ए-बिद्दत यानी तीन तलाक पर रोक लगा दी थी. इसके बाद 2019 में केंद्र सरकार इस पर रोक लगाने के लिए कानून लेकर आई थी. अब तीन तलाक देने पर 3 साल तक की जेल हो सकती है. 

लेकिन अब भी मुस्लिमों में तलाक की कई प्रथाएं चल रही हैं. इनमें सबसे अहम तलाक-ए-हसन और तलाक-ए-अहसन है. 

तलाक-ए-हसन में शौहर को तीन महीने में तीन बार तलाक देना होता है. इस प्रथा में तलाक बोलकर या लिखकर दिया जाता है. इसके तहत, पति को लगातार तीन महीने तक हर महीने एक बार तलाक देना होता है. तीन महीने की इस अवधि को ‘इद्दत’ कहा जाता है. इस दौरान अगर पति चाहे तो तलाक वापस ले सकता है.

वहीं, तलाक-ए-अहसन में पति को एक ही बात में तलाक देना होता है. इसमें भी तीन महीने की अवधि होती है. तीन महीने के भीतर अगर तलाक वापस नहीं लिया जाता है तो पति-पत्नी में तलाक मंजूर हो जाता है.

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क्या महिलाएं नहीं दे सकतीं तलाक?

इस्लाम में महिलाएं भी पति से तलाक ले सकती हैं. महिलाएं ‘खुला’ के जरिए तलाक ले सकती है. इसके लिए आपसी सहमति जरूरी है. अगर पति सहमत नहीं है तो अदालत के जरिए भी ऐसा किया जा सकता है. इसमें महिला को निकाह के वक्त जो ‘मेहर’ की रकम मिलती है, उसे लौटाना होता है. 

इसके अलावा, इस्लाम में ‘मुबारत’ की भी इजाजत है. यह तलाक का ऐसा तरीका है जिसमें पति-पत्नी दोनों आपसी सहमति और अपनी मर्जी से शादी खत्म करने के लिए राजी होते हैं.

तलाक की प्रथाओं पर क्या कह चुकी हैं अदालतें?

तीन तलाक के मामले में जब 2017 में सुप्रीम कोर्ट ने फैसला दिया था तो अदालत ने बाकी प्रथाओं पर न तो कोई टिप्पणी की थी और न ही दखल दिया था.

अगस्त 2022 में सुप्रीम कोर्ट ने तलाक-ए-हसन पर कहा था कि यह प्रथा गलत नहीं है, क्योंकि इसमें सुलह-समझौते का समय मिल जाता है. तब सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि महिलाओं के पास भी ‘खुला’ का विकल्प है.

इन प्रथाओं पर हाई कोर्ट्स का रुख भी साफ रहा है. हिमाचल प्रदेश और केरल हाई कोर्ट ने तलाक-ए-हसन में दखल देने से इनकार कर दिया था.

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