

हिंदू धर्म में नवरात्रि का विशेष महत्व माना जाता है, लेकिन आषाढ़ और माघ महीने में आने वाली गुप्त नवरात्रि सामान्य नवरात्रि से अलग मानी जाती है. यह पर्व मुख्य रूप से साधना, तंत्र-मंत्र और देवी की उपासना के लिए जाना जाता है. इसके अलावा गुप्त नवरात्रि के शनिवार को पीपल के पेड़ के उपाय ग्रहों विशेषकर शनि और राहु-केतु की शांति के लिए बेहद अचूक माने जाते हैं. ज्योतिषाचार्य पंडित कौशल पांडेय के अनुसार, गुप्त नवरात्रि के शनिवार को पीपल के पेड़ की पूजा करने से शनि, राहु और केतु जैसे ग्रहों के दोष शांत होते हैं, इसके लिए सूर्यास्त के समय पीपल की जड़ में जल चढ़ाएं और सरसों के तेल का दीपक जलाकर ‘ॐ शं शनैश्चराय नम:’ का 108 बार जाप करें.
शनि दोष और साढ़ेसाती के लिए- शनिवार की शाम पीपल के पेड़ की जड़ में सरसों के तेल का दीपक जलाएं और 7 परिक्रमा करें. पीपल के पेड़ में काले तिल अर्पित करना भी शुभ होता है.
राहु दोष- राहु की शांति के लिए पीपल के वृक्ष पर शहद अर्पित करें या इसके नीचे किसी जरूरतमंद को मीठा भोजन दान करें.
केतु दोष- केतु के अशुभ प्रभावों को दूर करने के लिए पीपल के पेड़ पर सरसों का तेल और मोतीचूर का लड्डू या इमरती चढ़ाएं.
समस्त नवग्रह शांति- अगर, पीपल के पेड़ में त्रिदेवों (ब्रह्मा, विष्णु, महेश) और पितरों का वास माना जाता है, इसलिए दोनों हाथों से पीपल के तने को स्पर्श करते हुए 108 बार ‘ॐ नमः शिवाय’ का जाप करने से सभी ग्रहों की पीड़ा शांत होती है.
गुप्त नवरात्रि का महत्व
गुप्त नवरात्रि का उद्देश्य और महत्व मुख्य रूप से आंतरिक शुद्धि, गूढ़ साधना (तंत्र-मंत्र) और दस महाविद्याओं की उपासना पर केंद्रित है. सामान्य नवरात्रि के विपरीत, इसमें पूजा, मंत्र जाप और मनोकामनाओं को पूरी तरह गुप्त रखा जाता है. यह काल आत्मबल और असीम आध्यात्मिक ऊर्जा प्राप्त करने के लिए अत्यंत प्रभावशाली माना जाता है. हिंदू धर्म में इस नवरात्रि को साधना, भक्ति और मां आदिशक्ति की विशेष आराधना का समय माना जाता है. पंचांग के अनुसार, साल में कुल चार नवरात्रि आती हैं. इनमें चैत्र और शारदीय नवरात्रि सबसे अधिक प्रसिद्ध हैं, जबकि आषाढ़ और माघ की नवरात्रि को गुप्त नवरात्रि कहा जाता है.
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