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औरत की नजर से मर्द की खूबसूरती का बखान करता 32 साल पुराना सुपरहिट गाना, 4500 साल पुरानी भाषा से कनेक्शन, 100 साल पुराने पाकिस्तानी लोकगीत से प्रेरित | this 32 year old song has connection with 4500 year old saraiki language suniel shetty poonam jhawer song inspired by pakistani folk music



सोशल मीडिया पर इन दिनों ‘छलरे-छलरे’ गाने की खूब चर्चा हो रही है. इस गाने में प्रेमिका अपने प्रेमी की खूबसूरती का बखान ऐसे अंदाज में करती है कि सुनने वाले भी इसके बोलों से जुड़ाव महसूस करने लगते हैं. दिलचस्प बात यह है कि खूबसूरती की तारीफ करने का यह अंदाज बॉलीवुड के 90 के दशक के मशहूर गाने ‘ना कजरे की धार’ की याद दिलाता है. फिल्म ‘मोहरा’ के इस रोमांटिक गाने में भी प्रेमिका की सुंदरता और प्रेम की भावनाओं को बेहद खूबसूरती से पेश किया गया था. ‘छलरे-छलरे’ की खासियत यह है कि इसकी जड़ें सराइकी लोकसंगीत से जुड़ी हैं, जिसे कई लोग पंजाबी गाना समझ लेते हैं.

‘ना कजरे की धार’ और ‘छलरे-छलरे’ में क्या है समानता?

साल 1994 में रिलीज हुई फिल्म ‘मोहरा’ का गाना ‘ना कजरे की धार’ आज भी हिंदी सिनेमा के लोकप्रिय रोमांटिक गीतों में गिना जाता है. पंकज उधास और साधना सरगम की आवाज में सजे इस गाने में प्रेम और खूबसूरती की तारीफ को सादगी के साथ पेश किया गया है. वहीं, ‘छलरे-छलरे’ में भी प्रेमिका अपने प्रेमी के रूप की तारीफ करती नजर आती है. दोनों गानों का सांस्कृतिक परिवेश अलग है, लेकिन अपने प्रिय की सुंदरता को गीतों के जरिए बयां करने का भाव इन्हें एक दिलचस्प समानता देता है.

पंजाबी नहीं, सराइकी लोकगीत है ‘छलरे-छलरे’

सराइकी पाकिस्तान के पंजाब प्रांत के दक्षिणी हिस्सों में बोली जाने वाली प्रमुख भाषाओं में से एक है. मुल्तान, डेरा गाजी खान और बहावलपुर जैसे इलाकों में इसके बोलने वाले बड़ी संख्या में मौजूद हैं. इसकी शब्दावली और उच्चारण पंजाबी से मिलते-जुलते हैं, इसलिए कई लोग इसे पंजाबी भाषा का गीत समझ लेते हैं. हालांकि, सराइकी की अपनी अलग साहित्यिक और सांस्कृतिक पहचान है. इसके लोकगीतों में प्रेम, विरह और खूबसूरती जैसे विषयों को खास जगह मिलती है.

सूफियाना रंग है सराइकी संगीत की पहचान

सराइकी साहित्य और संगीत को समृद्ध बनाने में सूफी कवियों की अहम भूमिका रही है. ख्वाजा गुलाम फरीद जैसे प्रसिद्ध कवियों की रचनाओं में प्रेम, आध्यात्मिकता और मानवीय भावनाओं की गहरी झलक मिलती है.

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यही भावपूर्ण अंदाज सराइकी लोकसंगीत को खास बनाता है. ‘छलरे-छलरे’ जैसे गाने लोगों को एक अलग भाषाई और सांस्कृतिक दुनिया से परिचित कराते हैं. ‘ना कजरे की धार’ की तरह यहां भी प्रेम की अभिव्यक्ति गीत का केंद्र है, लेकिन इसकी भाषा, संगीत परंपरा और सांस्कृतिक जड़ें इसे अपनी अलग पहचान देती हैं.




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