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असम में नहीं थम रहा मानव-हाथी संघर्ष: 10 साल में 1147 लोगों और 246 हाथियों की मौत, विधानसभा में खुलासा | Assam Elephant Deaths Human Elephant Conflict Attack 1147 Human Death 246 Elephant Death in a Decade Forest Encroachment vidhan Sabha Data


Assam Human-Elephant Conflict: असम में इंसान और हाथियों के बीच बढ़ता संघर्ष लगातार गंभीर होता जा रहा है. राज्य विधानसभा में सरकार द्वारा पेश आंकड़ों ने इस समस्या की भयावह तस्वीर सामने रखी है. पिछले दस वर्षों में मानव-हाथी संघर्ष में 1,147 लोगों की जान गई, जबकि 246 हाथियों की भी मौत हुई. बिजली के करंट, ट्रेन दुर्घटनाएं और मानव गतिविधियां हाथियों की मौत के प्रमुख कारण बने हुए हैं. वहीं हाथियों के हमलों में हर साल बड़ी संख्या में लोगों की जान जा रही है. सरकार के प्रयासों के बावजूद यह समस्या कम होने के बजाय लगातार बढ़ती दिखाई दे रही है. वन क्षेत्रों में अतिक्रमण, जंगलों का सिकुड़ना और हाथियों के पारंपरिक मार्गों में बाधाएं इस संघर्ष को और गंभीर बना रही हैं.

विधानसभा में सामने आई चिंताजनक तस्वीर

असम विधानसभा के बजट सत्र में पर्यावरण एवं वन मंत्री जयंत मल्लबरुआ ने मानव-हाथी संघर्ष से जुड़े आंकड़े प्रस्तुत किए. उन्होंने बताया कि पिछले एक दशक में राज्य में हाथियों के हमलों और संबंधित घटनाओं में 1,147 लोगों की मौत हुई है. वहीं इसी अवधि में 246 हाथियों ने भी जान गंवाई है. सरकार के अनुसार यह समस्या राज्य के लिए सबसे बड़ी वन्यजीव चुनौतियों में शामिल है.

Assam Human Elephant Conflict: असम में हाथियों पर संकट

Assam Human Elephant Conflict: असम में हाथियों पर संकट

2025 में सबसे ज्यादा मानव मौतें

वन मंत्री के अनुसार वर्ष 2025 मानव-हाथी संघर्ष के लिहाज से सबसे घातक वर्ष रहा. सिर्फ 2025 में 138 लोगों की मौत हाथियों से जुड़े घटनाओं में दर्ज की गई. जबकि वर्ष 2026 में अब तक 53 लोगों की जान जा चुकी है.
पिछले वर्षों के आंकड़े भी चिंताजनक हैं:

  • 2024 : 110 मौतें
  • 2023 : 116 मौतें
  • 2022 : 112 मौतें
  • 2021 : 108 मौतें
  • 2020 : 89 मौतें
  • 2019 : 109 मौतें
  • 2018 : 115 मौतें
  • 2017 : 99 मौतें
  • 2016 : 98 मौतें

इन इलाकों में सबसे ज्यादा संघर्ष

पिछले दस वर्षों में कुछ वन प्रभाग सबसे अधिक प्रभावित रहे हैं. इनमें प्रमुख रूप से बक्सा, धनसिरी, नागांव (टी), सोनितपुर वेस्ट, गोलपाड़ा, गोलाघाट, कामरूप ईस्ट, कामरूप वेस्ट और कार्बी आंगलोंग ईस्ट शामिल हैं. सबसे ज्यादा 195 मानव मौतें गोलपाड़ा जिले में दर्ज की गईं, जबकि धनसिरी वन प्रभाग में 143 लोगों की जान गई.

246 हाथियों की भी हुई मौत

संघर्ष का असर केवल इंसानों पर ही नहीं बल्कि हाथियों पर भी पड़ा है. वन मंत्री ने बताया कि पिछले दस वर्षों में 246 हाथियों की मौत हुई. इनमें बिजली का करंट लगना, ट्रेन दुर्घटनाएं और जहर देना प्रमुख कारण रहे. सबसे अधिक हाथियों की मौतों का आंकड़ा कुछ ऐसा है.

  • 2017 में : 42
  • 2025 में : 36
  • 2024 में : 27

वर्ष 2026 में अब तक पांच हाथियों की मौत हो चुकी है, जिनमें चार बिजली करंट और एक शिकार की घटना से जुड़ी बताई गई है.

अतिक्रमण भी बना बड़ी समस्या

सरकार ने विधानसभा में बताया कि असम में आरक्षित और संरक्षित वन क्षेत्रों का कुल क्षेत्रफल लगभग 18.33 लाख हेक्टेयर है. लेकिन इनमें से करीब 3.15 लाख हेक्टेयर क्षेत्र पर अतिक्रमण हो चुका है. हालांकि 2015-16 से 2025-26 के बीच चलाए गए अतिक्रमण हटाओ अभियानों में 25,588 हेक्टेयर से अधिक भूमि को खाली कराया गया है.  विशेषज्ञों का मानना है कि जंगलों में बढ़ते अतिक्रमण के कारण हाथियों के प्राकृतिक आवास और आवाजाही मार्ग प्रभावित हो रहे हैं, जिससे संघर्ष बढ़ रहा है.

हाथी कॉरिडोर और सोलर फेंसिंग भी पर्याप्त नहीं

सरकार ने मानव-हाथी संघर्ष कम करने के लिए कई कदम उठाए हैं. इनमें वन कर्मियों की तैनाती, सोलर फेंसिंग, और रेलवे लाइन के आसपास 33 हाथी कॉरिडोर की पहचान जैसी पहल शामिल हैं. इसके बावजूद मौतों का सिलसिला पूरी तरह नहीं रुक पाया है.

वन क्षेत्र में मामूली बढ़ोतरी

इंडिया स्टेट ऑफ फॉरेस्ट रिपोर्ट (ISFR) के मुताबिक असम का वन क्षेत्र 2023 में बढ़कर 28,313.55 वर्ग किलोमीटर हो गया. यह राज्य के कुल भौगोलिक क्षेत्रफल का 36.1 प्रतिशत है. वर्ष 2017 में यह आंकड़ा 28,105 वर्ग किलोमीटर यानी 35.83 प्रतिशत था. हालांकि विशेषज्ञों का कहना है कि वन क्षेत्र में मामूली वृद्धि के बावजूद प्राकृतिक हाथी गलियारों पर दबाव बना हुआ है.

समाधान की राह अभी लंबी

वन विभाग से जुड़े एक्सपर्ट्स का मानना है कि केवल सोलर फेंसिंग और निगरानी पर्याप्त नहीं होगी. हाथियों के पारंपरिक मार्गों की सुरक्षा, जंगलों में अतिक्रमण रोकना, सुरक्षित रेलवे कॉरिडोर बनाना और स्थानीय समुदाय की भागीदारी बढ़ाना जरूरी होगा. जब तक हाथियों और इंसानों के साझा क्षेत्रों के लिए दीर्घकालिक नीति नहीं बनती, तब तक असम में यह संघर्ष जारी रहने की आशंका बनी रहेगी.

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