

सावन में भगवान शिव के मंदिरों में सबसे पहले भक्तों की नजर शिवलिंग के सामने बैठे नंदी महाराज पर पड़ती है. पूजा के बाद लोग नंदी के कान में अपनी मनोकामना भी कहते हैं. लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि नंदी का जन्म कैसे हुआ और हर शिव मंदिर में उनकी प्रतिमा क्यों स्थापित की जाती है. ज्योतिषाचार्य पंडित कौशल पांडेय के अनुसार, इसका जवाब शिव पुराण में वर्णित एक रोचक कथा में मिलता है.
ऋषि शिलाद की तपस्या से जुड़ी है नंदी की कथा
पौराणिक मान्यता के अनुसार, ब्रह्मचारी ऋषि शिलाद संतान चाहते थे. उन्होंने भगवान शिव की कठोर तपस्या की. शिवजी ने उन्हें पुत्र प्राप्ति का वरदान दिया. कुछ समय बाद खेत जोतते समय ऋषि शिलाद को एक दिव्य बालक मिला, जिसे उन्होंने अपना पुत्र मानकर नंदी नाम दिया.
अल्पायु का पता चलते ही की शिव भक्ति
कथा में संतों ने बताया कि नंदी अल्पायु हैं. यह सुनकर नंदी ने मृत्यु के भय से घबराने के बजाय भगवान शिव की कठिन तपस्या शुरू कर दी. उनकी अटूट भक्ति से प्रसन्न होकर शिवजी प्रकट हुए और कहा कि नंदी उनके ही अंश हैं, इसलिए उन्हें मृत्यु का भय नहीं रहेगा.
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कैसे बने भगवान शिव के वाहन?
ज्योतिषाचार्य पंडित कौशल पांडेय बताते हैं कि जब शिवजी ने नंदी से वरदान मांगने को कहा तो उन्होंने केवल एक ही इच्छा जताई- जीवनभर भगवान शिव की सेवा करने की. उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर शिवजी ने उन्हें अपना वाहन और प्रमुख गण बना लिया. तभी से हर शिव मंदिर में शिवलिंग के सामने नंदी की प्रतिमा स्थापित की जाती है.
नंदी के कान में मनोकामना क्यों कहते हैं
उन्होंने बताया कि ऐसी धार्मिक मान्यता है कि भगवान शिव अक्सर गहन ध्यान में रहते हैं. ऐसे में भक्त अपनी मनोकामना नंदी के कान में कहते हैं. मान्यता है कि नंदी उचित समय पर भक्तों की प्रार्थना भगवान शिव तक पहुंचाते हैं. इसलिए सावन में यह परंपरा विशेष रूप से शुभ और फलदायी मानी जाती है.
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