धर्म

2 अक्टूबर नहीं, ये थी बापू की असली जन्मतिथि, आत्मकथा का वो पन्ना जो 99% लोग नहीं जानते


हर साल 2 अक्टूबर आते ही पूरा देश राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के सम्मान में नतमस्तक हो जाता है. सरकारी दफ्तरों में अवकाश रहता है, राजघाट पर प्रार्थनाएं होती हैं और जगह-जगह भाषण दिए जाते हैं.

यह तारीख हर भारतीय की जुबान पर इस कदर रटी हुई है कि किसी के मन में कोई दूसरा सवाल पैदा ही नहीं होता. लेकिन इतिहास के पन्नों को निष्पक्ष होकर पलटें, तो एक हैरान करने वाली सच्चाई सामने आती है.

जिस दिन को पूरा देश बापू की जयंती समझकर मनाता आ रहा है, खुद गांधी जी अपने जीवनकाल में उसे अपना असली जन्मदिन मानने से परहेज करते थे.

बात साल 1931 की है, जब गांधी जी ऐतिहासिक गोलमेज सम्मेलन में भाग लेने के लिए लंदन में मौजूद थे. 2 अक्टूबर के दिन जब अंग्रेज अधिकारियों, विदेशी पत्रकारों और शुभचिंतकों ने उन्हें जन्मदिन की बधाइयां दीं, तो बापू मंद-मंद मुस्कुराए. उन्होंने इस औपचारिक बधाई को स्वीकार करने के बजाय बेहद सहजता से कहा कि भारतीय काल-गणना के अनुसार उनका जन्मदिन तो काफी पहले ही बीत चुका है.

जब भी कोई उन्हें 2 अक्टूबर को बधाई के तार भेजता था, वे अक्सर संकोच में पड़ जाते थे क्योंकि उनका मानना था कि अंग्रेजी तारीखों का भारतीय जनजीवन और उनकी निजी परंपरा से कोई सीधा नाता नहीं है.

आत्मकथा का वो पन्ना जिस पर नजर नहीं गई

यह बात किसी सुनी-सुनाई कहानी या हवा-हवाई दावे पर आधारित नहीं है, बल्कि इसका सबसे बड़ा प्रमाण खुद बापू की कालजयी पुस्तक ‘सत्य के प्रयोग’ में मिलता है. गांधी जी ने अपनी आत्मकथा के पहले भाग के दूसरे अध्याय में अपने जन्म का विवरण दर्ज करते हुए लिखा है कि उनका जन्म संवत 1926 के भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की द्वादशी के दिन पोरबंदर में हुआ था.

वैदिक पंचांग की गणना के अनुसार विक्रम संवत 1926 में भाद्रपद यानी भादों के महीने में कृष्ण पक्ष की बारहवीं तिथि को मोहनदास करमचंद गांधी का जन्म हुआ था. गुजराती कैलेंडर के अनुसार इसे भाद्रपद वद बारस कहा जाता है. बापू ने अपनी आत्मकथा में अपनी पहचान इसी तिथि से जोड़ी थी, न कि किसी विदेशी ग्रेगोरियन कैलेंडर की तारीख से.

साबरमती में क्यों पूजी जाती थी ‘रेहट बारस’

गांधी जी के जीवनकाल में साबरमती और सेवाग्राम आश्रम में उत्सव का पैमाना कभी 2 अक्टूबर नहीं रहा. आश्रमवासी हर साल पंचांग के हिसाब से भाद्रपद कृष्ण द्वादशी को ही उत्सव का दिन चुनते थे, जिसे गुजरात में ऐतिहासिक रूप से रेहट बारस कहा जाता है. गुजराती में रेहट का अर्थ चरखा होता है और बारस का अर्थ बारहवीं तिथि यानी द्वादशी होता है.

बापू व्यक्ति-पूजा और तड़क-भड़क के हमेशा सख्त खिलाफ रहते थे. यही वजह थी कि आश्रम में उनके जन्मदिन पर किसी तरह का जश्न मनाने या दावत देने के बजाय सुबह से शाम तक मौन रहकर सूत काता जाता था. इसे सूत का अखंड यज्ञ कहा जाता था, जिसमें हर आश्रमवासी अपनी सामान्य क्षमता से अधिक कताई करता था. बापू के लिए यही श्रमदान ही उनका सबसे बड़ा जन्मोत्सव और सच्ची निष्ठा थी.

कैसे सिमट गई बापू की विरासत

अंग्रेजी हुकूमत के दौर में आधिकारिक कामकाज सौर वर्ष यानी ग्रेगोरियन कैलेंडर के हिसाब से तय होते थे. साल 1869 में भाद्रपद की वह द्वादशी अंग्रेजी तारीख के हिसाब से 2 अक्टूबर को पड़ी थी. आजादी के बाद जब देश में नई प्रशासनिक व्यवस्थाएं बनीं, तो पूरे देश में एकरूपता और सुविधा के लिए 2 अक्टूबर की तारीख को ही आधिकारिक गांधी जयंती घोषित कर दिया गया.

हिंदू पंचांग चंद्रमा की कलाओं पर आधारित होता है, जिसके कारण हर साल द्वादशी की तारीख अंग्रेजी कैलेंडर में बदलती रहती है. सिस्टम ने अपनी प्रशासनिक सहूलियत के लिए एक तारीख तो तय कर दी, लेकिन इस औपचारिकता ने बापू के उस सांस्कृतिक और पारंपरिक पक्ष को पीछे धकेल दिया जिसे वे खुद जीवनभर जीते रहे.

2 अक्टूबर को अहिंसा दिवस मनाना गौरव की बात है, लेकिन इतिहास और अपनी जड़ों को टटोलने वाले हर सजग नागरिक के लिए यह जानना जरूरी है कि बापू का असल जन्मदिवस पंचांग की यही पावन रेहट बारस है.

Disclaimer: यहां मुहैया सूचना सिर्फ मान्यताओं और जानकारियों पर आधारित है. यहां यह बताना जरूरी है कि ABPLive.com किसी भी तरह की मान्यता, जानकारी की पुष्टि नहीं करता है. किसी भी जानकारी या मान्यता को अमल में लाने से पहले संबंधित विशेषज्ञ से सलाह लें.



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