धर्म

Rama Ekadashi 2026: कल सुबह 10:35 बजे खत्म होगी एकादशी, तो क्या इसके बाद व्रत खोल सकते हैं?


Rama Ekadashi 2026: दिवाली से ठीक पहले आने वाली रमा एकादशी (5 नवंबर 2026) पर अगर आप सोच रहे हैं कि सुबह 10:35 बजे तिथि खत्म होते ही भोजन कर सकते हैं, तो इसका सीधा जवाब है बिल्कुल नहीं.

वैदिक पंचांग और धर्मशास्त्रों के अनुसार, एकादशी का पारण कभी भी उसी दिन नहीं होता, बल्कि अगले दिन 6 नवंबर को द्वादशी के सूर्योदय के बाद ही मान्य है. नियम यह है कि तिथि समाप्त होने के बाद भी उसी दिन अन्न ग्रहण करने से ‘हरि वासर’ का दोष लगता है और पूरा व्रत खंडित मान लिया जाता है.

धर्मशास्त्रों और पंचांग नियमों के अनुसार, उसी दिन भोजन करना क्यों पूरी तरह वर्जित है, 6 नवंबर को पारण का सही शुभ मुहूर्त क्या है और इससे जुड़ी पूरी पौराणिक कथा क्या है.

क्या एकादशी तिथि समाप्त होते ही व्रत खोल सकते हैं?

हिंदू धर्मग्रंथों के अनुसार एकादशी व्रत का संकल्प पूरे एक अहोरात्र (24 घंटे) का होता है. भले ही 5 नवंबर 2026 को एकादशी तिथि सुबह 10:35 बजे ही समाप्त हो रही हो, फिर भी व्रत उस समय नहीं तोड़ा जाता.

शास्त्रों का साफ नियम है:

द्वादशी में ही पारण: एकादशी व्रत का पारण (व्रत खोलना) हमेशा अगले दिन यानी द्वादशी तिथि के सूर्योदय के बाद ही किया जाता है.

उसी दिन अन्न ग्रहण निषेध: जिस दिन एकादशी का व्रत रखा जाता है, उस दिन सूर्यास्त या तिथि समाप्ति के बाद भी अन्न ग्रहण करना वर्जित माना गया है.

रमा एकादशी 2026: महत्वपूर्ण तिथियां और शुभ पारण मुहूर्त

रमा एकादशी व्रत- 5 नवंबर 2026, गुरुवार
एकादशी तिथि समाप्ति- 5 नवंबर 2026, सुबह 10:35 बजे
व्रत पारण की तिथि- 6 नवंबर 2026, शुक्रवार (द्वादशी)
पारण का शुभ मुहूर्त- सुबह 06:37 बजे से सुबह 08:48 बजे तक

पारण करते समय इन नियमों का रखें खास ध्यान:

हरि वासर का त्याग: द्वादशी तिथि की पहली एक-चौथाई अवधि को ‘हरि वासर‘ कहा जाता है. शास्त्रों में हरि वासर के दौरान अन्न-जल ग्रहण करना पूरी तरह वर्जित बताया गया है. इसलिए सुबह सूर्योदय के बाद तय मुहूर्त में ही व्रत खोलें.

भगवान विष्णु और महालक्ष्मी की पूजा: पारण करने से पहले स्नान कर भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की विधिवत पूजा करें और तुलसी दल अर्पित करें.

दान और ब्राह्मण भोज: स्वयं अन्न ग्रहण करने से पूर्व किसी ब्राह्मण या जरूरतमंद व्यक्ति को भोजन कराएं और सामर्थ्य अनुसार दान-दक्षिणा दें.

सात्विक भोजन से पारण: व्रत खोलते समय हल्का और सात्विक भोजन ही ग्रहण करें. तामसिक भोजन, प्याज-लहसुन से पूरी तरह परहेज रखें.

इस एकादशी का नाम ‘रमा’ क्यों पड़ा?

‘रमा‘ माता लक्ष्मी का ही एक पावन नाम है. यह व्रत दीपावली से 4-5 दिन पहले आता है, इसलिए इस दिन भगवान विष्णु (श्री कृष्ण) के साथ माता लक्ष्मी की संयुक्त आराधना की जाती है. जो साधक रमा एकादशी का व्रत नियमपूर्वक रखते हैं, उनके जीवन से दरिद्रता दूर होती है और घर में सुख, शांति तथा स्थायी समृद्धि का वास होता है.

रमा एकादशी की पावन पौराणिक कथा:

पद्म पुराण में वर्णित कथा के अनुसार, प्राचीन काल में राजा मुचुकुंद नाम के एक परम विष्णु भक्त राजा राज्य करते थे, जिनके राज्य में एकादशी के दिन सभी के लिए निर्जला व्रत रखना अनिवार्य था. राजा की पुत्री चंद्रभागा का विवाह शोभन नाम के एक राजकुमार से हुआ, जो स्वभाव से तो धार्मिक था परंतु शारीरिक रूप से बहुत दुर्बल था और भूख-प्यास सहने में असमर्थ था. 

एक बार जब शोभन अपनी ससुराल आया, तो उसी समय रमा एकादशी का व्रत पड़ा. राज्य के कड़े नियमों के कारण उसे भी विवश होकर यह कठोर व्रत रखना पड़ा. भूख और प्यास की असहनीय पीड़ा से रातभर तड़पने के बाद, सुबह सूर्योदय से ठीक पहले शोभन ने दम तोड़ दिया. उसके निधन से राज्य में शोक छा गया और चंद्रभागा ने मायके में ही रहकर प्रभु भक्ति में अपना जीवन समर्पित कर दिया.

भले ही शोभन ने यह व्रत विवशता में रखा था, फिर भी रमा एकादशी के अलौकिक प्रभाव से उसे अगले जन्म में मंदराचल पर्वत पर एक बहुत दिव्य और भव्य ‘देवपुर‘ साम्राज्य प्राप्त हुआ; लेकिन श्रद्धा की कमी के कारण उसका यह राज्य अस्थिर था, जो कभी भी खत्म हो सकता था. 

कालांतर में जब मुचुकुंद के राज्य के एक ब्राह्मण ने तीर्थयात्रा के दौरान शोभन को देखा और यह समाचार चंद्रभागा को दिया, तो वह तत्काल मंदराचल पर्वत पहुंची. वहां चंद्रभागा ने बचपन से संचित किए गए अपने सभी एकादशी व्रतों का संचित पुण्य अपने पति को दान कर दिया. इस महापुण्य के प्रभाव से शोभन का वह साम्राज्य सदा के लिए स्थिर और अमर हो गया, और दोनों अंत में श्रीहरि के परम धाम को प्राप्त हुए.

Disclaimer: यहां मुहैया सूचना सिर्फ मान्यताओं और जानकारियों पर आधारित है. यहां यह बताना जरूरी है कि ABPLive.com किसी भी तरह की मान्यता, जानकारी की पुष्टि नहीं करता है. किसी भी जानकारी या मान्यता को अमल में लाने से पहले संबंधित विशेषज्ञ से सलाह लें.



Source link

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button