
Panchanguli Devi: सनातन धर्म में कई ऐसी देवी-देवताओं और दिव्य शक्तियों का जिक्र मिलता है, जिनकी पूजा से खास फलदायी और लाभकारी माना जाता है. इन्हीं में से एक हैं मां पंचांगुली देवी, उनके बारे में पुरानी ग्रंथों, हस्तरेखा शास्त्र और सामुद्रिक शास्त्र में जिक्र मिलता है.
मां पंचांगुली देवी की कृपा से इंसान की समझ, एकाग्रता और भविष्य से जुड़े संकेतों को पहचानने की ताकत बढ़ सकती है. हस्तरेखा और भविष्य ज्ञान में रुचि रखने वाले लोग उनकी साधना और उपासना करते हैं.
माना जाता है कि मां पंचांगुली देवी हाथ की पांचों अंगुलियों से जुड़ी दिव्य शक्तियों की अधिष्ठात्री हैं. जानते हैं कि मां पंचांगुली देवी कौन हैं, उनकी साधना का क्या महत्व है और शास्त्रों में उनकी पूजा व साधना की क्या विधि बताई गई है.
हस्तरेखा ज्ञान से जुड़ी मां पंचांगुली देवी कौन हैं?
सामुद्रिक शास्त्र के अनुसार इंसान का हाथ केवल काम करने का साधन नहीं, बल्कि भाग्य और भविष्य को जानने का जरिया भी माना गया है. हाथ की पांचों अंगुलियों में अलग-अलग दिव्य शक्तियों का निवास माना गया है. इन्हीं पांच दिव्य शक्तियों की अधिष्ठात्री देवी को पंचांगुली महादेवी कहा गया है.
ग्रंथों में वर्णित है कि संसार के बहुत सारे काम हम लोग हाथों से ही करते है. पूजा, यज्ञ, दान, भोजन, अध्ययन, विवाह, लेखन और जीवन की लगभग हर जरूरी काम हाथों से ही किया जाता है. इसलिए हाथों की शक्ति को देवी स्वरूप मानकर पंचांगुली महादेवी की आराधना का विधान बताया गया है.
मां पंचांगुली देवी के महत्व को बताता यह श्लोक:
हस्तेन पाणिग्रहणं पूजाभोजनजन्मनः।
साध्या विविधविद्यांश्च सुखदाः सकलाः क्रियाः॥
शास्त्रों के अनुसार हाथों के जरिये ही पूजा, दान, भोजन, अध्ययन और जीवन के बहुत सारे महत्वपूर्ण काम पूरे होते हैं. विभिन्न विद्याओं की प्राप्ति और अनेक शुभ काम का आधार भी हाथ ही हैं. यही कारण है कि हाथों की शक्ति को दिव्य मानते हुए पंचांगुली देवी की उपासना का महत्व बताया गया है.
क्या पंचांगुली यंत्र से जुड़ा है साधना की सफलता का रहस्य?
पंचांगुली देवी की साधना में पंचांगुली यंत्र का खास महत्व बताया गया है. यह यंत्र मां पंचांगुली की दिव्य शक्ति और कृपा का प्रतीक माना जाता है. साधना शुरू करने से पहले इस यंत्र की स्थापना कर विधि-विधान से पूजा की जाती है.
यंत्र साधक के मन को एकाग्र करने और देवी के प्रति उसकी श्रद्धा को मजबूत बनाने में मदद करता है. कई साधक इसे साधना का महत्वपूर्ण आधार मानते हैं, क्योंकि इसके सामने बैठकर मंत्र जाप और ध्यान करने से मन भटकता नहीं है. शास्त्रों में वर्णित है कि यंत्र, मंत्र और साधना का सही मेल साधक को आत्मज्ञान बढ़ाता है.
किसी भी यंत्र की शक्ति उसकी पूजा-पद्धति, श्रद्धा और साधक के अनुशासन पर निर्भर मानी जाती है. इसलिए पंचांगुली यंत्र की स्थापना हमेशा शुद्धता, नियमों और उचित विधि के साथ करने की सलाह दी जाती है.
आखिर पंचांगुली साधना के लिए कौन-सा समय सबसे शुभ माना जाता है?
किसी भी साधना की सफलता में सही समय और शुभ मुहूर्त का विशेष महत्व माना जाता है. पंचांगुली देवी की साधना के लिए भी शास्त्रों में कुछ विशेष महीने, तिथियां, वार, नक्षत्र और लग्न बताए गए हैं. इन शुभ तिथियों में साधना शुरू करने से साधक को बेहतर परिणाम प्राप्त हो सकते हैं.
- शुभ मास: वैशाख, कार्तिक, आश्विन और माघ
- शुभ तिथियां: शुक्ल पक्ष की द्वितीया, पंचमी, सप्तमी, अष्टमी, दशमी और पूर्णिमा
- शुभ वार: रविवार, बुधवार, गुरुवार और शुक्रवार
- शुभ नक्षत्र: कृत्तिका, रोहिणी, पुनर्वसु, हस्त, उत्तरा फाल्गुनी, उत्तराषाढ़ा, उत्तराभाद्रपद, अनुराधा और श्रवण
- शुभ लग्न: वृषभ, सिंह, वृश्चिक और कुंभ
मां पंचांगुली का ध्यान क्यों है जरूरी?
पंचांगुली साधना शुरू करने से पहले मां पंचांगुली देवी का ध्यान करने का विधान बताया गया है. इसके लिए साधक को ध्यान मंत्र का जप करते हुए देवी को याद करना चाहिए:
ॐ पंचाङ्गुली महादेवी श्री सीमंधर शासने।
अधिष्ठात्री करस्यासौ शक्तिः श्री त्रिदशेश्वरि॥
इस मंत्र के जप से साधक का मन शांत होता है और वह पूरी श्रद्धा के साथ साधना के लिए तैयार हो पाता है.
कैसे की जाती है पंचांगुली देवी की साधना?
1. स्नान और शुद्धि: साधना शुरू करने से पहले सुबह नहाकर कर साफ और पवित्र वस्त्र धारण करें.
2. यंत्र स्थापना: शुभ मुहूर्त में पंचांगुली यंत्र स्थापित कर पूजा स्थल को तैयार करें.
3. देवी पूजन: धूप, दीप, पुष्प और नैवेद्य(भोग) अर्पित कर मां पंचांगुली देवी की पूजा करें.
4. ध्यान मंत्र जाप: पूजा के बाद ध्यान मंत्र का जप करते हुए देवी का स्मरण करें.
5. मूल मंत्र जप: रुद्राक्ष की माला से पंचांगुली देवी के मूल मंत्र का 108 बार जाप करें.
6. हवन करें: मंत्र जाप पूरा होने के बाद हवन सामग्री और पंचमेवा से 10 आहुतियां दें.
7. नियमित साधना: इस पूरी प्रक्रिया को रोजाना सुबह के समय एक महीने तक करें.
8. नियमों का पालन: साधना काल में सात्विक भोजन करें और मन, वचन व कर्म की पवित्रता बनाए रखें.
9. नित्य स्मरण: साधना पूर्ण होने के बाद भी रोजाना मां पंचांगुली का स्मरण और मंत्र जाप करते रहें.
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