
Muharram 2026: अजमेर शरीफ में मोहर्रम का महीना केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक नहीं है, बल्कि यह सदियों पुरानी परंपराओं और भावनात्मक जुड़ाव का भी महत्वपूर्ण अवसर माना जाता है. हर साल की तरह इस बार भी मोहर्रम की 7वीं तारीख पर अजमेर में 50 सालों से अधिक पुरानी ‘मेहंदी’ की रिवायत पूरे सम्मान और अकीदत के साथ निभाई गई. हज़रत इमाम हुसैन और कर्बला के शहीदों की याद में निकाला जाने वाला यह विशेष जुलूस स्थानीय लोगों और ज़ायरीन के लिए बेहद खास महत्व रखता है.
मोहर्रम के दौरान अजमेर शरीफ में देशभर से बड़ी संख्या में श्रद्धालु और अकीदतमंद पहुंचते हैं. इसी क्रम में मोहर्रम की 7वीं तारीख को आयोजित होने वाला ‘जश्ने-मेहंदी’ कार्यक्रम भी आकर्षण का प्रमुख केंद्र बना रहा. यह परंपरा न केवल धार्मिक भावनाओं से जुड़ी हुई है, बल्कि पीढ़ियों से चली आ रही सांस्कृतिक विरासत का भी प्रतीक मानी जाती है.
पूरी रात गूंजती है अकीदत, सुबह तक जारी रहता है मेहंदी का आयोजन
इस परंपरा को निभाने वाले आबिद खान ने बताया कि मेहंदी की रस्म का आयोजन रात 9:30 बजे शुरू होता है और अलसुबह लगभग 4 बजे तक चलता है. इस दौरान बड़ी संख्या में ज़ायरीन और स्थानीय लोग शामिल होकर अपनी अकीदत पेश करते हैं. रातभर चलने वाले इस कार्यक्रम में धार्मिक माहौल के साथ श्रद्धा और सम्मान का अनूठा संगम देखने को मिलता है.
मेहंदी की यह रस्म वर्षों से ग़ुलाम भाई के परिवार द्वारा निभाई जा रही है. आबिद खान के अनुसार उनके दादाजी के समय से शुरू हुई यह परंपरा आज भी उसी समर्पण और श्रद्धा के साथ आगे बढ़ाई जा रही है. यही वजह है कि यह आयोजन मोहर्रम के महत्वपूर्ण कार्यक्रमों में गिना जाता है.
बड़े ताज़िये शरीफ से उठती है अकीदत की यह अनोखी रिवायत
मेहंदी का जुलूस बड़े ताज़िये शरीफ से प्रारंभ होता है. इसके बाद बुलंद दरवाज़े पर मरसिया पढ़ा जाता है और ढोल-ताशों तथा बैंड-बाजों के साथ जुलूस आगे बढ़ता है. धार्मिक गीतों और शोक संदेशों के बीच अकीदतमंद कर्बला के शहीदों को याद करते हुए श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं.
पूरे मार्ग में श्रद्धालुओं की भीड़ देखने को मिलती है, जो इस ऐतिहासिक रिवायत का हिस्सा बनने के लिए दूर-दूर से पहुंचते हैं. जुलूस के दौरान अनुशासन और धार्मिक गरिमा का विशेष ध्यान रखा जाता है.
त्रिपोलिया से चितोली गेट तक तय करता है श्रद्धा का सफर
जश्ने-मेहंदी का यह कारवां अजमेर शहर के प्रमुख मार्गों से होकर गुजरता है. जुलूस त्रिपोलिया गेट, कमानी गेट और चितोली गेट जैसे ऐतिहासिक रास्तों से आगे बढ़ते हुए अपनी मंजिल तक पहुंचता है. आखिर में सुबह लगभग 4 बजे यह ढाई दिन के झोपड़े पर संपन्न होता है, जहां विशेष अकीदत के साथ मेहंदी पेश की जाती है.
इस पूरे आयोजन के दौरान शहर का माहौल धार्मिक श्रद्धा और भाईचारे की मिसाल पेश करता है. स्थानीय प्रशासन और आयोजन समिति द्वारा व्यवस्थाओं को सुचारु बनाए रखने के लिए विशेष इंतजाम भी किए जाते हैं.
पीढ़ी दर पीढ़ी आगे बढ़ रही है अकीदत की यह रिवायत
आबिद खान का कहना है कि यह परंपरा उनकी उम्र से भी अधिक पुरानी है. पहले उनके दादाजी इस रस्म को निभाते थे और अब परिवार की नई पीढ़ी इसे आगे बढ़ा रही है. यही निरंतरता इस आयोजन को विशेष बनाती है और इसे अजमेर की धार्मिक-सांस्कृतिक पहचान का महत्वपूर्ण हिस्सा बनाती है.
मोहर्रम 2026 के दौरान अजमेर शरीफ में आयोजित यह मेहंदी जुलूस एक बार फिर इस बात का प्रमाण बना कि आस्था और परंपराएं समय के साथ और अधिक मजबूत होती जाती हैं. कर्बला के शहीदों की याद में निकाला जाने वाला यह जुलूस न केवल धार्मिक श्रद्धा का प्रतीक है, बल्कि सामाजिक एकता, सांस्कृतिक विरासत और पीढ़ियों से चली आ रही अकीदत की जीवंत मिसाल भी है.
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Input By : हितेश बालम
