
अमेरिका में डोनाल्ड ट्रंप क्या आए दुनिया विचित्र सी हो गई है. आज की डेट में कौन सा देश किसका दोस्त है, ये कहना बहुत मुश्किल है. सेकेंड वर्ल्ड वॉर के बाद दुनिया दो खेमों में बंटी तो एक तरफ रूस तो दूसरी तरफ अमेरिका खड़े नजर आए. रूस के साथ तो बहुत कम देश थे, पर अमेरिका के साथ पूरा यूरोप और एशिया के भी ज्यादातर देश खड़े हो गए. ट्रंप के दूसरी बार सत्ता में आने तक कमोबेश स्थिति यही रही. हां, 2010 के बाद चीन भी जरूर एक तीसरी ताकत के रूप में उभरा. पर दुश्मनी और दोस्ती की लाइन रूस पर ही चलती रही.

रूस-यूरोप में अचानक क्या हुआ
यूक्रेन पर रूस ने हमला किया तो स्थिति वही दिखी. चीन ढुलमुल रहा और अमेरिका के साथ पूरा यूरोप और एशिया में जापान-पाकिस्तान आदि देश साफ तौर पर दिखे. मगर ट्रंप ने सारे समीकरण बिगाड़ दिए. जिन इटली की प्रधानमंत्री जॉर्जिया मेलोनी को ट्रंप ने अपने शपथ ग्रहण समारोह में खास तौर पर बुलाया था, उनसे भी अब उनकी ठन गई है. आज ही उन्होंने मेलोनी को खूब सुनाया है. नाटो और यूरोप को पक्का यकीन होता जा रहा है कि ट्रंप के रहते तो अमेरिका उनका साथ नहीं ही देने वाला, हो सकता है कि बाद में भी मुश्किल की घड़ी में साथ ना दे. ऐसे में रूस से दुश्मनी समाप्त करने की भावना अब धीरे-धीरे बढ़ने लगी है. रूस को भी ये अपनी अर्थव्यवस्था सुधारने के लिए एक अवसर दिख रहा है. वो भी संकेत दे रहा है कि उसे रिश्ते सुधारने में कोई परहेज नहीं.

रूस का सीधा मैसेज
रूस ने शुक्रवार को कहा कि वह यूरोपीय देशों के साथ बातचीत के लिए तैयार है, लेकिन अल्टीमेटम स्वीकार नहीं करेगा. यह बयान ऐसे समय में आया है जब संकेत मिल रहे हैं कि यूक्रेन में युद्ध शुरू होने के बाद से मॉस्को से संपर्क लगभग बंद रखने वाला EU अब बातचीत की पहल कर सकता है. क्रेमलिन के प्रवक्ता दिमित्री पेस्कोव ने कहा कि एजेंडे में शामिल कई जटिल मुद्दों को देखते हुए ऐसे संपर्क जरूरी हैं, लेकिन उन्होंने यह भी कहा कि यूरोपियनों को रूस के प्रति अपना नजरिया बदलना होगा. उन्होंने पत्रकारों से कहा, “यूरोप के लोगों में एक बहुत बड़ी गलतफहमी है: उन्हें लगता है कि रूस के साथ बातचीत मजबूत स्थिति से और रूस की कमजोरी का फायदा उठाकर ही की जानी चाहिए. यह उनकी सबसे बड़ी गलती है… ऐसी बातचीत से कुछ हासिल नहीं होगा. क्या ऐसा यूरोप की नाकामी, गलत जानकारी या बेवकूफी की वजह से हो रहा है? हमें पक्का नहीं पता, लेकिन यह सच है.” पुतिन ने कहा है कि वह यूरोपीय सरकारों के साथ बातचीत के लिए तैयार हैं, लेकिन पहल उन्हें ही करनी चाहिए क्योंकि उन्हीं ने संबंध तोड़े थे. यूक्रेन पर हमले के कारण EU ने रूस पर 20 बार प्रतिबंध लगाए हैं.
यूरोप के रुख में बदलाव
एक साल से ज्यादा समय तक अलग रहने और इस झगड़े को खत्म करने की कोशिश का काम अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप पर छोड़ने के बाद, EU ने अब रूस से सावधानी से संपर्क करना शुरू कर दिया है. EU के एक अधिकारी ने बुधवार को बताया कि यूरोपियन काउंसिल के प्रेसिडेंट एंटोनियो कोस्टा के ऑफिस ने हाल के हफ्तों में क्रेमलिन के साथ “राजनयिक स्तर पर संक्षिप्त संपर्क” किए हैं, ताकि “बातचीत के रास्ते खोले जा सकें”. मगर इसका कई यूरोपीय देशों ने विरोध कर दिया. EU प्रमुख एंटोनियो कोस्टा ने शुक्रवार को क्रेमलिन के साथ अपने ऑफिस की डिप्लोमैटिक बातचीत का बचाव किया. उन्होंने कहा कि कुछ सदस्य देशों के विरोध के बावजूद, ब्लॉक को मॉस्को की बात “सुनने” की जरूरत है. EU नेताओं की एक समिट के बाद यूरोपियन काउंसिल के प्रेसिडेंट कोस्टा ने कहा, “हमें डिप्लोमैटिक तरीकों से यूक्रेन का समर्थन करने की ज़रूरत है, इसलिए रूस के साथ सीधा डिप्लोमैटिक चैनल होना जरूरी है.”

फ्रांस-जर्मनी बातचीत के पक्ष में
मीटिंग के बाद फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने कहा कि युद्ध खत्म करने की किसी भी बातचीत में यूरोप को आखिर में शामिल होना ही होगा, लेकिन मॉस्को को यह दिखाना होगा कि वह असली बातचीत के लिए तैयार है. मैक्रों ने कहा, “यह रूस पर निर्भर करता है – जिसे हाल के महीनों में कई प्रस्ताव दिए गए हैं – कि वह कब बातचीत के लिए तैयार होगा. बातचीत शुरू में रूस और यूक्रेन के बीच होगी, और इसमें अमेरिकियों और यूरोपियों को भी शामिल करना होगा.” जर्मन चांसलर फ्रेडरिक मर्ज ने कहा कि अभी ऐसा समय नहीं आया है, जब यूरोप को यह तय करना पड़े कि क्रेमलिन के साथ बातचीत में उसका प्रतिनिधित्व कौन करेगा. ऑस्ट्रिया के चांसलर क्रिश्चियन स्टॉकर ने गुरुवार को ‘फाइनेंशियल टाइम्स’ में छपे एक इंटरव्यू में कहा कि EU को यूक्रेन में शांति वार्ता के माहौल का फायदा उठाकर पुतिन के साथ बातचीत फिर से शुरू करने की कोशिशों को आगे बढ़ाना चाहिए.
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विजय शंकर पांडेय
चीफ सब एडिटर
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