
जून में खत्म हुई तिमाही में चीन की अर्थव्यवस्था की रफ्तार तेजी से कम हुई है. दूसरी तिमाही में सकल घरेलू उत्पाद (GDP) की ग्रोथ रेट 4.3 प्रतिशत रही. यह पिछले तीन साल से ज्यादा समय में चीन की सबसे धीमी ग्रोथ रेट है और पिछली तिमाही की 5 प्रतिशत की ग्रोथ से भी कम है. एक्सपोर्ट के साथ-साथ चीन की घरेलू खपत की मांग भी बहुत कम हो गई है. यह स्थिति तब है जब आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस से लेकर, डिफेंस और तकनीक के क्षेत्र में उसका लोहा दुनिया मान रही है.
कहा जाता है कि किसी चीज की अति ठीक नहीं होती. कुछ-कुछ ऐसा ही चीन के साथ हो रहा है. साल 2000 तक चीन हर किसी के साथ कम से कम उचित व्यवहार करता था. उसका सबसे ज्यादा ध्यान बिजनेस पर होता था. पड़ोसी देशों से सीमा विवाद को भी वो कूटनीति के जरिए ही आगे बढ़ाता था, और बिजनेस पर फोकस करता था. पैसा आया तो धीरे-धीरे चीन ने अपनी ताकत बढ़ानी शुरू की. आज स्थिति ये है कि दुनिया के दूसरे देश तो क्या अमेरिका भी सीधे चीन से लड़ाई मोल लेने में कम से कम दो बार तो जरूर सोचेगा. ये जानने के बाद धीरे-धीरे चीन ने अपने सभी पड़ोसी देशों के जमीन और पानी पर अधिकार जताना शुरू कर दिया. दुनिया सबकुछ देख और समझ रही थी.
कैसे दुनिया चीन से डरी
अघोषित रूप से चीन के खिलाफ दुनिया भर में माहौल बनने लगा. कोरोना के बाद इसमें और इजाफा हुआ. रही-सही कसर ट्रंप ने पूरी कर दी. वो कोरोना को लेकर सीधे चीन पर आरोप लगाने लगे. चुनाव प्रचार के दौरान चीन को अमेरिका का दुश्मन बताने लगे. आज की स्थिति में अमेरिका के डिफेंस अकादमियों से लेकर यूनिवर्सिटी तक में चीन को सबसे बड़ा खतरा अमेरिका के लिए माना जा रहा है. एशिया के कई देश पहले से ही चीन की असलियत समझ चुके थे. मगर ट्रंप ने राष्ट्रपति बनने के बाद यूरोप से लेकर एशिया के देशों पर टैरिफ से लेकर और तरह के जो व्यवहार किए उससे चीन को फिर से संजीवनी मिल गई.

जिनपिंग के सर्वे का पूरा सच
ईरान युद्ध में अमेरिका उलझा तो चीन ये मानने लगा कि अब उसका दुनिया पर वर्चस्व हो जाएगा. इसी बीच 8 फरवरी से 13 मई 2026 के बीच एक सर्वे किया गया. अमेरिका के प्यू रिसर्च सेंटर के ग्लोबल एटीट्यूड्स सर्वे 2026 बताती है कि दुनिया के कई देशों में पहली बार चीन की छवि अमेरिका से बेहतर हो गई है. इतना ही नहीं, कई देशों के लोगों का भरोसा अब अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की तुलना में चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग पर अधिक है. इसमें एशिया, एशिया-प्रशांत, मध्य पूर्व और यूरोप के 36 देशों देशों में चीन को अमेरिका से ज्यादा अच्छा माना गया. इससे लग सकता है कि चीन और मजबूत हो रहा है. मगर दरअसल, ये तात्कालिक है. अभी अमेरिका नई रणनीति के तहत काम कर रहा है. नये समीकरण बना रहा है. वो जानता है कि चीन से लड़ने के लिए उसके सहयोगियों को भी मजबूत होना होगा. जाहिर है अब तक जो उसके सहयोगी चुपचाप बैठे हुए थे, वो इससे नाराज हैं, पर ये तो तय हो गया है कि अब कोई भी देश किसी पर एकतरफा रूप से निर्भर नहीं रहना चाहता.

आगे क्या होगा चीन का
मगर यहीं पर शुरूआत में बताई गई चीन की अर्थव्यवस्था को फिर से याद कर लें. उसकी जीडीपी घट रही है. तो आखिर ऐसा क्यों. दरअसल, ऐसा इसलिए कि चीन सबसे ज्यादा सामान अमेरिका, यूरोप और भारत को बेचता है. भारत तो पहले ही चीन से अपने सामान को कम मंगाने पर काम कर रहा है, लेकिन भारत के साथ दिक्कत ये है कि चीन से रेयर अर्थ मिनरल्स से लेकर भारी मशीनें और इलेक्ट्रिक सामान भारत आयात करता है. भारत के पास इन सामानों को किसी और देश से खरीदने का अभी फिलहाल कोई विकल्प नहीं है. यही अमेरिका और चीन के साथ भी है. मगर अमेरिका में चीन को खतरा मानने के बाद से इस पर काम शुरू हो गया है. अमेरिका रेयर अर्थ मिनरल्स से लेकर खुद को दुनिया की फैक्ट्री बनाने पर काम कर रहा है. वहीं अमेरिका से मिले झटके के बाद यूरोप को भी एहसास हो गया है कि किसी पर पूरी तरह निर्भर रहकर वो नहीं रह सकता. अब अमेरिका की तरह यूरोप भी खुद को तैयार कर रहा है. यही कारण है कि चीन का एक्सपोर्ट धीरे-धीरे घटने लगा है. वहीं उसका घरेलू बाजार भी इतना मजबूत नहीं है कि वो दुनिया भर के प्रोडक्शन को अपने देश में खपा ले. धीरे-धीरे दुनिया भर के अमीर देश चीन से सामान आयात को कम कर रहे हैं या उसे कम करने के उपाय कर रहे हैं. यही कारण है कि चीन नये बाजार ढूंढ रहा है. मगर फिलहाल इसका फायदा होता तो उसे नहीं दिख रहा.
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