
चंडीगढ़:
पंजाब से अलगाववाद का खतरा पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है. ये इस बात से साफ है कि उग्रवाद के 30 साल तक शांत रहने के बावजूद, पंजाब के लोगों ने दो खालिस्तानी अलगाववादियों, जेल में बंद अमृतपाल सिंह और पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के हत्यारे के बेटे सरबजीत सिंह खालसा को खादूर साहिब और फरीदकोट लोकसभा सीटों से चुना. साथ ही बागी अकाली दल विधायक मनप्रीत अयाली भी हाल ही में उनके साथ जुड़ गए.
ऐतिहासिक शिकायतें, सामाजिक-आर्थिक परेशानी, कर्ज का जाल, भू-राजनीतिक हालात और सरकारी सेवाओं की कमी जैसे पांच कारणों ने अलगाववाद के खतरे को जिंदा रखा है. पंजाब ने 1984 से 1995 के बीच चरम पर रहे उग्रवाद से नए सबक सीखे हैं. राज्य और वहां के लोगों ने वापसी की और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान बनाई. हमने पंजाबियों को विदेश जाते देखा है, और कुछ मशहूर नाम जो उग्रवाद के खत्म होने या शांत होने के दौरान पैदा हुए, उनमें सिद्धू मूसेवाला, सिमरनजीत कौर, शुभमन गिल और हरमनप्रीत कौर शामिल हैं.
दूसरे शब्दों में कहें तो, जहां मुख्यधारा का पंजाब रोजमर्रा की आर्थिक जरूरतों, पलायन और विकास पर ध्यान केंद्रित किए हुए है, वहीं ऐतिहासिक शिकायतें अलगाववाद को हवा देती रहती हैं. निराशा होने पर ऐतिहासिक कमजोरियां उभर आती हैं. कुछ लोगों का कहना है कि पंजाब एक ऐसे ज्वालामुखी पर बैठा है जो कभी भी फट सकता है. इसे किसान आंदोलन, जेल की सजा पूरी कर चुके उग्रवादियों की रिहाई, गैर-न्यायिक हत्याएं, सरकारी सख्ती या मानवाधिकारों का उल्लंघन, धार्मिक अपमान या कर्ज के जाल जैसे मुद्दों से हवा मिलती है. कानून-व्यवस्था और मानवाधिकारों के उल्लंघन की बात तो छोड़िए, पंजाब के गैंगस्टर और यहां तक कि गुरिंदरजीत सिंह नागरा जैसे पुलिस अधिकारी (जो पहले स्टेशन हाउस ऑफिसर यानी SHO थे) भी FBI की ‘वॉन्टेड लिस्ट’ में शामिल हैं.

ऐतिहासिक शिकायतें
पंजाब की ऐतिहासिक शिकायतों की जड़ें 1966 में मिलती हैं, जब पंजाब पुनर्गठन अधिनियम के तहत हरियाणा और हिमाचल के इलाकों को अलग कर दिया गया था. राजनेताओं ने चंडीगढ़ और नदी के पानी (SYL मुद्दे सहित) पर पंजाब के दावों को जिंदा रखा है. हालांकि, 1984 के सिख-विरोधी दंगों के अलावा, ‘धार्मिक अन्याय और पहचान की रक्षा’ की भावना को भड़काने के लिए ऑपरेशन ब्लू स्टार का भी बार-बार जिक्र किया जाता है. कट्टरपंथी अक्सर लोगों के इस आक्रोश का फ़ायदा उठाकर शासन-व्यवस्था पर सवाल उठाते हैं और अलगाववाद को समाधान के तौर पर पेश करते है.
न्याय न मिलने की भावना ने भी इस नाराजगी को बनाए रखा है. हालांकि कुछ हाई-प्रोफाइल आरोपियों को सज़ा हुई है, लेकिन इसमें दशकों लग गए, जिससे सिस्टम की अनदेखी की भावना घर कर गई. तीन दशक बाद भी उस दौर की कहानी का असर बना हुआ है. सिख संगठन उग्रवाद और उससे निपटने की कार्रवाई के दशकों को सिर्फ़ इतिहास नहीं मानते, बल्कि घल्लूघारा (नरसंहार), क्षेत्रीय संगीत, सोशल मीडिया, फ़िल्मों और साहित्य जैसी चीज़ों के ज़रिए इसे ज़िंदा रखे हुए हैं. ‘सतलुज’, ‘पंजाब 1984’, ‘हवाएं’, ’47 टू 84′, ‘जोगी’, ‘धर्म युद्ध मोर्चा’ जैसी फ़िल्मों ने पंजाबियों के बीच एक भावनात्मक जुड़ाव या सहानुभूति पैदा की है.
सामाजिक-आर्थिक संकट
- पंजाब का सामाजिक-आर्थिक संकट उसकी ऐतिहासिक रूप से समृद्ध कृषि अर्थव्यवस्था के ठप पड़ने से पैदा हुआ है.
- भूजल के स्तर में गिरावट और मिट्टी की सेहत बिगड़ने के कारण गेहूं-धान की एक ही तरह की खेती (मोनोकल्चर) अब टिकाऊ नहीं रही है.
- वित्त वर्ष 2025-26 में कृषि क्षेत्र में -2.5% की नकारात्मक वृद्धि दर्ज की गई, जो पारंपरिक फसल चक्रों पर अस्थिर निर्भरता को दर्शाता है.
मुफ़्त बिजली सब्सिडी के कारण ट्यूबवेल सिंचाई पर बहुत ज़्यादा निर्भरता ने राज्य के जल स्तर को खतरनाक हद तक नीचे गिरा दिया है, जिससे भविष्य में रेगिस्तान बनने का खतरा पैदा हो गया है. इसका भारी बोझ राज्य के खजाने पर भी पड़ा है, जो बिजली सब्सिडी पर ₹15,550 करोड़ खर्च करता है. यह पंजाब के कुल बजट का लगभग 5.97% है.
इस संकट ने न केवल वित्तीय संकट को बढ़ाया है, बल्कि सामाजिक चुनौतियां भी खड़ी की हैं. खेती की लागत बढ़ने और पैदावार में कोई बढ़ोतरी न होने के कारण छोटे और सीमांत किसान संस्थागत और अनौपचारिक कर्ज के जाल में फंस गए हैं, जिससे ग्रामीण इलाकों में लगातार संकट बना हुआ है. पंजाब एग्रीकल्चर यूनिवर्सिटी, गुरु नानक देव यूनिवर्सिटी और पंजाबी यूनिवर्सिटी समेत तीन प्रमुख सरकारी यूनिवर्सिटीज़ की एक अहम स्टडी में 2000 से 2015 के बीच 16,606 किसानों और खेत मज़दूरों की मौत दर्ज की गई. पंजाब एग्रीकल्चर यूनिवर्सिटी की ओर से संगरूर, बठिंडा और मानसा समेत छह ज़िलों में की गई एक फ़ॉलो-अप स्टडी में 2000 से 2018 के बीच 9,291 मौतें दर्ज की गईं.

खेती-बाड़ी के संकट के कई दशकों का नतीजा ‘मोनोकल्चर’ (एक ही तरह की फ़सल उगाना) के रूप में सामने आया, जिससे बेरोज़गारी बढ़ी और यह अक्सर निराशा, आत्म-सम्मान में कमी, तनाव और मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं के बढ़ते जोखिम से जुड़ी होती है. पंजाब में ड्रग्स की समस्या भी बेरोज़गारी से जुड़ी है, जिससे लोगों में नाराज़गी और बेचैनी पैदा होती है.
आर्थिक पैमानों पर पंजाब अपने पड़ोसी राज्यों हरियाणा और हिमाचल से पीछे है. पंजाब की प्रति व्यक्ति आय लगभग ₹1.95 लाख से ₹2.27 लाख है, जबकि हरियाणा में यह ₹3.25 लाख से ₹4.04 लाख और हिमाचल में ₹2.83 लाख है.
चंडीगढ़ की PU के ‘इंस्टीट्यूट फॉर डेवलपमेंट एंड कम्युनिकेशन’ के डायरेक्टर डॉ. वरिंदर शर्मा ने कहा, “पंजाब में बेरोजगारी दर 5.3 प्रतिशत है, जो राष्ट्रीय औसत 3.1 प्रतिशत से ज़्यादा है. शहरी इलाकों में बेरोजगारी दर 14.8 प्रतिशत है, जबकि ग्रामीण इलाकों में यह 22.5 प्रतिशत है. पंजाब के कम पढ़े-लिखे युवाओं के लिए रोजगार के मौके नहीं हैं. औद्योगीकरण सिर्फ़ शहरी इलाकों तक ही सीमित रहा और ग्रामीण इलाकों में ऐसा कोई निवेश नहीं आया, जिससे बेरोजगारी बढ़ी.”
कर्ज का जाल
पर्याप्त सुविधाएं, शिक्षा और स्वास्थ्य से जुड़ा इंफ्रास्ट्रक्चर न बना पाना सीधे तौर पर राज्य के कर्ज से जुड़ा है. पंजाब अपनी कमाई का 25 प्रतिशत तक हिस्सा कर्ज और ब्याज चुकाने में खर्च करता है, जो चिंता की बात है. राज्य पर बकाया कर्ज ₹4.17 लाख करोड़ से ज़्यादा हो गया है और 2027 तक यह ₹4.48 लाख करोड़ तक पहुंच सकता है.

पुरानी कृषि-आधारित अर्थव्यवस्था से मैन्युफैक्चरिंग या सर्विस-आधारित उद्योग की ओर बढ़ने का लंबे समय से इंतज़ार किया जा रहा था, लेकिन यह बदलाव नहीं हो पाया. GSDP में मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर का योगदान सिर्फ़ 29 प्रतिशत है. भौगोलिक नुकसान और पड़ोसी राज्यों हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड को मिलने वाले टैक्स इंसेंटिव की वजह से कई इंडस्ट्रियल सेक्टर में ठहराव आ गया है.
पंजाब में बढ़ती बेरोजगारी का एक और बुरा असर ‘ब्रेन ड्रेन’ (प्रतिभाओं का पलायन) है. पंजाब एग्रीकल्चर यूनिवर्सिटी की एक स्टडी में पाया गया कि 2016 के बाद पंजाब छोड़ने वाले 73 प्रतिशत से ज़्यादा युवा ग्रामीण इलाकों से थे. दुनिया भर में पंजाबी मूल के लोगों की संख्या 1.5 करोड़ (15 मिलियन) होने का अनुमान है. बड़ी संख्या में बेरोजगार युवाओं को अपनी ज़मीन बेचकर विदेश जाने के लिए मजबूर होना पड़ा है.
भू-राजनीतिक हालात
कट्टरपंथी अप्रवासियों (खालिस्तानियों) ने भारतीय सरकार को दमनकारी और अल्पसंख्यकों के खिलाफ काम करने वाली सरकार बताकर भारत-विरोधी नैरेटिव बनाने की कोशिश की है. ऐतिहासिक शिकायतों को हवा देकर और भारत में अपनी जान को खतरा होने जैसे झूठे आधारों पर शरण मांगकर, वे सिख समुदाय के लोगों को एकजुट करते रहते हैं. ‘सिख्स फॉर जस्टिस’ जैसे घोषित आतंकी संगठनों ने जनमत संग्रह (रेफरेंडम) की नाकाम कोशिशें भी की हैं. जब भी कोई भारतीय अधिकारी किसी विदेशी देश का दौरा करता है, तो सार्वजनिक प्रदर्शन आम बात है. गैर-सिख मंदिरों की बेअदबी और सिख पूजा स्थलों पर नियंत्रण की घटनाएं भी आम हैं.

अलगाववादी गुट, झूठे मानवाधिकार अभियानों और कानूनी वकालत के ज़रिए भारत के खिलाफ गलत नैरेटिव बनाने की कोशिश करते हैं. हरदीप सिंह निज्जर की हत्या के मामले में, कनाडा सरकार और खालिस्तानी गुटों ने भारत पर अलगाववादी की हत्या का आरोप लगाते हुए सफलतापूर्वक अपना नैरेटिव बनाया. तत्कालीन कनाडाई प्रधानमंत्री जस्टिन ट्रूडो ने निज्जर मामले में भारत सरकार को जोड़ने वाले ठोस आरोप लगाकर एक गंभीर राजनयिक संकट खड़ा कर दिया था. कनाडा सरकार ने हाल ही में कहा कि निज्जर की हत्या में भारत सरकार को जोड़ने वाला कोई सबूत नहीं था. असल में, इस हत्या की साजिश गैंगस्टरों ने रची थी.
कई दशकों तक, कनाडा सरकार यह मानने को तैयार नहीं थी कि 23 जून 1985 को हुए कनिष्क बम विस्फोट मामले में खालिस्तानी शामिल थे, जिसमें 329 निर्दोष लोग मारे गए थे. जिन आतंकवादियों ने विमान में बम रखा था, उन्हें कनाडा में मौजूद आतंकवादी समूह ‘हीरो’ मानते हैं.
खुफिया रिपोर्टों के अनुसार, पंजाब के कई बेरोजगार युवाओं को विदेश में नौकरी का लालच देकर कट्टरपंथी प्रवासी नेटवर्क में शामिल कर लिया जाता है. कट्टरपंथी तत्व पश्चिमी देशों की उदार कानूनी प्रणालियों का फायदा उठाते हैं, जिन्हें अंतरराष्ट्रीय अपराध नेटवर्क के लिए सुरक्षित पनाहगाह माना जाता है और उग्रवाद को राजनीतिक असहमति का रूप देते हैं. विदेशों में भारतीय मिशनों के खिलाफ सोशल मीडिया अभियान और विरोध-प्रदर्शन या भारतीय दूतावासों में घुसपैठ, कट्टरपंथी समूहों द्वारा शुरू किए गए भारत-विरोधी प्रचार का हिस्सा हैं.
राजनीतिक अवसरवाद
पंजाब में गहराता राजनीतिक असंतोष अनसुलझे धार्मिक, कृषि और आर्थिक मुद्दों से उपजा है. राजनीतिक गठबंधनों में बार-बार बदलाव और भ्रष्टाचार के आपसी आरोपों के कारण मतदाताओं को लगता है कि राजनेता केवल अपना स्वार्थ देखते हैं और जन-कल्याण से दूर हैं, जिससे नागरिकों का भरोसा और सम्मान बुरी तरह प्रभावित हुआ है.
जब कांग्रेस और शिरोमणि अकाली दल (SAD) जैसी मुख्यधारा की राजनीतिक पार्टियां उम्मीदों पर खरी नहीं उतरतीं, तो पंजाब के मतदाता निराश हो जाते हैं. मुफ्त सुविधाओं की राजनीति, कृषि संकट और बढ़ती बेरोजगारी के कारण न केवल ग्रामीण स्थानीय निकायों के चुनावों में मतदान प्रतिशत में भारी गिरावट आई, बल्कि 2024 के लोकसभा चुनावों में निर्दलीय और कट्टरपंथी उम्मीदवारों की जीत को भी बढ़ावा मिला.
राजनेताओं का रुझान बुनियादी संरचनात्मक मुद्दों को हल करने के बजाय अल्पकालिक लाभ पाने की ओर रहा है, साथ ही सार्वजनिक सेवा वितरण, समय पर न्याय और पुलिस सुधारों में भी अक्षमता देखी गई है. दिलचस्प बात यह है कि जहां शिरोमणि अकाली दल जसवंत सिंह खालरा की ज़िंदगी पर बनी और बैन की गई फ़िल्म ‘सतलुज’ की स्क्रीनिंग का इंतज़ाम कर रहा था, वहीं उनकी पत्नी परमजीत कौर खालरा ने सार्वजनिक रूप से कहा था कि जब पार्टी सत्ता में थी, तो उसने परिवार को न्याय दिलाने में कोई मदद नहीं की थी.
इसी तरह, केंद्रीय मंत्री रवनीत सिंह बिट्टू ने बीजेपी में शामिल होने के बाद ही उग्रवाद के दौरान हिंदुओं की टारगेटेड हत्याओं का मुद्दा उठाया. जब वे कांग्रेस में थे, तब यह मुद्दा कभी नहीं उठाया गया था.
इसे भी पढ़ें: लॉरेंस बिश्नोई के प्रत्यर्पण की मांग करेगा यूएस, अमेरिकी न्याय विभाग ने कर दिया कन्फर्म





