

अबसे चार साल पहले अपने घर के सामने हनुमान चालीसा पढ़ने आई महिला सांसद को जेल में डाल देने वाले उद्धव ठाकरे इन दिनों खुद हनुमान चालीसा पढ़ते नजर आ रहे हैं. बात अप्रैल 2022 की है. महाराष्ट्र में महाविकास आघाड़ी की सरकार थी और उद्धव ठाकरे मुख्यमंत्री थे. मराठीवाद से हिंदुत्ववाद की तरफ अपना झुकाव दिखाने के लिये महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना के प्रमुख राज ठाकरे ने ऐलान किया कि अगर मस्जिदों से लाऊडस्पीकर पर अजान दिया जाना बंद नहीं हुआ तो उनके कार्यकर्ता मस्जिदों के सामने हनुमान चालीसा पढ़ेंगे. राज्य का सियासी माहौल गर्मा गया. राज ठाकरे ऐसा ऐलान करके एक तरह से अपने चचेरे भाई उद्धव ठाकरे पर निशाना साध रहे थे, जिन पर कांग्रेस और एनसीपी जैसी पार्टियों के साथ गठबंधन कर लेने पर हिंदुत्ववाद से समझौते का आरोप लग रहा था. अमरावती की बीजेपी सांसद नवनीत राणा ने बहती गंगा में हाथ धोने की सोची और ऐलान कर दिया कि वे मुसलमानों के खैरख्वाह बन चुके उद्धव ठाकरे के बंगले मातोश्री पर आकर हनुमान चालीसा पढ़ेंगी.
बदले-बदले से उद्धव ठाकरे
मातोश्री आकर हनुमान चालीसा पढ़ने की चाहत रखने वाली नवनीत राणा को जेल की सलाखों के पीछे भेजने वाले ठाकरे इन दिनों खुद संकटमोचक हनुमान की शरण में पहुंच गये हैं. ठाकरे और उनके नेता तमाम कार्यकर्ताओं समेत हनुमान चालीसा पढ़ते नजर आ रहे हैं. ऑपरेशन टाईगर की वजह से अपने सियासी अस्तित्व पर आये संकट से निपटने के लिये उन्हें किसी ने संकटमोचक की अराधना की सलाह दी है. अपनी बची खुची पार्टी को बचाने के लिये ठाकरे अब बहुत कुछ करते नजर आ रहे हैं. जो उद्धव ठाकरे घूमने-फिरने से कतराते थे, उन्होने अपनी पार्टी के छह सांसदों की बगावत के बाद आनन-फानन में उनके चुनाव क्षेत्र का दौरा कर डाला. इसके बाद सिलसिलेवार तरीके से विधायकों और पार्टी पदाधिकारियों की बैठकें लेनी शुरू कीं. इस संगठनात्मक गतिविधि के अलावा उन्होने अयोध्या के राम मंदिर में हुए दान चोरी मामले को उठाते हुए राम रक्षा आंदोलन का ऐलान किया. इस आंदोलन की शुरुआत उन्होने दादर के मशहूर हनुमान मंदिर में हनुमान चालीसा पढ़कर की. अब उनकी पार्टी के नेता राज्य भर के अलग अलग ठिकानों पर मंदिर में महाआरती कर रहे हैं और हनुमान चालीसा का सामूहिक पाठ कर रहे हैं.
मुस्लिमों की राजनीति हो गई फेल
दरअसल, राम रक्षा आंदोलन का ऐलान करके ठाकरे अपनी शिव सेना की खोई इमेज वापस हासिल करने की कोशिश कर रहे हैं. वो इमेज जिसके तहत शिव सेना एक कट्टर हिंदुत्ववादी पार्टी मानी जाती थी. उस इमेज में मुस्लिम विरोध भी था. साल 2019 में जब ठाकरे ने बीजेपी से नाता तोड़कर महाविकास आघाड़ी बनायी तो उसमें दो ऐसी पार्टियां थीं, जो खुद को धर्मनिर्पेक्ष बता रहीं थीं – कांग्रेस और एनसीपी. इस गठबंधन की प्रस्तावना में दो बार “सेकुलर” शब्द का इस्तेमाल किया गया था. ठाकरे ने बेहिचक उस प्रस्तावना पर दस्तखत कर दिये. इसके बाद जब वे मुख्यमंत्री बने तब भी मुस्लिमों के प्रति सहिष्णु रवैया अपनाया. कोरोना काल के दौरान मुस्लिम बस्तियों में भी भरपूर सरकारी मदद पहुंचाई. ये देखा गया कि ठाकरे पुरानी अदावत को खत्म करके शिव सेना और मुस्लिम समाज के बीच पुल बनाने का काम कर रहे थे. हालांकि ठाकरे तब भी खुद को हिंदुत्वादी बताते रहे लेकिन उनके हिंदुत्ववाद में मुस्लिम विरोध नहीं था.
शिंदे ने भी लगाए थे सेकुलर होने के आरोप
उद्धव ठाकरे की मुसलमानों के प्रति इसी उदार नीति ने उनके विरोधियों को उन्हें घेरने का मौका दिया. बीजेपी ने आरोप लगाया कि ठाकरे भी कांग्रेस-एनसीपी की तरह मुस्लिमों का तुष्टिकरण कर रहे हैं. राज ठाकरे ने देखा कि ठाकरे के सेकुलर हो जाने से महाराष्ट्र की सियासत में कट्टर हिंदुत्वादी पार्टी की जगह खाली हो गयी है तो उन्होने जनवरी 2020 में अपनी पार्टी के लिये हिंदुत्ववादी विचारधारा अपना ली और उद्धव ठाकरे को घेरने लगे. साल 2022 में जब एकनाथ शिंदे ने पार्टी से बगावत की तो बगावत के जो कारण उन्होने गिनाये, उनमें एक मुद्दा ये भी था कि उद्धव ठाकरे अपने पिता बालासाहेब के कट्टर हिंदुत्ववाद से विमुख हो गये हैं.
गद्दार दांव भी हो गया फेल
साल 2025 के लोकसभा और विधान सभा और उसके बाद इसी साल हुए महानगरपालिका के चुनाव ठाकरे ने इसी मुद्दे पर लड़े कि उनके साथ गद्दारी हुई है, लेकिन खुद को शिंदे की गद्दारी का पीड़ित बताकर वोट मांगने से उनको कोई फायदा नहीं हो रहा था. उन्हें सलाह दी गयी कि अब गद्दारी का राग अलापना बंद करें क्योंकि वोटरों की इस मुद्दे पर न तो उन्हें सहानुभूति मिल रही है और न ही वोट. ऐसे में यही तय हुआ कि पार्टी को जीवित रखने के लिये कोई ठोस मुद्दा उठाना जरूरी है. यही वजह है कि ठाकरे फिर से खुद को हिंदुत्ववादी साबित करने के लिये राम मंदिर के दान चोरी मामले को उठा रहे हैं.
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