
मध्य प्रदेश की दतिया विधानसभा सीट पर होने वाला उपचुनाव अब पूरी तरह जातीय समीकरणों के इर्द-गिर्द घूमता नजर आ रहा है. करीब 2.40 लाख मतदाताओं वाली इस सीट पर राजनीतिक दलों की नजर उन जातियों पर है, जिनका वोट चुनाव का रुख बदल सकता है. खास बात यह है कि इस बार मुकाबला सिर्फ बीजेपी और कांग्रेस तक सीमित नहीं दिख रहा, बल्कि आजाद समाज पार्टी की एंट्री ने चुनाव को और दिलचस्प बना दिया है.
2023 के विधानसभा चुनाव में तत्कालीन गृहमंत्री डॉ. नरोत्तम मिश्रा को हार का सामना करना पड़ा था. राजनीतिक जानकारों की मानें तो इसकी बड़ी वजह बीजेपी के पारंपरिक सामाजिक समीकरण का बिगड़ना रही. ब्राह्मण, वैश्य और कुशवाह समाज का एक हिस्सा बीजेपी से दूर चला गया, जिसका सीधा असर चुनाव परिणाम पर पड़ा.
इसी अनुभव को देखते हुए डॉ. नरोत्तम मिश्रा इस बार सोशल इंजीनियरिंग के फॉर्मूले पर काम कर रहे हैं. पिछले दो महीनों में उन्होंने अलग-अलग समाजों की कई बैठकें की हैं. साथ ही अपने पारंपरिक वोट बैंक को फिर से मजबूत करने की कोशिश लगातार जारी है.
कांग्रेस उम्मीदवार पर नहीं कर सकी फैसला
दूसरी ओर कांग्रेस अभी तक अपना उम्मीदवार तय नहीं कर पाई है. पार्टी के भीतर कई नाम चर्चा में हैं. पूर्व विधायक राजेंद्र भारती ने अपने परिवार के किसी सदस्य को चुनाव लड़ाने से दूरी बना ली है. वहीं पूर्व विधायक कुंवर घनश्याम सिंह पहले ही कह चुके हैं कि पार्टी का आदेश होगा तो चुनाव लड़ेंगे.
अब कांग्रेस में अवधेश नायक का नाम सबसे ज्यादा चर्चा में है. उन्होंने नामांकन पत्र भी खरीद लिया है और चुनाव लड़ने की संभावना से इनकार भी नहीं किया है. ऐसे में कांग्रेस का अंतिम फैसला पूरे चुनावी समीकरण को प्रभावित कर सकता है.
आजाद समाज पार्टी ने बढ़ाई दोनों दलों की चिंता
इस बार आजाद समाज पार्टी ने दामोदर यादव को उम्मीदवार बनाकर मुकाबले को त्रिकोणीय बनाने की कोशिश की है. माना जा रहा है कि उनकी उम्मीदवारी से यादव समाज के साथ-साथ अनुसूचित जाति, खासकर जाटव और अहिरवार समाज के वोटों में भी बिखराव हो सकता है.
अगर ऐसा होता है तो इसका सबसे ज्यादा असर कांग्रेस के पारंपरिक वोट बैंक पर पड़ सकता है. वहीं भाजपा भी इस समीकरण पर लगातार नजर बनाए हुए है.
दतिया का जातीय गणित क्या कहता है?
दतिया विधानसभा में जातीय वोट बैंक ही चुनाव की असली ताकत माना जाता है. अनुमानित आंकड़ों के मुताबिक ब्राह्मण मतदाता करीब 33 से 35 हजार हैं और यह बीजेपी का पारंपरिक वोट बैंक माना जाता है.
अनुसूचित जाति के मतदाताओं की संख्या 58 से 60 हजार के बीच बताई जाती है. इनमें अकेले जाटव और अहिरवार समाज के 33 से 40 हजार मतदाता हैं, जिनका झुकाव आमतौर पर कांग्रेस की ओर माना जाता है.
कुशवाह समाज के लगभग 28 से 30 हजार मतदाता हैं. पिछले चुनाव में इस समाज की नाराजगी बीजेपी के लिए भारी पड़ी थी. यादव समाज के मतदाता 14 से 18 हजार के बीच माने जाते हैं और इस बार आजाद समाज पार्टी इन्हीं वोटों में सेंध लगाने की कोशिश कर रही है.
इसके अलावा ठाकुर समाज के 14 से 18 हजार, वैश्य समाज के 12 से 15 हजार, मुस्लिम मतदाता करीब 7 से 8 हजार और अन्य पिछड़ा वर्ग के 15 से 20 हजार मतदाता भी चुनाव में अहम भूमिका निभाते हैं.
बीजेपी का फोकस डैमेज कंट्रोल पर
बीजेपी इस बार अपने पुराने सामाजिक गठजोड़ को मजबूत करने में जुटी है. ब्राह्मण, ठाकुर, वैश्य और परंपरागत ओबीसी वोटों को एकजुट रखने की कोशिश की जा रही है.
वहीं कुशवाह समाज की नाराजगी दूर करने के लिए संगठन स्तर पर भी बदलाव किए गए हैं. जिला अध्यक्ष के रूप में रघुवीर कुशवाह की नियुक्ति को इसी रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है.
कांग्रेस की सबसे बड़ी चुनौती अपने पारंपरिक अनुसूचित जाति और मुस्लिम वोट बैंक को एकजुट रखना है. साथ ही पार्टी पिछड़ा वर्ग के प्रभावशाली चेहरों के जरिए चुनावी माहौल अपने पक्ष में बनाने की कोशिश कर रही है. लेकिन उम्मीदवार घोषित होने में हो रही देरी भी पार्टी के लिए चुनौती बन सकती है.
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दतिया का चुनाव सिर्फ किसी एक जाति के भरोसे नहीं जीता जा सकता. ब्राह्मण, अहिरवार, कुशवाह और यादव समाज इस चुनाव के सबसे अहम वोट बैंक माने जा रहे हैं. इन वर्गों का झुकाव जिस दल की ओर होगा, उसी की जीत की संभावना सबसे ज्यादा मजबूत होगी.
यही वजह है कि दतिया उपचुनाव में इस बार विकास के मुद्दों के साथ-साथ सामाजिक समीकरण और जातीय रणनीति भी चुनावी लड़ाई का सबसे बड़ा आधार बन गए हैं. आने वाले दिनों में प्रत्याशियों की घोषणा और समाजों की राजनीतिक पसंद यह तय करेगी कि दतिया की सत्ता की चाबी आखिर किसके हाथ जाएगी.
