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बिहार के युवा आबादी के पलायन को सद्गुरु ने बताया सिस्टम की विफलता, इतिहास की सुधार है राम मंदिर | What did Sadhguru say about the system and change in Bihar and Ram Mandir



ईशा फाउंडेशन के संस्थापक जग्गी वासुदेव सद्गुरु राम मंदिर के मुद्दों पर चर्चा की है. साथ ही बदलते बिहार को लेकर उन्होंने कहा है कि यहां सबकुछ अच्छा हुआ है. यहां बड़े विरासत होने के बावजूद वैसा प्रदर्शन नहीं किया है जैसा उसे करना चाहिए था. सद्गुरु ने बिहार में भी ईशा फाउंडेशन को शुरू किया है. उन्हें इस प्रदेश से काफी आशा है. उन्होंने बिहार की शिक्षा पर जोड़ दिया है और उन्होंने प्रदेश के लिए चुनौती भी माना है. साथ ही उन्होंने कहा है कि देश की शिक्षा व्यवस्था को बदलने की जरूरत है.

एनडीटीवी के साथ इंटरव्यू में सद्गुरू ने कहा कि राम मंदिर एक सभ्यता से जुड़ी घटना है, और अब यहां इतिहास को सुधारा गया है. उन्होंने मौजूदा नेतृत्व को सराहते हुए कहा कि उस खास जगह पर हुई ऐतिहासिक गलती को मौजूदा नेतृत्व ने सुधारा है. उन्होंने बताया कि बेहतर नेतृत्व से ज्यादा जरूरी बेहतर संस्थान होना जरूरी है. लेकिन मजबूत नेतृत्व के बिना आप मजबूत संस्थान भी नहीं बना सकते हैं. सद्गुरू ने कहा, नरेंद्र मोदी उस नेतृत्व की भूमिका में रहे हैं.

बिहार को लेकर सद्गुरु ने अपने विचार बताए और कहा कि पिछले कुछ दशकों में हमने जो देखा है, उसके मुकाबले बिहार बहुत बदल गया है, और सब कुछ अच्छा हुआ है. हालांकि उन्होंने कहा, यह दुखद है कि बुद्ध, महावीर, चाणक्य और नालंदा की विरासत होने के बावजूद बिहार ने वैसा प्रदर्शन नहीं किया जैसा उसे करना चाहिए था. यहां मिथिला, अंग और जरासंध का इतिहास भी रहा है.

युवाओं के पलायन के मु्द्दे पर सद्गुरु ने कहा कि बिहार में आगे बढ़ने की चाह रखने वाली युवा आबादी है और अगर उन्हें राज्य से बाहर जाना पड़ता है, तो यह सिस्टम की विफलता है.

सद्गुरु ने बताया कि ईशा फाउंडेशन बिहार में अपनी जगह बना रहा है. उन्होंने कहा, हम अंतिम संस्कार के मामले में लोगों को सम्मान देने की कोशिश कर रहे हैं और आश्रम के ज़रिए भी थोड़ी-बहुत मौजूदगी बना रहे हैं.

शिक्षा व्यवस्था को लेकर सद्गूरु ने कहा, भारत को युवाओं की ऊर्जा को सही दिशा देने और खास तौर पर शिक्षा व्यवस्था को बेहतर बनाने की ज़रूरत है, वरना अगले 30 सालों में भारत में सबसे ज़्यादा ऐसी बुजुर्ग आबादी होगी जो कोई उत्पादक काम नहीं कर रही होगी.

उन्होंने बिहार की शिक्षा को भी चुनौती बताया. साथ ही कहा, देश की शिक्षा व्यवस्था को बदलने की ज़रूरत है. यह हमारे सामने सबसे बड़ी चुनौती है. हम सिर्फ़ इसलिए पुराने सिस्टम को नहीं अपना सकते क्योंकि किसी और ने उसे हमारे लिए बनाया था.

अध्यात्म को लेकर उन्होंने कहा कि भारत आध्यात्मिक नहीं बना है, बल्कि लोग आध्यात्मिक बनते हैं. देश कभी आध्यात्मिक व्यक्ति नहीं बनता. लोग गहरे आध्यात्मिक हो सकते हैं, फिर भी राजनीति, व्यापार या सार्वजनिक जीवन में महत्वाकांक्षी हो सकते हैं. महत्वाकांक्षा एक कब्ज की तरह है.

उन्होंने कहा कि सदगुरु के तौर पर मैंने ज़िंदगी में कभी कोई सबक नहीं सीखा, क्योंकि मैं गलतियां नहीं करता. यह बात घमंड भरी बात लग सकती है, लेकिन हकीकत यही है.

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