
लखनऊ:
उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव को लेकर अब राजनीतिक पार्टियों ने तैयारियां तेज कर दी हैं. इसी बीच गुरुवार को बहुजन समाज पार्टी (बसपा) की अध्यक्ष मायावती ने अहम बैठक बुलाई है. इस बैठक में सभी 75 जिलों के अध्यक्षों को बुलाया गया है. बैठक में विधानसभा चुनाव से पहले संगठनात्मक तैयारियों की समीक्षा की जाएगी.
बसपा की ओर से जारी बयान में बताया गया है कि यह बैठक मॉल एवेन्यू स्थित पार्टी मुख्यालय में सुबह 11 बजे होगी.
बैठक में क्या होगा?
बयान में कहा गया कि बैठक में जमीनी स्तर पर पार्टी संगठन को मजबूत करने औक विधानसभा चुनाव की तैयारियों की समीक्षा पर चर्चा होगी.
इसमें कहा गया कि बसपा प्रमुख मायावती चुनाव के लिए उम्मीदवारों के चयन और समाज के विभिन्न वर्गों में पार्टी के समर्थन आधार को बढ़ाने के उपायों पर भी नए निर्देश जारी करेंगी.
यह बैठक इसलिए भी अहम है क्योंकि उत्तर प्रदेश में राजनीतिक दल 2027 के विधानसभा चुनाव के लिए अपनी तैयारियां तेज कर रहे हैं. हालांकि अभी तक चुनाव कार्यक्रम की घोषणा नहीं हुई है, लेकिन चुनाव अगले साल की शुरुआत में होने की उम्मीद है.
दलित वोट पर प्रभाव रखने वाली बसपा ने साफ किया है कि वह 2027 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में अकेले ही मैदान में उतरेगी.

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क्या खेल बिगाड़ पाएंगी मायावती?
पिछली बार की तरह ही इस बार भी मायावती ने अकेले ही चुनाव लड़ने का फैसला लिया है. 2022 में बसपा ने सभी सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारे थे.
2022 के चुनाव में बसपा ने सिर्फ एक सीट जीती थी लेकिन उसका वोट प्रतिशत लगभग 13% था.
बसपा का अकेले उतरना अखिलेश यादव की समाजवादी पार्टी को सबसे ज्यादा नुकसान पहुंचाता है, जबकि इससे भाजपा को फायदा होता है.
पिछले चुनाव में बसपा ने 122 सीटों पर मुस्लिम और यादव उम्मीदवार उतारे थे. इनमें से 68 सीटें एनडीए और 54 सीटें सपा गठबंधन को मिली थीं. 16 सीटें तो ऐसी थीं जहां बसपा और सपा उम्मीदवार एक ही जाति के थे. इन 16 में से सपा को सिर्फ 2 पर ही जीत मिली, जबकि भाजपा के खाते में 14 सीटें आईं.
2022 में बसपा ने 91 सीटों पर मुस्लिम उम्मीदवार उतारे थे. इनमें से 44 सीटों पर सपा गठबंधन और 47 पर भाजपा ने जीत दर्ज की. ये वे सीटें थीं जहां बसपा वोटकटवा साबित हुई. अगर बसपा उम्मीदवार को मिलने वाले वोट सपा को मिल जाते तो उसके उम्मीदवार की जीत हो सकती थी.

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कहां मजबूत हैं मायावती?
मायावती की बसपा भले ही सीटें न जीत पाती हो लेकिन उसका वोट शेयर अभी भी बरकरार है.
बसपा आज भी कई इलाकों में काफी मजबूत है. आगरा को तो दलित राजनीति की राजधानी भी कहा जाता है. यहां की अलीगढ़ और हाथरस में बसपा काफी मजबूत है.
इसके अलावा सहारनपुर, मुजफ्फरनगर, मेरठन, बिजनौर और नगीना बेल्ट में भी दलित (खासकर जाटव) और मुस्लिमों की बड़ी आबादी है. यहां बसपा अक्सर त्रिकोणीय मुकाबला बना देती है.
बुंदेलखंड में भी दलितों की अनुमानित आबादी 22 से 25% है. 2007 और 2012 में बसपा ने यहां अच्छी-खासी सीटें जीती थीं. 2022 में भी पार्टी को ज्यादातर सीटों पर 15 से 25% वोट मिले थे.
इसके अलावा, अंबेडकर नगर और आजमगढ़ मंडल भी बसपा का गढ़ माना जाता है. कांशीराम और मायावती की कर्मभूमि भी यही है.
यूपी के बलिया की रसड़ा विधानसभा सीट बसपा का एक ऐसा अभेद्य किला है जो 2022 की मोदी-योगी की लहर में भी बरकरार रहा था. इस सीट से उमाशंकर सिंह ने जीत हासिल की थी. अगस्त 2026 में उमाशंकर सिंह का निधन हो गया था.





