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साहिर लुधियानवी का लिखा 65 साल पुराना गाना, संतुष्ट नहीं थीं आशा भोसले, मोहम्मद रफी के साथ आज कहलाता है सदाबहार |  Sahir Ludhianvi penned 65 year old song Asha Bhosle was not satisfied but today considered evergreen classic with Mohammed Rafi


नई दिल्ली:

हिंदी फिल्मों के एक प्रसिद्ध गीतकार, कवि और महान उर्दू शायर साहिर लुधियानवी की 46वीं पुण्यतिथि 25 अक्टूबर को मनाई जाएगी. इस मौके पर आइए हम आपको उनके निजी जीवन से लेकर पेशेवर सफर के बारे में बताते हैं, जिसमें उन्होंने कई मशहूर गाने लिखे. इसमें मैं जिंदगी का साथ निभाता चला गया, कभी कभी मेरे दिल में, ये दुनिया अगर मिल भी जाए तो क्या है, जो वादा किया वो निभाना पड़ेगा जैसे गाने शामिल हैं. लेकिन इनमें जो सबसे पॉपुलर है वह 65 साल पुराना गाना है, जिसे आशा भोसले और मोहम्मद रफी ने अपनी आवाज में एवरग्रीन बनाया. लेकिन इसकी खास बात यह है कि इसे लेकर आशा भोसले संतुष्ट नहीं थीं. 

साहिर लुधियनवी का 65 साल पुराना गाना

हम जिस 65 साल पुराने गाने के बारे में बात कर रहे हैं उसके बोल हैं…

अभी न जाओ छोड़ कर के दिल अभी भरा नहीं
अभी अभी तो आई हो अभी अभी तो
अभी अभी तो आई हो बहार बनके छाई हो
हवा ज़रा महक तो ले नज़र ज़रा बहक तो ले
ये शाम ढल तो ले जरा
ये शाम ढल तो ले जरा
ये दिल सम्भल तो ले जरा
मैं थोड़ी देर जी तो लूं नशे के घूंट पी तो लूं
नशे के घूंट पी तो लूं
अभी तो कुछ कहां अभी तो कुछ सुना नहीं
अभी न जाओ छोड़कर के दिल अभी भरा नहीं

यह फिल्म 1961 में आई हम दोनो का है, जिसे देव आनंद और नंदा और साधना पर फिल्माया गया है. वहीं आशा भोसले और मोहम्मद रफी ने गाया और अमर गया. लेकिन IMdb के मुताबिक, आशा भोसले पर्सनली “अभी ना जाओ छोड़ कर” गाने को प्रेजेंट करने के तरीके से संतुष्ट नहीं थीं. हालांकि आज यह एवरग्रीन गानों की लिस्ट में शामिल है और फैंस इसे आज भी सुनते हुए नजर आते हैं. 

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साहिर लुधियानवी का प्यार 

साहिर लुधियानवी का जन्म 8 मार्च 1921 को भारत के पंजाब के लुधियाना में हुआ था. उनका असली नाम अब्दुल हयी था. साहिर एक समृद्ध परिवार से आते थे, लेकिन माता-पिता के अलग होने के बाद उन्हें कई प्रकार की चुनौती और आर्थिक तंगी का सामना करना पड़ा. साहिर ने अपनी शुरुआती शिक्षा लुधियाना से पूरी की. इसके बाद वह एक सरकारी विश्वविद्यालय से ग्रेजुएशन करने लगे. साहिर को शुरू के दिनों से ही लिखने में काफी रुचि थी. वह कॉलेज में अपनी शायरी के लिए काफी मशहूर थे. इस दौरान उनको यूनिवर्सिटी की एक लड़की अमृता से प्यार हो गया, जो इनकी सबसे बड़ी प्रशंसक थी, लेकिन गरीबी और मुस्लिम होने के कारण अमृता के परिवारवालों ने इस रिश्ते से साफ तौर पर इनकार कर दिया और उनके पिता के कहने पर उन्हें कॉलेज से भी निकाल दिया गया. 

लाहौर से मुंबई तक का सफर

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कॉलेज से निकाले जाने के बाद साहिर को जीविका के लिए कई प्रकार की छोटी-मोटी नौकरियां करने पड़ी. इसके बाद, 1943 में वे पाकिस्तान के लाहौर चले गए, जहां उन्होंने अपनी पहली संग्रह कविता ‘तल्खियां’ छपवाई. इसके बाद, 1949 में वह मुंबई आ गए, जहां उन्होंने फिल्म ‘आजादी की राह पर’ में अपनी पहली गीत लिखी, लेकिन उन्हें असल प्रसिद्धि फिल्म ‘नौजवान’ के लिए लिखी गई गीत से मिली. इसके बाद साहिर ने ‘प्यासा’, ‘बाजी’, ‘जाल’, ‘हमराज’, ‘त्रिशूल’, ‘इंसाफ’ का तराजू ‘कभी कभी’, ‘ताजमहल’, ‘नौजवान’, ‘प्यार की प्यास’ जैसी फिल्मों के लिए गीत लिखे. साहिर हिंदी फिल्म जगत के पहले ऐसे गीतकार थे, जिन्होंने गानों की बिक्री पर गीतकारों को रॉयल्टी दिलाने के लिए ऐतिहासिक लड़ाई लड़ी और उसमें जीत भी हासिल की. 

गीतों में आम आदमी का दर्द, सामाजिक असमानता और गहरे रोमांस का भाव

फिल्मों के लिए बेहतरीन गाने लिखने के लिए उन्हें सर्वश्रेष्ठ गीतकार का फिल्मफेयर पुरस्कार मिला. इसके अलावा, उन्हें कला के क्षेत्र में अमूल्य योगदान के लिए पद्म श्री से भी सम्मानित किया गया. साहिर लुधियानवी की रचनाओं की एक खास बात यह थी कि उनकी कविताओं और गीतों में आम आदमी का दर्द, सामाजिक असमानता और गहरे रोमांस का भाव झलकता था. साहिर लुधियानवी की मृत्यु 59 वर्ष की आयु में 25 अक्टूबर 1980 को दिल का दौरा पड़ने से हुई थी, लेकिन वह अपनी रचानाओं के लिए सदा याद किए जाएंगे. 

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