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क्या है तुर्किए-इंडोनेशिया-कतर के साथ पाकिस्तान का बद्र समझौता, भारत के लिए कितना चिंताजनक? | what is badr deal how much pakistan qatar indonesia turkey alliance target india



पाकिस्तान, तुर्किए, कतर और इंडोनेशिया ने एक दिन पहले बद्र डील की है. इस समझौते के तहत चारों देश मिलकर हथियारों का संयुक्त उत्पादन करेंगे. साथ ही नये हथियार बनाने के लिए रिसर्च भी करेंगे. इसमें संयुक्त सैन्य अभ्यास की भी बात की गई है, मगर एक-दूसरे के लिए युद्ध लड़ने की बात नहीं है.

मगर फिर भी ये भारत के लिए चिंता वाली बात है. तुर्किए रक्षा उद्योग में पहले से एक प्रमुख खिलाड़ी है. इसकी कई कंपनियां हर साल अरबों डॉलर के सैन्य हथियारों का निर्यात करती हैं, जिनमें ड्रोन, एयर डिफेंस सिस्टम और बख्तरबंद वाहन शामिल हैं. कतर के पास भर-भरकर पैसा है. वहीं पाकिस्तान के पास हथियारों की अच्छी-खासी जानकारी है. साथ ही लेबर के लिए मानव संसाधन भी उसके पास काफी है हां, इंडोनेशिया जरूर इसमें सरप्राइज पैकेज है कि वो क्यों इस डील में शामिल हुआ. 

दोहा में, तुर्किए के रक्षा मंत्री यासर गुलेर और तुर्किए रक्षा उद्योग के प्रमुख हालुक गोरगुन ने इस समझौता ज्ञापन (MoU) पर हस्ताक्षर किए. इस दौरान कतर के उप प्रधानमंत्री सऊद बिन अब्दुल रहमान अल थानी, पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ख्वाजा मुहम्मद आसिफ और इंडोनेशिया के उप रक्षा मंत्री यूसुफ जौहरी भी मौजूद थे. 

तुर्किए के रक्षा मंत्रालय ने एक बयान में कहा कि इस समझौते को “बद्र समझौता” (Badr Deal) के नाम से जाना जाएगा. यह नाम 624 ईस्वी में हुई ‘बद्र की लड़ाई’ से प्रेरित है, जब पैगंबर मुहम्मद और उनके अनुयायियों ने अरब प्रायद्वीप में इस्लाम की शुरुआती लड़ाइयों में से एक में अपने विरोधियों को हराया था. बयान में कहा गया है, “बद्र का अर्थ है ‘पूर्णिमा का चांद’. इस समझौते के माध्यम से चारों देश एक-दूसरे के पूरक बनेंगे, जिसका सैन्य और आर्थिक दोनों ही दृष्टियों से बहुत महत्व है. सैन्य उत्पादन के क्षेत्र में प्रत्येक देश की क्षमताओं का लाभ उठाकर सहयोग और एकीकरण हासिल किया जाएगा, रक्षा उद्योग की क्षमताएं विकसित की जाएंगी, और इस तरह सहयोगी तथा मित्र देशों की जरूरतों को पूरा किया जा सकेगा.”

रणनीतिक बोर्ड बनाकर करेंगे काम 

इस मामले की जानकारी रखने वाले सूत्रों ने ‘मिडिल ईस्ट आई’ को बताया कि समझौते पर हस्ताक्षर करने वाले देश सबसे पहले अपनी राष्ट्रीय सुरक्षा रूपरेखा के भीतर अपनी-अपनी जरूरतों की पहचान करेंगे. इसके बाद, प्रत्येक देश की तकनीकी टीमों से मिलकर बना एक “कार्यकारी बोर्ड” संयुक्त उत्पादन के लिए योजनाएं तैयार करेगा.सूत्रों ने आगे बताया कि इन योजनाओं को एक “रणनीतिक बोर्ड” के समक्ष पेश किया जाएगा, जिसमें मंत्री, उप-मंत्री और रक्षा उद्योग के अधिकारी शामिल होंगे. यह बोर्ड बजट और उत्पादन स्थलों के बारे में अंतिम निर्णय लेगा, जिससे संयुक्त उत्पादन लाइनों का रास्ता साफ होगा.

सूत्रों के अनुसार, कतर ने इस पहल के लिए फंड और तकनीक देने का वादा किया है. ईरान के साथ तनाव के बाद कतर को इसकी सख्त जरूरत महसूस हुई, क्योंकि उस स्थिति ने खाड़ी देशों की वायु रक्षा प्रणालियों (एयर डिफेंस सिस्टम) पर भारी दबाव डाल दिया था. तुर्किए में संयुक्त उत्पादन इकाइयां स्थापित किए जाने की उम्मीद है, क्योंकि इस क्षेत्र में तुर्किए के पास सबसे बड़ा रक्षा उद्योग बुनियादी ढांचा मौजूद है. नाम न छापने की शर्त पर, कतर के सूत्रों ने MEE को बताया कि यह समझौता कतर और ईरान के बीच तनाव, और होर्मुज जलडमरूमध्य (स्ट्रेट ऑफ होर्मुज) में पैदा हुए संकट से मिले अनुभवों के आधार पर तैयार किया गया है. उन्होंने कहा कि इस साझेदारी से अंकारा (तुर्किए) के साथ संबंध और मजबूत होंगे, साथ ही दोहा (कतर) की किफायती वायु रक्षा प्रणालियों की जरूरत भी पूरी होगी.

इस पहल का मकसद चारों देशों के बीच रक्षा उद्योग के संबंधों को मजबूत करना, सुरक्षा और स्थिरता को बढ़ावा देना, और मित्र देशों की जरूरतों को पूरा करने के लिए उत्पादन क्षमता का निर्माण करना है. मई में, तुर्किए के रक्षा उद्योग से जुड़े एक सूत्र ने MEE को बताया कि खाड़ी देश भविष्य में तुर्किए की प्रणालियों में दिलचस्पी ले रहे हैं. इसकी वजह यह है कि अमेरिका जैसे अन्य आपूर्तिकर्ताओं के पास ‘पैट्रियट’ और ‘थाड’ (THAAD) प्रणालियों और उनके गोला-बारूद की डिलीवरी के लिए कई सालों का बैकलॉग है. उस सूत्र ने कहा, “वे तुर्किए की प्रणालियों को लगभग उसी समय-सीमा में खरीद सकते हैं. अगर हालात अनुकूल रहे, तो इसमें स्थानीय स्तर पर उत्पादन (लोकलाइजेशन) और संयुक्त विकास का विकल्प भी मिल सकता है. और वे अब यह बेहतर ढंग से समझने लगे हैं कि यह एक ज्यादा अच्छा प्रस्ताव है.”

‘मक्का समझौते’ से किस तरह अलग है?

‘मक्का समझौता’ मुख्य रूप से सामूहिक रक्षा पर केंद्रित है, जिसके तहत किसी एक सदस्य देश पर होने वाले हमले को सभी सदस्य देशों पर हमला माना जाता है. वहीं, ‘बद्र समझौता’ अपने सदस्य देशों की सैन्य और औद्योगिक क्षमताओं को विकसित करने पर जोर देता है. विशेषज्ञों का मानना ​​है कि ये दोनों समझौते एक-दूसरे के पूरक हो सकते हैं. जहां ‘मक्का समझौता’ संयुक्त सैन्य सहयोग पर केंद्रित है, वहीं ‘बद्र समझौता’ औद्योगिक और तकनीकी क्षमताओं के जरिए इसमें मदद कर सकता है. रक्षा विश्लेषक अर्दा मेवलुतोग्लू ने अल जजीरा को बताया, “हम शायद एक एकल औपचारिक गठबंधन के बजाय, खाड़ी से लेकर दक्षिण-पूर्व एशिया तक फैले रक्षा और सुरक्षा व्यवस्थाओं के एक आपस में जुड़े नेटवर्क को उभरते हुए देख रहे हैं.”  

अमेरिका इस समझौते की बड़ी वजह

इस समझौते पर हस्ताक्षर करने का समय काफी महत्वपूर्ण है. मध्य पूर्व में उथल-पुथल अपने चरम पर है – पहले अमेरिका-ईरान के बीच तनाव और फिर सऊदी अरब पर हूती हमलों के कारण. व्हाइट हाउस में डोनाल्ड ट्रंप के अनिश्चित रवैये को देखते हुए, खाड़ी देश अब अपने विकल्पों का विस्तार करने की कोशिश कर रहे हैं. इसके अलावा, अमेरिका में हथियारों की कमी की खबरों ने इस स्थिति को और भी जरूरी बना दिया है.

हालांकि अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने फिर से भरोसा दिलाया है कि अमेरिका, सऊदी अरब और खाड़ी क्षेत्र के अन्य साझेदारों के प्रति अपनी रक्षा प्रतिबद्धताओं को पूरा करेगा, लेकिन इससे इन देशों को ज्यादा तसल्ली नहीं मिली है. इसके अलावा, तुर्किए में अमेरिकी दूत टॉम बैराक की हालिया टिप्पणियों ने चिंताओं को और बढ़ा दिया है. उन्होंने मध्य पूर्व के देशों से अपनी सुरक्षा की “बड़ी जिम्मेदारी” खुद उठाने का आग्रह किया था. 20 अक्टूबर को दोहा में बोलते हुए, बैराक ने संकेत दिया कि अमेरिका अब क्षेत्रीय सुरक्षा की गारंटी देने वाली अपनी भूमिका से पीछे हटना चाहता है.

भारत के लिए कितना चिंता का विषय?

इस समझौते पर चुपचाप किए गए हस्ताक्षर ने एक अहम सवाल खड़ा कर दिया है. क्या इसका असर भारत पर पड़ेगा, खासकर तब जब इंडोनेशिया के साथ भारत के पहले से ही रक्षा समझौते मौजूद हैं? इस साल जुलाई में, भारत ने इंडोनेशिया के साथ 630 मिलियन डॉलर (5,953 करोड़ रुपये) के दो बड़े समझौते किए थे. इसके तहत ‘ऑपरेशन सिंदूर’ का मुख्य हिस्सा रहीं ‘ब्रह्मोस’ सुपरसोनिक क्रूज़ मिसाइलें और ‘अस्त्र’ एयर-टू-एयर मिसाइलें इंडोनेशिया को दी जानी हैं. यह समझौता प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की जकार्ता यात्रा के दौरान तय हुआ था.पाकिस्तान के साथ ‘बद्र MoU’ (समझौता ज्ञापन) में शामिल होने का इंडोनेशिया का कदम महत्वपूर्ण है.

सेंटर फॉर एयरोस्पेस पावर एंड स्ट्रेटेजिक स्टडीज के सीनियर फेलो, ग्रुप कैप्टन अजय अहलावत (रिटायर्ड) ने ट्वीट किया, “एक समझौते का मतलब सैन्य गठबंधन नहीं होता. इसके शब्दों से पता चलता है कि ‘बद्र MoU’ केवल काम के बंटवारे से जुड़ा एक समझौता है. भारत के भी कतर और इंडोनेशिया के साथ अच्छे संबंध हैं.” 

ब्रह्मोस एयरोस्पेस के पूर्व CEO और MD, सुधीर कुमार मिश्रा ने TOI को बताया कि इंडोनेशिया के साथ हुए समझौते में डेटा सुरक्षा और बौद्धिक संपदा से जुड़ी सख्त शर्तें शामिल हैं. मिश्रा ने आगे जोर देकर कहा, “इस बात का कोई सवाल ही नहीं उठता कि ब्रह्मोस और अस्त्र की तकनीक हमारे प्रतिद्वंद्वियों के हाथ लग जाए.” हालांकि, विशेषज्ञ इस बात पर पूरी तरह सहमत हैं कि ‘बद्र MoU’ की मदद से पाकिस्तान को अपने हथियारों और सैन्य तकनीक के स्रोतों में विविधता लाने का मौका मिलेगा. 

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