
एनडीटीवी वर्ल्ड समिट 2026 नई दिल्ली में हो रहा है. इसमें दुनिया भर के दिग्गज हिस्सा ले रहे हैं. ‘द वेस्ट, रीवायर्ड: द न्यू ट्रांसअटलांटिक ऑर्डर’ सेशन में तेजी से बदलती दुनिया में यूरोप के रुख को समझने की कोशिश की गई. एक ऐसे समय में जब अमेरिका और यूरोप के रिश्ते नये सिरे से बन और बिगड़ रहे हैं तो ये जानना बहुत महत्वपूर्ण हो जाता है कि यूरोप अभी कहां खड़ा है और भारत की भूमिका पर क्या सोच रहा है?
इस सेशन में चर्चा के लिए भारत में जर्मनी के राजदूत डॉ. जैस्पर वीक, भारत में ऑस्ट्रेलिया के उच्चायुक्त फिलिप ग्रीन, भारत में इटली के राजदूत एंटोनियो बार्तोली और भारत में यूरोपीय संघ के राजदूत जिन एरिक पकेट शामिल हुए.
रूस को लेकर यूरोप की सोच
भारत में जर्मनी के राजदूत डॉ. जैस्पर वीक ने कहा कि यूक्रेन को पूरे यूरोप का सपोर्ट है. उसे जर्मनी और फ्रांस का सिर्फ सहयोग नहीं मानना चाहिए. यूक्रेन का सपोर्ट यूरोप सिद्धांत के मुद्दे पर कर रहा है. तो यह एक सामूहिक प्रयास है। हमें इस पर ध्यान नहीं देना चाहिए कि दूसरे क्या कर रहे हैं, बल्कि यह देखना चाहिए कि हम क्या कर सकते हैं. हमारे लिए, यह एक ऐसे देश की मदद करने का सवाल है जिस पर हमला हुआ है. यह एक सिद्धांत का मामला है—क्या बड़ी ताकतें अपने छोटे पड़ोसी देशों के इलाकों पर कब्जा कर सकती हैं? यह पहली बात है। और दूसरी बात यह है कि हम अपना बचाव भी कर रहे हैं, क्योंकि हम सभी जानते हैं कि रूस के इरादे यूक्रेन से कहीं आगे तक हैं. तो अगर हम उन्हें… उन्हें यूक्रेन के साथ जाने दें, तो अगला लक्ष्य और पश्चिम की ओर होगा. इसलिए, यूक्रेन का समर्थन करके हम असल में अपनी खुद की सुरक्षा और यूरोप में अपनी संप्रभुता की रक्षा कर रहे हैं; यह निश्चित रूप से एक सामूहिक प्रयास है.

भारत-जर्मनी की क्या है रक्षा तैयारी
भारत और जर्मनी के रक्षा संबंधों पर जैस्पर वीक ने कहा, “दुनिया के हर देश की अपनी सुरक्षा व्यवस्था होती है. हर देश का अपना एक तरीका होता है जिससे वे अपनी आबादी के लिए सुरक्षा, स्थिरता और शांति सुनिश्चित करते हैं. इसलिए, दूसरे देशों की सुरक्षा व्यवस्था पर टिप्पणी करना हमारा काम नहीं है. हमारा अपना एक अलग नज़रिया है; हम एक गठबंधन के हिस्से के रूप में काम करने में विश्वास रखते हैं. हम सामूहिक रूप से अपनी सुरक्षा की व्यवस्था करते हैं, और NATO (नाटो) के भीतर यह तरीका बहुत कारगर रहा है. जैसा कि आप जानते होंगे, NATO में अब बोझ का बंटवारा कुछ इस तरह हो रहा है कि यूरोप पर जिम्मेदारी थोड़ी बढ़ गई है. यह उचित भी है, क्योंकि हम इसका खर्च उठा सकते हैं, इसलिए हम अपने रक्षा क्षेत्र में काफी निवेश करते हैं. साथ ही, हम दुनिया भर में अपने भरोसेमंद साझेदारों के साथ संबंधों को और गहरा करने के लिए प्रतिबद्ध हैं, और भारत इसका एक बेहतरीन उदाहरण है. दशकों से हमारी एक बहुत ही भरोसेमंद साझेदारी रही है, और हमारे द्विपक्षीय संबंधों में, जिसमें रक्षा क्षेत्र भी शामिल है, अपार संभावनाएं हैं. हमारी एक पुरानी साझेदारी रही है—उदाहरण के लिए, 4 पनडुब्बियां, जिनमें से 2 को 1980 के दशक में भारत में ही बनाया गया था. अब हम ‘डिफेंस इंडस्ट्रियल रोडमैप’ (रक्षा औद्योगिक रोडमैप) के जरिए इस साझेदारी को और आगे बढ़ाने जा रहे हैं. इसमें रक्षा उद्योग के कई अन्य क्षेत्र भी शामिल हैं, जैसे सेंसर तकनीक, मानवरहित सिस्टम (unmanned systems), सिग्नलिंग और संचार—यानी इसमें कई आयाम हैं. आज भारत में एयरबस परिवहन विमान और मल्टी-रोल हेलीकॉप्टर बना रही है. हम वास्तव में इस साझेदारी में निवेश करना चाहते हैं. यह दोनों पक्षों के लिए फायदेमंद स्थिति है; हम अपनी तकनीक साझा करने में खुश हैं, और इसके बदले हमें एक नया बाज़ार और एक नई सप्लाई चेन मिलती है. भारतीय रक्षा उद्योग ने भी बहुत शानदार प्रगति की है, इसलिए यह एक बेहतरीन तालमेल है और हम इस रास्ते पर आगे बढ़ना जारी रखने के लिए बहुत उत्साहित हैं.”
क्वाड में नई जान आई
भारत में ऑस्ट्रेलिया के उच्चायुक्त फिलिप ग्रीन से जब चीन से जुड़ी चिंताओं पर पूछा गया तो उन्होंने कहा, “चीन के साथ हमारा एक ऐसा दौर आया था जब आर्थिक गतिरोध (इकोनॉमिक डेडलॉक) की स्थिति बन गई थी. एक ही हफ्ते में ऑस्ट्रेलिया का 20 अरब डॉलर का व्यापार ठप हो गया था. हम चीन को जो सामान बेचते थे, उनमें से बहुत कुछ अब उपलब्ध नहीं था. यह हमारे लिए मुश्किल तो था, लेकिन नामुमकिन नहीं. उस व्यापार का लगभग 96% हिस्सा दूसरे बाज़ारों में चला गया. और एक तरह से, इसके चलते हम और ज़्यादा मज़बूत और दृढ़ हो गए. चीन को लेकर हमारी नीति क्या है? ऐसी कई चीजें हैं जिन पर हम सहयोग कर सकते हैं. ऑस्ट्रेलिया और चीन के बीच सहयोग के लिए व्यापार एक बहुत अच्छा ज़रिया है. इसके अलावा, दुनिया में और हमारे क्षेत्र में ऐसे कई मुद्दे हैं – जैसे कि जलवायु परिवर्तन – जहां हमें चीन के सहयोग की ज़रूरत है. लेकिन, अपने संबंधों को स्थिर करने की इस प्रक्रिया के दौरान, हमने उन मुद्दों पर अपना रुख़ बिल्कुल साफ़ रखा है, जिन पर चीन के साथ हमारे मतभेद हैं. हमें चीन की सैन्य ताक़त बढ़ाने की कोशिशों पर चिंता है; दूसरे विश्व युद्ध के बाद से दुनिया के किसी भी देश के मुक़ाबले चीन सबसे तेजी से अपनी सेना को मज़बूत कर रहा है. हमें चीन की नौसेना की गतिविधियों पर भी चिंता है, जिसमें ऑस्ट्रेलिया और न्यूज़ीलैंड के बीच ‘तस्मान सागर’ में बिना किसी उचित चेतावनी के उनके द्वारा की जाने वाली ‘लाइव फ़ायरिंग’ (असली हथियारों से अभ्यास) शामिल है. और जब हम देखते हैं कि चीन ‘इंटरकॉन्टिनेंटल बैलिस्टिक मिसाइलों’ (अंतरमहाद्वीपीय बैलिस्टिक मिसाइलों) का परीक्षण करता है, जो दक्षिण-पश्चिम प्रशांत महासागर के छोटे द्वीपीय देशों के पास जाकर गिरती हैं, तो हमारे मन में कई सवाल उठते हैं जिनका जवाब मिलना ज़रूरी है. संक्षेप में कहें तो, चीन के साथ हम जहां संभव हो सहयोग करते हैं, जहां ज़रूरी हो वहां असहमति जताते हैं, और हमेशा अपने राष्ट्रीय हितों को ध्यान में रखकर काम करते हैं.”
युद्धों पर क्या सोच रहा यूरोप
भारत में इटली के राजदूत एंटोनियो बार्तोली ने कहा, ” तेहरान के साथ हमारा हमेशा से सीधा संपर्क रहा है. क्योंकि हमारा मानना है कि हमें हर सरकार के साथ बातचीत बनाए रखनी चाहिए. इसमें वे सरकारें भी शामिल हैं जिनकी हमने आलोचना की है—चाहे वह मानवाधिकारों के मामले में हो, प्रदर्शनकारियों के साथ उनके बर्ताव को लेकर हो, या महिलाओं के प्रति उनके रवैये को लेकर. लेकिन, जो भी हो, यह एक तरह से…एक प्राचीन सभ्यता के उत्तराधिकारियों के साथ, हम यह नहीं कह सकते कि हम किसी सभ्यता को खारिज कर रहे हैं; हम उनसे बातचीत जारी रखते हैं. यूक्रेन के मामले की तरह ही, ‘नेविगेशन की स्वतंत्रता’ (आजादी से आवाजाही) अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था के आधारों में से एक है. हमारा मानना है कि आवाजाही के लिए कोई शुल्क (टैरिफ) नहीं लगाया जाना चाहिए. यह विरोधाभासी होगा कि हम एक तरफ तो स्वतंत्रता की बात करें और दूसरी तरफ खुद ही शुल्क थोपने की कोशिश करें. हमने ‘एस्पाइड्स’ नामक एक यूरोपीय मिशन का नेतृत्व किया है, जिसका मुख्य उद्देश्य यही है—नेविगेशन की स्वतंत्रता सुनिश्चित करना. यह विशेष रूप से दुनिया के एक महत्वपूर्ण ‘चोक पॉइंट’ (संकरे समुद्री रास्ते), ‘बाब अल-मंदेब’ के लिए है, जो हुती विद्रोहियों और सऊदी अरब के बीच चल रहे संघर्ष से बुरी तरह प्रभावित है. जहां तक IMEC (इंडिया-मिडिल ईस्ट-यूरोप इकोनॉमिक कॉरिडोर) की बात है, तो मध्य पूर्व में चल रही उथल-पुथल इसके रास्ते में एक बाधा की तरह लग सकती है. लेकिन इसके विपरीत, अगर आप एक अलग दृष्टिकोण रखें, तो यह इस तरह के विजन को आगे बढ़ाने का एक और कारण बन सकता है. क्योंकि साझा समृद्धि ही शांति और स्थिरता ला सकती है. इसलिए हमें इस विजन को आगे बढ़ाना होगा, जिसका अर्थ है—इजरायल और अरब देशों के बीच बेहतर संबंध. “

भारत को कैसे देख रहा इटली
वहीं भारत और इटली के संबंधों पर उन्होंने कहा, “भारत और इटली के बीच बहुत ही परिणाम-उन्मुख साझेदारी है. नेताओं के बीच आपसी तालमेल (केमिस्ट्री) महत्वपूर्ण है और इससे राजदूतों को भी मदद मिलती है, लेकिन यह पर्याप्त नहीं है. सकारात्मक बात यह है कि हमारे हित आपस में मेल खाते हैं. उदाहरण के लिए, हम कनेक्टिविटी (संपर्क) की बात कर रहे हैं – यह एक वास्तविकता है. हम दोनों प्रायद्वीपीय देश हैं, इसलिए हम अपने-अपने समुद्रों को आपस में जोड़ने में रुचि रखते हैं. इसके अलावा, आप अपना मैन्युफैक्चरिंग बेस विकसित और मजबूत करना चाहते हैं, और हम यूरोप में दूसरे सबसे बड़े औद्योगिक पावरहाउस हैं. हमारे पास छोटे और मध्यम उद्यमों (SMEs) का एक मजबूत ढांचा है, जो भारत के लिए एक उदाहरण बन सकता है—खासकर तब, जब भारत एक अधिक समावेशी विकास की ओर बढ़ रहा है. यह साझेदारी परिणाम-उन्मुख है क्योंकि हमारे पास एक रोडमैप है जो सभी क्षेत्रों की पहचान करता है, और हमारे पास एक निगरानी तंत्र भी है. उदाहरण के लिए, व्यापार के क्षेत्र में हमारा लक्ष्य 2029 तक 20 बिलियन तक पहुंचना है. निवेश के मामले में भी चीजें आगे बढ़ रही हैं. आज सुबह ही, मैंने टायरों के क्षेत्र में एक प्रसिद्ध ब्रांड ‘पिरेली’ और ‘BKT’ के बीच एक गठबंधन की शुरुआत देखी; इसी तरह, दोनों दिशाओं में काफी निवेश हो रहा है. इसके अलावा, रक्षा, अंतरिक्ष, ऊर्जा सुरक्षा और मोबिलिटी (आवागमन) जैसे क्षेत्रों में भी हमारे हित समान हैं—न केवल इटली के साथ, बल्कि पूरे यूरोप के साथ. यह दोनों पक्षों के लिए फायदेमंद स्थिति है. लोगों के बीच आपसी जुड़ाव को देखते हुए ही, दोनों प्रधानमंत्रियों ने अगले साल को दोनों देशों में ‘संस्कृति और पर्यटन वर्ष’ के रूप में मनाने का फैसला किया है. कुल मिलाकर, यह एक बहुत ही परिणाम-उन्मुख साझेदारी है और हम इसमें अभूतपूर्व प्रगति कर रहे हैं.”
यूरोपीय संघ-भारत एफटीए इस साल
भारत में यूरोपीय संघ के राजदूत जॉन-एरिक पकेट ने इस सेशन के दौरान बड़ी घोषणा की. उन्होंने कहा, “सब कुछ सही दिशा में आगे बढ़ रहा है. बातचीत तो जनवरी में ही पूरी हो गई थी, इसलिए अब कोई बातचीत नहीं चल रही है. वह पूरी हो चुकी है. अब बस कानूनी रूप से औपचारिक दस्तावेज तैयार करने की प्रक्रिया चल रही है, जिसमें थोड़ा समय लग रहा है; मुझे लगता है कि साल के अंत तक दोनों पक्ष तैयार हो जाएंगे. यूरोपीय देश और भारत मिलकर अपनी दोनों अर्थव्यवस्थाओं के बीच काम कर रहे हैं. जैसे ही यह मुक्त व्यापार समझौता लागू होगा, व्यापार के रास्ते खुल जाएंगे और यूरोप को निर्यात करने वाले भारतीय निर्यातकों के लिए टैरिफ में भारी कमी आएगी.”
एक और समझौता भी होने वाला है
पकेट ने आगे कहा, “और भारत में रहने वाले यूरोपियनों के लिए भी, लेकिन यह तो बस कहानी का एक हिस्सा है. मुझे लगता है कि असल चर्चा इस बारे में है कि क्या भारत और यूरोप, एक-दूसरे के भरोसेमंद और समान विचारधारा वाले साझेदार के रूप में, अपनी सप्लाई चेन और आर्थिक विकास (जिसमें रोजगार भी शामिल है) पर मिलकर काम कर सकते हैं. इसके लिए सिर्फ व्यापार के लेन-देन से आगे बढ़कर निवेश पर भी ध्यान देना होगा. यही वजह है कि ‘इन्वेस्टमेंट प्रोटेक्शन एग्रीमेंट’ (निवेश संरक्षण समझौता) भी उतना ही महत्वपूर्ण है, जितना कि FTA (मुक्त व्यापार समझौता). मुझे पूरी उम्मीद है कि साल के अंत तक हम FTA पर हस्ताक्षर कर लेंगे और ‘इन्वेस्टमेंट प्रोटेक्शन एग्रीमेंट’ से जुड़ी बातचीत भी पूरी कर लेंगे.”
फ्रांस में प्रदर्शन पर यूरोप की सोच
फ्रांस पर ट्रंप के बयान पर उन्होंने कहा, “आज मैं इस पैनल में एक फ्रांसीसी नागरिक के तौर पर नहीं, बल्कि यूरोपीय संघ के राजदूत के रूप में बैठा हूं. वैसे, मैं आपको बता दूं कि मैं जर्मन भी हूं—यानी फ्रांसीसी और जर्मन दोनों—लेकिन खैर, मैं इस विषय पर कुछ बातें जरूर कहना चाहूंगा. सबसे पहले, मैं यह स्पष्ट करना चाहता हूं कि सभी लोकतंत्रों में शांतिपूर्ण विरोध का अधिकार सुरक्षित है, जैसा कि भारत में भी है. लेकिन शांतिपूर्ण प्रदर्शनों को हिंसा के साथ नहीं जोड़ा जाना चाहिए; हिंसा, लूटपाट और आगजनी तो बिल्कुल भी स्वीकार्य नहीं है. यूरोपीय संघ में कानून-व्यवस्था बनाए रखने की जिम्मेदारी मुख्य रूप से सदस्य देशों की होती है, न कि यूरोपीय संघ के स्तर पर. इसलिए, मुझे उम्मीद है कि आप समझेंगे कि मैं इस पर कोई टिप्पणी नहीं कर सकता. वैसे, यूरोप में, वहां की सरकारों और खुद यूरोपीय संघ के स्तर पर, युवाओं के साथ मिलकर काम करने पर काफी जोर दिया जा रहा है.”.
फ्रांस के प्रदर्शन को समझाते हुए उन्होंने कहा, “मुझे लगता है कि ‘पीढ़ियों के बीच निष्पक्षता’यूरोप भर में एक बहुत ही महत्वपूर्ण नीतिगत अवधारणा है, और हर जगह की सरकारें इसे अपनी सार्वजनिक नीतियों के केंद्र में रखती हैं. वे हमारे महाद्वीप, और विशेष रूप से हमारे युवाओं के लिए एक बेहतर भविष्य सुनिश्चित करने के लिए कड़ी मेहनत कर रही हैं. आज के समय में, जब चारों ओर गहरी चिंता का माहौल है—अभी हमने यूरोप में AI (आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस) के बारे में चर्चा की—तो इससे कई सवाल भी खड़े होते हैं, ठीक वैसे ही जैसे भारत में हो रहे हैं. जलवायु संकट भी गहरी चिंता का एक बड़ा कारण है. यूरोप और भारत, दोनों ही जगहों पर हम मानते हैं कि भविष्य के लिए शिक्षा सबसे महत्वपूर्ण है. हर सदस्य देश अपनी जिम्मेदारी के अनुसार शिक्षा में निवेश कर रहा है, और यूरोपीय देशों के बीच भी इस दिशा में सहयोग हो रहा है. यूरोप के आधे से अधिक छात्र किसी न किसी समय दूसरे सदस्य देश में जाकर पढ़ाई कर सकते हैं; यह इन चिंताओं का सामना करने के लिए एक महत्वपूर्ण यूरोपीय दृष्टिकोण प्रदान करता है. हमें युवाओं के साथ मिलकर काम करने की जरूरत है, और यूरोप में हर जगह ऐसा ही हो रहा है.”
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