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El Nino का नाम तो खूब सुना होगा, लेकिन शरीर पर इसका क्या असर पड़ता है? | El Nino Health Effects: Rising Temperatures, Mosquito Diseases and Expert Safety Tips



तेलंगाना में पानी की स्थिति ने El Nino को एक बार फिर चर्चा में ला दिया है. मुख्यमंत्री रेवंत रेड्डी ने मौजूदा El Nino को दशकों में देखी गई सबसे गंभीर स्थितियों में से एक बताते हुए किसानों से खासतौर पर ज्यादा पानी वाली धान की एक फसल टालने की अपील की है. राज्य सरकार के मुताबिक जलाशयों में इस समय करीब 200 TMC पानी है, जबकि साल के इस समय सामान्य तौर पर करीब 462 TMC पानी उपलब्ध रहता है. कृष्णा बेसिन के जलाशयों में पानी की उपलब्धता एक साल पहले के मुकाबले 72 प्रतिशत कम और गोदावरी बेसिन में 42 प्रतिशत कम बताई गई है.

रिपोर्ट के मुताबिक, 14 अक्टूबर तक तेलंगाना में बारिश सामान्य से 27.82 प्रतिशत कम थी. इसके साथ बिजली की मांग भी बढ़ी है. अक्टूबर में रोजाना बिजली की मांग आमतौर पर करीब 15,000 MW रहने की बात कही गई है, जबकि यह 20,000 MW के पार पहुंच गई. मुख्यमंत्री ने पानी बचाने की जरूरत पर जोर देते हुए आने वाले महीनों में पेयजल आपूर्ति को लेकर भी चिंता जताई है.

पानी और मौसम में इस तरह का असंतुलन सिर्फ खेती की चिंता नहीं है. आम लोगों के लिए भी भीषण गर्मी, सुरक्षित पेयजल की उपलब्धता और बदलते मौसम से जुड़ी स्वास्थ्य समस्याओं को लेकर सतर्क रहना जरूरी हो जाता है. ऐसे में सवाल है कि El Nino जैसे बड़े climatic event का हमारी सेहत से आखिर क्या संबंध है?

झायनोव्हा शाल्बी अस्पताल के इंटरनल मेडिसिन एक्सपर्ट डॉ. निमित नागदा ने कहा,

“तापमान और बारिश में होने वाले बदलावों का असर मच्छरों के पनपने और डेंगू तथा मलेरिया जैसी बीमारियों के फैलने पर पड़ सकता है. भारी बारिश के कारण कई जगहों पर पानी जमा हो जाता है, जिससे मच्छरों को पनपने का मौका मिलता है. वहीं, सूखे के दौरान भी लोग घरों में पानी जमा करके रख सकते हैं. अगर पानी को बिना ढके बर्तनों या डिब्बों में रखा जाता है, तो वहां भी मच्छर पनप सकते हैं. पिछले 10-15 दिनों में 25 से 65 वर्ष की उम्र के 1-2 मरीजों में तेज सिरदर्द और शरीर में दर्द जैसी शिकायतें सामने आई हैं. ऐसे लक्षण होने पर डॉक्टर डेंगू और मलेरिया की जांच कराने की सलाह दे सकते हैं. लोगों को डॉक्टर की सलाह के अनुसार इलाज करवाना चाहिए और दवाओं तथा अन्य जरूरी निर्देशों का पालन करना चाहिए. डेंगू और मलेरिया से बचने के लिए घर के आसपास पानी जमा न होने दें. पानी की टंकियों, बर्तनों और डिब्बों को ढककर रखें. मच्छरों से बचने के लिए पूरी बाजू के कपड़े पहनें और मच्छरदानी या मच्छर भगाने वाले उत्पादों का इस्तेमाल करें. इन छोटी-छोटी सावधानियों को अपनाकर मच्छरों से होने वाली बीमारियों का खतरा कम किया जा सकता है.”

मौसम विभाग जब भी एल नीनो की चेतावनी देता है, तो ज्यादातर लोग यही सोचते हैं कि इसका असर सिर्फ खेती-बाड़ी या बारिश पर पड़ेगा. लेकिन सच यह है कि समंदर में उठने वाली यह हलचल सीधा हमारे जिस्म और रोजमर्रा की सेहत पर चोट करती है.

सीधे शब्दों में कहें तो एल नीनो का मतलब है प्रशांत महासागर की सतह का जरूरत से ज्यादा गर्म हो जाना. जब इतना विशाल समंदर तपता है, तो पूरी दुनिया का मौसम चक्र गड़बड़ा जाता है. कहीं बिन मौसम भारी बारिश से बाढ़ आ जाती है, तो कहीं महीनों तक सूखा और चिलचिलाती धूप जान आफत में डाल देती है. हमारे यहां इसका सीधा असर उमस, तेज गर्मी और मौसमी बीमारियों के रूप में देखने को मिलता है.

लू और डिहाइड्रेशन का दोहरा हमला

एल नीनो के दौर में पारा तेजी से ऊपर चढ़ता है. सूखी गर्म हवाएं और बेहिसाब उमस इंसान के शरीर से सारा पानी सोख लेती हैं. ऐसे में अगर थोड़ी सी भी लापरवाही हुई, तो डिहाइड्रेशन, चक्कर आना और हीट एग्जॉशन की नौबत आ जाती है. सबसे बड़ा खतरा हीटस्ट्रोक का होता है, जिसमें शरीर का तापमान अचानक इतना बढ़ जाता है कि दिमाग और दिल पर बन आती है.

शारदाकेयर – हेल्थसिटी में इंटरनल मेडिसिन के डायरेक्टर डॉ. चिराग टंडन बताते हैं-

“एल नीनो के चलते जब तापमान सामान्य से ज्यादा बढ़ता है, तो शरीर का कूलिंग सिस्टम फेल होने लगता है. खास तौर पर बुजुर्गों, छोटे बच्चों, फील्ड में दिनभर धूप में काम करने वाले मजदूरों और जो पहले से बीपी या शुगर के मरीज हैं, उन्हें बेहद संभलकर रहना होगा. जरा सी भी सुस्ती या सिरदर्द को नजरअंदाज न करें.”

मच्छरों की फौज और जलजनित बीमारियों की मार

मौसम के इस असंतुलन से बारिश का ढर्रा भी पूरी तरह बिगड़ जाता है. कहीं सूखा पड़ने से पानी की किल्लत होती है, तो कहीं बेतरतीब बारिश के बाद जगह-जगह पानी जमा हो जाता है.

डेंगू और मलेरिया का फैलाव: गर्म और उमस भरा वातावरण मच्छरों के पनपने के लिए बिल्कुल मुफीद होता है. ऐसे मौसम में डेंगू, चिकनगुनिया और मलेरिया फैलाने वाले मच्छर बहुत तेजी से अंडे देते हैं.

दूषित पानी से पेट की आफत: जब सूखा पड़ता है तो लोग जैसे-तैसे पानी का इंतजाम करते हैं, और बाढ़ आने पर सीवर व पीने का पानी आपस में मिल जाता है. नतीजा यह होता है कि टायफाइड, पीलिया (हेपेटाइटिस) और डायरिया के मामले अचानक अस्पतालों में बढ़ जाते हैं.

डॉ. चिराग टंडन करते हैं, “तापमान और बारिश में अचानक आने वाले ये बदलाव सीधे तौर पर मच्छरों के ब्रीडिंग साइकल को तेज कर देते हैं. इसके अलावा सूखे और बाढ़ दोनों ही सूरतों में पीने का साफ पानी मिलना मुश्किल हो जाता है, जिससे दूषित पानी से होने वाले पेट के संक्रमण तेजी से फैलते हैं.”

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फेफड़ों और दिल के मरीजों के लिए दोहरी चुनौती

अत्यधिक गर्मी और हवा में तैरते धूल-धुएं के कण मिलकर एक जहरीला मिश्रण बना देते हैं. उमस भरी गर्मी में जब हवा रुक जाती है, तो दिल को शरीर ठंडा रखने के लिए दोगुना जोर लगाना पड़ता है. इससे ब्लड प्रेशर अचानक असंतुलित हो सकता है. वहीं सांस और दमा (अस्थमा) के मरीजों के लिए ऐसी भारी हवा में सांस खींचना किसी सजा जैसा हो जाता है.

इस बिगड़े मौसम में खुद को कैसे महफूज रखें?

पानी से कभी न करें समझौता: प्यास न भी लगे, तो भी दिनभर में घूंट-घूंट करके ओआरएस, नींबू पानी, नारियल पानी या सादा पानी पीते रहें. बाहर निकलते वक्त बोतल हमेशा साथ रखें.

बासी और खुले खाने से तौबा: गर्मियों में खाना बहुत जल्दी खट्टा होकर सड़ता है. हमेशा ताजा, हल्का और पूरी तरह उबला या पका हुआ भोजन ही करें. बाहर के कटे फल और बर्फ के गोलों से दूर रहें.

कूलर और टंकियों की सफाई: घर के आसपास या छत पर टूटे बर्तनों, टायरों या कूलरों में 3 दिन से ज्यादा पानी न ठहरने दें. पूरी आस्तीन के कपड़े पहनें और मच्छरदानी या रिपेलेंट का इस्तेमाल करें.

दोपहर में निकलने से बचें: जब तक बहुत जरूरी काम न हो, दोपहर 12 से 4 बजे के बीच कड़ी धूप में निकलने से परहेज करें. मौसम विभाग की अपडेट और हीटवेव की चेतावनियों पर नजर बनाए रखें.

मौसम चाहे जितना भी करवट बदले, अगर हम अपनी आदतों में थोड़ा सा अनुशासन ले आएं, तो एल नीनो के इस असर से अपने परिवार को पूरी तरह सुरक्षित रखा जा सकता है.




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