
Odisha Temples: भारत में आस्था और चमत्कारों से जुड़े अनगिनत प्राचीन मंदिर हैं, लेकिन ओडिशा के गजपति जिले में एक ऐसा अनूठा देवी धाम है जिसके द्वार साल में केवल 11 दिनों के लिए ही श्रद्धालुओं के लिए खोले जाते हैं.
बाकी के पूरे 354 दिन इस मंदिर के कपाट पूरी तरह बंद रहते हैं. यह पावन स्थल गजपति जिले के ऐतिहासिक शहर परलाखेमुंडी में स्थित है, जिसे स्थानीय तेलुगु भाषी श्रद्धालु मां दंडमारम्मा और ओडिया भाषी भक्त दंडू मां के नाम से पूजते हैं.
कैसे बनता है साल में 11 दिन खुलने का यह दुर्लभ संयोग?
मंदिर के कपाट खुलने का नियम बहुत ही सख्त और प्राचीन परंपरा पर आधारित है:
नवरात्रि से विजयादशमी तक (10 दिन): हर साल शारदीय नवरात्रि के पहले दिन (प्रतिपदा) विशेष वैदिक अनुष्ठान और महायज्ञ के साथ मंदिर के कपाट खोले जाते हैं. यह पट विजयादशमी (दशहरा) की मध्यरात्रि तक लगातार 10 दिनों के लिए खुले रहते हैं.
दशहरे के बाद ‘दूसरा मंगलवार’ (1 दिन): दशहरे की मध्यरात्रि को कपाट बंद कर दिए जाते हैं. इसके बाद विजयादशमी बीतने पर जो दूसरा मंगलवार आता है, उस दिन एक बार फिर मंदिर के पट 24 घंटे के लिए खोले जाते हैं.
इस तरह 10 दिन नवरात्रि के और 1 दिन दशहरे के बाद के दूसरे मंगलवार का, कुल मिलाकर साल में केवल 11 दिन ही भक्तों को मां के साक्षात दर्शन का सौभाग्य मिलता है. इसके बाद कपाट अगले एक साल के लिए फिर से बंद कर दिए जाते हैं.
बाकी दिनों में क्यों बंद रहते हैं मंदिर के दरवाजे?
मान्यताओं के अनुसार मां दंडमारम्मा एक अत्यंत जागृत और उग्र स्वरूप वाली शक्तिपीठ हैं. इन 11 दिनों के दौरान मां प्रत्यक्ष रूप से अपने भक्तों की मनोकामनाएं पूरी करने और उनकी पीड़ा हरने के लिए दरबार लगाती हैं.
इसके बाद, देवी अंतर्मुखी ध्यान और घोर तपस्या में लीन हो जाती हैं. धार्मिक आस्था है कि देवी के एकांत और साधना काल में किसी भी बाहरी मानवीय हलचल का प्रवेश वर्जित होना चाहिए.
स्थानीय लोगों का यह भी दृढ़ विश्वास है कि जब मंदिर के कपाट इंसानों के लिए बंद कर दिए जाते हैं, तब अदृश्य दैवीय शक्तियां और गंधर्व स्वयं गर्भगृह में आकर मां की नित्य आराधना करते हैं. इसी मर्यादा और पावनता को बनाए रखने के लिए बाकी पूरे साल मंदिर के द्वार सील रहते हैं.
1 साल तक मिट्टी के बर्तन में ताजा रहता है नारियल
इस मंदिर से जुड़ा एक ऐसा रहस्य है जो वैज्ञानिकों और श्रद्धालुओं दोनों को हैरत में डाल देता है. 11वें दिन जब मंदिर के पट अंतिम रूप से बंद किए जा रहे होते हैं, तब मुख्य पुजारी गर्भगृह में एक मिट्टी के घट (बर्तन) में देवी को अर्पित कर एक श्रीफल (नारियल) रखते हैं.
पूरे 354 दिन बाद जब अगले साल नवरात्रि में कपाट दोबारा खोले जाते हैं, तो वह नारियल पूरी तरह सुरक्षित और ताजा निकलता है. उसमें न कोई सड़ांध होती है और न ही वह खराब होता है. कपाट खुलने के बाद इस दिव्य नारियल को महाप्रसाद के रूप में श्रद्धालुओं में वितरित किया जाता है, जिसे पाने के लिए ओडिशा के अलावा आंध्र प्रदेश और छत्तीसगढ़ से भी भारी संख्या में भक्त परलाखेमुंडी पहुंचते हैं.
कैसे पहुंचें मां दंडमारम्मा के दर्शन करने?
रेल मार्ग: परलाखेमुंडी का अपना रेलवे स्टेशन है. इसके अलावा नजदीकी प्रमुख रेलवे स्टेशन पलासा (Palasa – लगभग 40 किमी) है, जो हावड़ा-चेन्नई मुख्य रेल मार्ग से अच्छी तरह जुड़ा हुआ है.
सड़क मार्ग: परलाखेमुंडी ओडिशा के बेरहामपुर और आंध्र प्रदेश के श्रीकाकुलम दोनों से सड़क मार्ग द्वारा सीधा जुड़ा हुआ है.
हवाई मार्ग: नजदीकी हवाई अड्डा विशाखापट्टनम (लगभग 180 किमी) और भुवनेश्वर (लगभग 270 किमी) है.
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