
नई दिल्ली:
मेरठ के चर्चित सौरभ राजपूत हत्याकांड में मुस्कान रस्तोगी और साहिल शुक्ला को मौत की सजा सुनाई गई है. मुस्कान ने अपने प्रेमी साहिल के साथ मिलकर सौरभ की हत्या कर दी थी. हत्या के बाद सौरभ के शव के टुकड़े-टुकड़े कर नीले ड्रम में भर दिए थे. दोनों को 30 सितंबर को दोषी करार दिया गया था.
सीनियर जेल सुपरिटेंडेंट वीरेश राज शर्मा ने न्यूज एजेंसी IANS को बताया कि साहिल और मुस्कान को वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए पेश किया गया था. जैसे ही अदालत ने फांसी की सजा सुनाई, वैसे ही दोनों सदमे में आ गए और फूट-फूटकर रोने लगे.
उन्होंने बताया कि सजा सुनाए जाने के बाद जेल प्रशासन ने दोनों की काउंसिलिंग की. उन्हें बताया गया कि उनके पास अपील करने के क्या-क्या विकल्प हैं?
कोर्ट का फैसला आने के बाद अभी भी मुस्कान और साहिल को फांसी तुरंत नहीं मिल जाएगी. दोनों को फांसी के फंदे तक पहुंचाने में कई पड़ाव बाकी हैं.
अब आगे क्या होगा?
अभी तो जिला जज ने ही मुस्कान और साहिल को फांसी की सजा सुनाई है. यह पहला पड़ाव है. यह सजा तभी अमल में आएगी, जब हाई कोर्ट इस पर मुहर लगाएगी.
भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 22(2) के मुताबिक, सेशन या डिस्ट्रिक्ट कोर्ट किसी अपराधी को फांसी की सजा तो सुना सकती है, लेकिन उस पर हाई कोर्ट की मुहर लगनी जरूरी है.
इसका मतलब हुआ कि अब मामला हाई कोर्ट के पास जाएगा. वहां सुनवाई होगी. अगर हाई कोर्ट को भी लगता है कि ट्रायल कोर्ट का फैसला सही है तो फांसी की सजा बरकरार रहेगी. अगर हाई कोर्ट को लगता है कि ट्रायल कोर्ट का फैसला गलत है या इसमें फांसी की सजा की जरूरत नहीं है तो फैसला पलटा जा सकता है.
फांसी की सजा के ज्यादातर मामलों में हाई कोर्ट निचली अदालत के फैसले को पलट देती है. नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी की ‘प्रोजेक्ट 39’ की रिपोर्ट बताती है कि 2024 में ट्रायल कोर्ट ने 83 मामलों में 139 दोषियों को फांसी की सजा सुनाई थी. जबकि, इसी साल हाई कोर्ट ने सिर्फ 9 मामलों में 9 कैदियों की ही फांसी की सजा को बरकरार रखा.
हाई कोर्ट में मामला जाने के बाद ज्यादातर मामलों में सजा पलट जाती है. ज्यादातर मामलों में हाई कोर्ट फांसी की सजा को उम्रकैद में बदल देती है. कई मामलों में तो फांसी की सजा पाए दोषी बरी भी हो जाते हैं.

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फिर सुप्रीम कोर्ट भी है ऑप्शन?
अगर हाई कोर्ट भी फांसी की सजा को बरकरार रखती है तो मुस्कान और साहिल के पास सुप्रीम कोर्ट में अपील करने का अधिकार भी है.
सुप्रीम कोर्ट में अगर मामला जाएगा तो उस पर फिर नए सिरे से सबूत रखे जाएंगे और सुनवाई होगी. सुप्रीम कोर्ट ने कई फैसलों में कहा है कि फांसी की सजा सिर्फ ‘रेयरेस्ट ऑफ द रेयर’ केस में ही जानी चाहिए.
2009 में एक फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने ‘रेयरेस्ट ऑफ द रेयर’ केस की व्याख्या करते हुए साफ किया था कि फांसी की सजा तब तक नहीं दी जानी चाहिए, जब तक उम्रकैद का विकल्प न बचे.
प्रोजेक्ट 39 की रिपोर्ट के मुताबिक, 2024 में सुप्रीम कोर्ट के पास फांसी की सजा से जुड़े 7 मामले आए थे. इनमें से 6 मामलों में सुप्रीम कोर्ट ने सजा को कम कर उम्रकैद में बदल दिया था. जबकि एक मामले में आरोपी को बरी कर दिया था.
नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) की रिपोर्ट बताती है कि 2024 में 203 कैदियों को फांसी की सजा सुनाई गई थी. जबकि, इसी साल 71 कैदियों की फांसी की सजा को उम्रकैद में बदल दिया गया था.
ऐसे ही बीत जाते हैं सालों-साल
फांसी की सजा ट्रायल कोर्ट सुनाती है. लेकिन उसके बाद भी अपराधी के पास हाई कोर्ट और फिर सुप्रीम कोर्ट में जाने का अधिकार होता है.
प्रोजेक्ट 39 की रिपोर्ट बताती है कि फांसी की सजा से जुड़ा कोई केस हाई कोर्ट जाता है, तो वहां फैसला होने पर औसतन 2 साल 3 महीना लग जाता है. इसके बाद जब मामला सुप्रीम कोर्ट जाता है तो वहां औसतन 9 साल लग जाते हैं.
सुप्रीम कोर्ट अगर फैसला सुना देती है, तब भी रिव्यू पिटीशन और फिर क्यूरेटिव पिटीशन के जरिए उसके खिलाफ अपील की जा सकती है.

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दया याचिका आखिरी रास्ता
सुप्रीम कोर्ट से सारे कानूनी रास्ते खत्म हो जाने के बाद भी अपराधियों के पास राष्ट्रपति के सामने दया याचिका दायर करने का अधिकार होता है. जब तक दया याचिका पर राष्ट्रपति कोई फैसला नहीं ले लेते, तब तक अपराधी को फांसी नहीं हो सकती. कई बार राष्ट्रपति दया याचिका पर फैसला लेने में ही सालों लगा देते हैं.
और तो और, अगर राष्ट्रपति से दया याचिका खारिज हो जाती है, तब भी उसके बाद अपराधी हाई कोर्ट या सुप्रीम कोर्ट में केस लगा देता है.
प्रोजेक्ट 39 के मुताबिक, दया याचिका खारिज होने के बाद हाई कोर्ट या सुप्रीम कोर्ट में केस जाता है तो वहां इसका निपटारा होने में औसतन 216 महीने यानी 18 साल लग सकते हैं.
दया याचिका अगर खारिज भी हो जाती है, तब भी फांसी की सजा को पलटा जा सकता है. इतिहास में इसका उदाहरण भी है.
1993 दिल्ली ब्लास्ट के दोषी देवेंदर पाल सिंह भुल्लर को फांसी की सजा मिली थी. उसकी दया याचिका भी खारिज हो गई. लेकिन बाद में सुप्रीम कोर्ट ने उसकी फांसी की सजा को उम्रकैद में इस आधार पर बदल दिया, क्योंकि दया याचिका खारिज होने में 8 साल का वक्त लग गया था.
NCRB का डेटा बताता है कि 2001 से लेकर 2024 के बीच 3,229 कैदियों को फांसी की सजा सुनाई गई है, लेकिन इस दौरान 8 दोषियों को ही फांसी हुई है. आखिरी बार 2020 में निर्भया के चार दोषियों को फांसी हुई थी.
NCRB के मुताबिक, 2024 के आखिर तक देशभर की जेलों में 537 कैदी ऐसे हैं जिन्हें फांसी की सजा मिली है.





