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Opinion: भारत को बार बार इतने हल्के में क्यों ले रहा है अमेरिका, ‘ब्रेकअप’ आसान होगा या नहीं? | Why is America not giving the same importance to India friendship as before



अमेरिका और भारत के रिश्तों में जिस तरह की तल्खी आ रही है, उसे देखकर यह समझना वाकई मुश्किल है कि आखिर अमेरिकी प्रशासन भारत को अलग-थलग करने पर क्यों तुला हुआ है. ताजा मामला H-1B वीजा को निशाने पर लेने का है. अमेरिका का दावा है कि इस वीजा व्यवस्था में बड़े पैमाने पर धांधली हो रही है और इसकी वजह से योग्य अमेरिकियों को अपनी नौकरियों से हाथ धोना पड़ रहा है.

अमेरिका के श्रम विभाग ने इन्फोसिस, टीसीएस, विप्रो और एचसीएल जैसी दुनिया की दिग्गज आईटी आउटसोर्सिंग कंपनियों को परमानेंट लेबर सर्टिफिकेशन प्रोग्राम (PERM) से निलंबित कर दिया है. उन पर आरोप लगाया गया है कि ये कंपनियां स्थाई नागरिकता (ग्रीन कार्ड) चाहने वाले विदेशी कर्मचारियों के लिए इस प्रणाली का गलत इस्तेमाल कर रही थीं.

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भारत पर टैरिफ लगाने, व्यापार समझौते पर पैर खींचने, आने वाले वक्त में मेडिसिन सेक्टर पर भारी टैक्स थोपने का इरादा जताने और फिर अमेरिकी संसद की तरफ से राष्ट्रपति को रूस से तेल खरीदने के एवज में भारत पर 100% तक टैरिफ लगाने का अधिकार देने जैसे कदमों के बाद, अब हमारा आईटी क्षेत्र भी निशाने पर आ गया है. ऐसा लगता है कि इन सब जरियों से अमेरिका भारत से अलग-अलग मोर्चों पर रियायतें ऐंठना चाहता है.

लेकिन हकीकत तो यह है कि H-1B वीजा के इक्का-दुक्का गलत इस्तेमाल को छोड़ भी दें, तो बड़े पैमाने पर सिलिकॉन वैली और बेंगलुरु के बीच का यह सहयोग एक बेमिसाल कामयाबी की कहानी रहा है. 

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अमेरिका के दिग्गज टेक कंपनियां और भारत की सबसे बड़ी आईटी कंपनियां साथ-साथ फले-फूले हैं. कई अमेरिकी टेक कंपनियों की कमान आज भारतीय मूल के मुख्य कार्यकारी अधिकारियों (CEO) के हाथों में है. इनमें से कई H-1B वीजा के जरिए ही अमेरिका गए थे. यह बात खुद अपने आप कामयाबी की बड़ी तस्वीर पेश की है.

अमेरिकी कंपनियां भारत के हुनर का कद्र समझती हैं

भारत-अमेरिका संबंधों में जारी कड़वाहट को देखते हुए, हमारे आईटी क्षेत्र पर हमला करके भारत पर शिकंजा कसना कोई गैर-अपेक्षित कदम नहीं था, जबकि इसी क्षेत्र ने बेंगलुरु और सिलिकॉन वैली के बीच एक मजबूत तालमेल बनाया था.

भारत के आईटी सेक्टर पर दबाव बढ़ाना विशुद्ध रूप से लोकलुभावन सियासत का कारण है. अमेरिका इस बात से अच्छी तरह वाकिफ है कि उसके अपने मुल्क में स्टेम (STEM) स्नातकों की सख्त किल्लत है. समस्या की असल गहराई को समझने के लिए हमें यह आंकड़े देखने होंगे कि H-1B वीजा की वजह से वास्तव में कितने अमेरिकी ग्रेजुएट्स की नौकरियां गई हैं. 

वैश्विक आईटी बाजार पर सिलिकॉन वैली का दबदबा है और भारतीय प्रतिभा ने इसमें बेहद अहम योगदान दिया है. क्या वहां का स्थानीय हुनर कभी भारतीय प्रतिभा की जगह ले सकता है? अमेरिका खुद भारत में 60% से ज्यादा ग्लोबल कैपेबिलिटी सेंटर्स (GCC) कायम करने और उनकी बौद्धिक संपदा (आईपी) पर कब्जा जमाने में सबसे आगे क्यों है? जाहिर है कि अमेरिकी कंपनियां भारतीय हुनर की कद्र अच्छी तरह समझती हैं.

भारत ने दिया है माकूल जवाब

अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने H-1B वीजा के खिलाफ कैंपेन की अगुवाई की है. उन्होंने इस व्यवस्था का फायदा उठाने वालों को ‘बंधुआ मजदूर’ तक कह दिया. भारत के विदेश मंत्रालय ने अपने एक असाधारण रूप से सख्त बयान में वेंस का नाम लेकर उन्हें आड़े हाथों लिया और उनके इस बयान को ‘बेहद अपमानजनक’ बताया है. 

ट्रंप प्रशासन की ओर से मिल रहे झटकों को भारत अब तक बिना किसी तैश के खामोशी से बर्दाश्त करता आ रहा था, ताकि तुनकमिजाज व्हाइट हाउस के साथ किसी सीधे तनाव से बचा जा सके. हालांकि, अपने ताजा बयान में विदेश मंत्रालय ने थोड़े तेवर जरूर दिखाए हैं.

भारतीय आईटी उद्योग की संस्था नैस्कॉम (NASSCOM) ने एक बयान जारी करते हुए कहा है कि H-1B कार्यक्रम ने ऐतिहासिक रूप से अमेरिका में हुनर की तात्कालिक कमी को पूरा करने में अहम किरदार निभाया है और आगे भी निभाता रहेगा. उसने यह भी सामने रखा कि बीते सालों में भारतीय आईटी कंपनियों ने H-1B वीजा पर अपनी निर्भरता बहुत हद तक घटा दी है और स्थानीय स्तर पर नौकरियां देने में लगातार बढ़ोतरी की है.

वहीं, 23 आईआईटी संस्थानों का नुमाइंदा संगठन पैन आईआईटी एल्युमनाई इंडिया (PAN IIT Alumni India) ने H-1B वीजा पर गए स्किल्ड भारतीय पेशेवरों से अपील की है कि वे भारत लौटकर यहीं अपना करियर और कारोबार बनाने पर गौर करें. 

उसने साफ तौर से तकनीकी पेशेवरों को आगाह किया है कि वे अपना दूरगामी भविष्य पूरी तरह से विदेशी आव्रजन (इमिग्रेशन) के कायदे-कानूनों के भरोसे न छोड़ें. 

संगठन ने उनसे भारत के तेजी से बढ़ते टेक क्षेत्र में अपने तजुर्बे का इस्तेमाल करने का आग्रह करते हुए तर्क दिया कि जिन घरेलू मजबूरियों के कारण कभी भारत के होनहार दिमागों को विदेश जाना पड़ता था, वे अब बीते जमाने की बात हो चुकी हैं. यहां पर घरेलू मजबूरी का मतलब है तकनीकी ढांचे या पूंजी की कमी.

टाटा क्या कहा?

टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज (TCS) का कहना है कि अमेरिका की तरफ से PERM ग्रीन कार्ड कार्यक्रम को निलंबित करने से उसके कामकाज या ग्राहकों के प्रोजेक्ट्स पर कोई खास असर नहीं पड़ेगा. पिछले दो सालों में उसकी PERM अर्जियां दहाई के आंकड़े से भी कम रही हैं, लिहाजा इससे कंपनी के रोजमर्रा के काम में कोई रुकावट नहीं आएगी.

दूसरी तरफ, अमेरिका ने यह प्रस्ताव रखा है कि विदेशी छात्रों को ‘ऑप्शनल प्रैक्टिकल ट्रेनिंग’ (OPT) प्रोग्राम में शामिल करने के लिए वहां की यूनिवर्सिटीज को प्रति छात्र 70,000 अमेरिकी डॉलर चुकाने होंगे. इसका सीधा नुकसान भारतीयों को होगा, क्योंकि अमेरिका में विदेशी छात्रों में सबसे बड़ी तादाद भारतीयों की ही है.

शायद अब वक्त आ गया है कि हम उन बुनियादी मान्यताओं का फिर से जायजा लें, जिनके दम पर हम अमेरिका के साथ इतने गहरे रिश्ते बुनते आ रहे थे. हमने अमेरिका के साथ रक्षा सहयोग, तकनीकी इजाद, आर्थिक रिश्तों और हिंद-प्रशांत क्षेत्र के साझे नजरिए पर टिकी एक व्यापक वैश्विक रणनीतिक साझेदारी (Comprehensive Global Strategic Partnership) कायम की थी.

हिंद-प्रशांत का सवाल भी तो है

इन तमाम मोर्चों पर इस व्यापक रणनीतिक साझेदारी की बुनियाद कमजोर हुई है. व्यापार के मोर्चे पर, समझौते के ‘99% तक तय”‘ हो जाने के तमाम दावों के बाद, हमारी वित्त मंत्री ने अब साफ कर दिया है कि बातचीत एक ठहराव पर पहुंच गई है और अब किसी भी पक्ष के लिए आगे और छूट देना या नई मांग रखना ‘बेहद मुश्किल’ होगा.

उन्होंने दोनों देशों के बीच व्यापार के असंतुलन को माना, जो फिलहाल भारत के हक में है, लेकिन व्यापार घाटे को सुलझाने के लिए सीधे कूटनीतिक रास्ते के बजाय अमेरिका की तरफ से टैरिफ को ‘हथियार’ की तरह इस्तेमाल करने की सख्त नापसंदगी जताई. 

उन्होंने कहा कि अमेरिकी संसद ने रूस से भारी मात्रा में तेल खरीदने वाले देशों पर टैरिफ लगाए है. इसमें भारत भी शामिल है. अमेरिका संसद ने 100% तक टैरिफ वसूलने की इजाजत दी. इससे आपसी रिश्तों में और खटास घोल दी है और किसी अंतिम समझौते तक पहुंचने का रास्ता और पेचीदा कर दिया है.

हालांकि यह भी ध्यान देने वाली बात है कि समझौते में देरी और टैरिफ की धमकियों के बावजूद, अमेरिकी बाजार में भारत का निर्यात मजबूत बना हुआ है. इलेक्ट्रॉनिक्स, दवाइयों और समुद्री उत्पादों जैसे क्षेत्रों ने काफी बेहतर प्रदर्शन किया है.

दूसरी ओर, अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि जैमिसन ग्रीर ने यह कहकर किसी समझौते की उम्मीदों पर पानी फेर दिया है कि फिलहाल कोई ट्रेड डील निकट भविष्य में होती नहीं दिख रही. इन सब बातों का मतलब यही है कि दोनों मुल्कों के बीच व्यापार को 500 अरब डॉलर तक पहुंचाने का जो मकसद रखा गया था, उसका साल 2030 की तय मियाद तक पूरा होना अब नामुमकिन सा लगता है. इस लक्ष्य को ‘मिशन 500’ नाम दिया गया था.

भारत और अमेरिका के बीच तकनीकी और नई खोजों का सहयोग पुराने ‘इनिशिएटिव ऑन क्रिटिकल एंड इमर्जिंग टेक्नोलॉजी’ (iCET) से आगे बढ़कर अब ‘ट्रस्ट’ (TRUST) ढांचे में तब्दील हो चुका है. इसके तहत एआई और बुनियादी ढांचा, सेमीकंडक्टर और सप्लाई चेन, अंतरिक्ष में नई खोजें, और क्वांटम व बायोटेक्नोलॉजी जैसे अहम मुद्दे एजेंडे में शामिल हैं. लेकिन अमेरिका की उलझी हुई नियामक रुकावटें और आईटीएआर (ITAR) से जुड़े कड़े कानून, साथ ही सियासी माहौल में घुलती कड़वाहट, इन तमाम क्षेत्रों में सहयोग की रफ्तार को धीमा कर सकते हैं.

उम्मीद की कुछ बारीक किरणें

तमाम निगेटिव रुझानों के बावजूद, ऐसा लगता है कि कुछ मोर्चों पर दोतरफा रिश्तों को बनाए रखने की कोशिश की जा रही है. ‘इंडियन ओशन स्ट्रैटेजिक वेंचर’ के जरिए हिंद महासागर की सुरक्षा और बुनियादी ढांचे पर भारत और अमेरिका के मिलकर काम करने की योजना आगे बढ़ती दिख रही है. 

इस सहयोग का मकसद श्रीलंका, मालदीव और मॉरीशस जैसे क्षेत्रीय मुल्कों में बंदरगाहों व टेलीकॉम नेटवर्क के निर्माण व सुधार के लिए माली और तकनीकी संसाधनों को जुटाना है. इसके साथ ही समुद्री सुरक्षा और डिजिटल-टेक कनेक्टिविटी को बढ़ाना है. हालांकि, यह पहल कितनी दूर तक जा पाएगी, यह कहना बेहद अनिश्चित है; क्योंकि फ्रांस और जापान के साथ हमारा पिछला तजुर्बा यह दिखाता है कि तीसरे देशों में इस तरह का तालमेल कोई खास रंग नहीं जमा पाया है.

इसके अलावा, जब क्वाड (Quad) और पूर्व-केंद्रित हिंद-प्रशांत की सोच में अमेरिका की दिलचस्पी खुद-ब-खुद कम होती दिख रही है, तो यह समझ से परे है कि पश्चिमी हिंद महासागर में अमेरिका किसी संजीदा द्विपक्षीय सहयोग के लिए ज्यादा प्रतिबद्ध क्यों रहेगा? 

भारत पहले से ही श्रीलंका, मालदीव और मॉरीशस में बड़े बुनियादी ढांचों और दूसरे प्रोजेक्ट्स पर काम कर रहा है, ऐसे में इन मुल्कों में किसी तीसरी महाशक्ति के साथ हाथ मिलाने के सियासी तर्क पर वाजिब सवाल खड़े होते हैं.

और आखिर में, जमीनी हकीकत और अमेरिकी दूतावास की तरफ से भारत में दोनों मुल्कों के रिश्तों को लेकर पेश की जा रही गुलाबी तस्वीर के बीच का फर्क अब पूरी तरह से साफ नजर आने लगा है.

(लेखक कंवल सिब्बल तुर्की, मिस्र, फ्रांस और रूस में विदेश सचिव और राजदूत थे और वाशिंगटन में डिप्टी चीफ ऑफ मिशन थे)

डिस्क्लेमर: ये लेखक के निजी विचार हैं



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