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40 साल पहले जिस जुनून को दुनिया ने कहा ‘पागलपन’, आज उसी पर फ्रांसिस हैल्जेन को मिला फिजिक्स का नोबेल | Nobel Prize in Physics 2026 Why Francis Halzen Won for IceCube Neutrino Observatory and What Is India Connection


फिजिक्स यानी भौतिक विज्ञान में साल 2026 के लिए नोबेल पुरस्कार का ऐलान हो चुका है. यह पुरस्कार अमेरिका की यूनिवर्सिटी ऑफ विस्कॉन्सिन-मैडिसन के प्रोफेसर फ्रांसिस हैल्जेन को दिया गया है. उन्हें ब्रह्मांड को समझने के लिए एक नए वैज्ञानिक नजरिए की नींव रखने, आइसक्यूब न्यूट्रिनो ऑब्जरवेट्री के निर्माण में अहम भूमिका निभाने और खगोलीय स्रोतों से आने वाले उच्च-ऊर्जा न्यूट्रिनो की खोज के लिए सम्मानित किया गया है. आखिर प्रो. हैल्जेन को नोबेल क्यों मिला? ये खोज क्या है और भारत से इसका क्या कनेक्शन है? यह जानने के लिए हमने आइसक्यूब ऑब्जरवेट्री में रिसर्च करने वाले  पीएचडी स्कॉलर से बात की.

क्या है प्रो. हैल्जेन की सबसे बड़ी उपलब्धि?

अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के पीएचडी स्कॉलर गोपाल गर्ग ने बताया कि यह उपलब्धि केवल एक वैज्ञानिक खोज नहीं, बल्कि ब्रह्मांड को देखने का एक बिल्कुल नया तरीका है.

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प्रो. हैल्ज़ेन ने यह विचार दिया कि अंटार्कटिका की विशाल बर्फीली चादर को ही एक विशाल प्राकृतिक डिटेक्टर के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है.

इसी सोच से आइसक्यूब न्यूट्रिनो ऑब्जरवेट्री बनी, जिसे दक्षिणी ध्रुव पर बर्फ की सतह से करीब 2.5 किलोमीटर नीचे स्थापित किया गया. यह दुनिया की सबसे बड़ी न्यूट्रिनो ऑब्जरवेट्री में से एक है और सुदूर ब्रह्मांडीय घटनाओं से आने वाले न्यूट्रिनो का पता लगाती है.

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आखिर न्यूट्रिनो होते क्या हैं?

न्यूट्रिनो ब्रह्मांड के सबसे रहस्यमय और मायावी कणों में गिने जाते हैं. इनमें कोई इलेक्ट्रिक चार्ज नहीं होता और इसका इनका द्रव्यमान बेहद कम होता है. ये किसी भी पदार्थ के साथ बहुत कमजोर रूप से अंतःक्रिया करते हैं, इसलिए ये लगभग बिना किसी व्यवधान के विशाल मात्रा में किसी भी पदार्थ से गुजर सकते हैं. अरबों न्यूट्रिनो हर सेकंड हमारे शरीर से गुजरते हैं, लेकिन हमें इसका एहसास तक नहीं होता. इन्हीं गुणों की वजह से इन्हें पकड़ना और इनकी स्टडी करना बेहद कठिन होता है.

2013 में हुई ऐतिहासिक खोज

नवंबर 2013 में आइसक्यूब ऑब्जरवेट्री ने पहली बार ब्रह्मांडीय स्रोतों से आए हाई-एनर्जी न्यूट्रिनो की पहचान की. इस खोज ने न्यूट्रिनो एस्ट्रोनॉमी के एक नए युग की शुरुआत की. अब वैज्ञानिक प्रकाश, कॉस्मिक किरणों और गुरुत्वीय तरंगों के साथ-साथ न्यूट्रिनो की मदद से भी ब्रह्मांड के रहस्यों का अध्ययन कर सकते हैं. इसी अवधारणा को मल्टी-मैसेंजर एस्ट्रोनॉमी कहा जाता है.

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क्यों मिला नोबेल पुरस्कार?

प्रो. हैल्जेन को मिला नोबेल उनकी वैज्ञानिक दूर दृष्टि से समझा जा सकता है. उनका मानना है कि अंटार्कटिका की विशाल मात्रा में मौजूद शुद्ध बर्फ को ही न्यूट्रिनो के लिए लक्ष्य और डिटेक्टर दोनों के रूप में प्रयोग किया जा सकता है. यह विचार 1980 के दशक में सोचा गया था. लेकिन यह विचार 2011 में पूरा हुआ.

प्रो. फ्रांसिस हैल्जेन के विचार से ही आइसक्यूब न्यूट्रिनो ऑब्जरवेट्री का निर्माण हुआ. आज आइसक्यूब हाई एनर्जी के खगोलीय न्यूट्रिनो की रिसर्च करने के लिए दुनिया की सबसे प्रमुख ऑब्जरवेट्री में से एक है. आइसक्यूब 2011 से ही न्यूट्रिनो डेटा इकट्ठा कर रही है.

प्रो. हैल्जेन ने इस बात पर जोर दिया कि उन्हें आइसक्यूब प्रोजेक्ट को मुमकिन बनाने वाले शुरुआती लोगों से मिले सहयोग पर बहुत गर्व है. उन्होंने कहा, ‘यह एक तरह का साहसिक कार्य था जिसमें सफलता की कोई गारंटी नहीं थी. मुझे उम्मीद है कि यह उन साहसी लोगों की झलक दर्शाता है जो इस प्रोजेक्ट की शुरुआत में मेरे साथ जुड़े, जब कोई भी जानामाना वैज्ञानिक मेरे साथ नहीं जुड़ता, तब भी कई प्रतिभाशाली लोग जुड़े.’  आज आइसक्यूब एक अंतरराष्ट्रीय सहयोग है जिसमें लगभग 14 देशों के 450 से अधिक वैज्ञानिक शामिल हैं.

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क्यों खास है यह खोज?

इस उपलब्धि से वैज्ञानिकों को  ब्रह्मांड के रहस्यों को सुलझाने में मदद मिलेगी. वैज्ञानिक सुपरनोवा विस्फोटों को समझने में, ब्लैक होल के आसपास होने वाली गतिविधियों का अध्ययन करने में, डार्क मैटर के रहस्यों को जानने में और ब्रह्मांड की उत्पत्ति से जुड़े सवालों के जवाब खोजने की कोशिश कर रहे हैं. इस प्रोजेक्ट से इन सवालों के जवाब खोजने में और मदद मिलेगी.

यानी अब ब्रह्मांड को सिर्फ ‘देखा’ नहीं जाएगा, बल्कि उसके सबसे रहस्यमय संदेशवाहकों के जरिए ‘सुना’ भी जाएगा.

भविष्य में और बड़ी खोजों की उम्मीद

वैज्ञानिकों का मानना है कि यह केवल शुरुआत है. आने वाले समय में कई नई ऑब्जरवेट्री स्थापित की जाएंगी, जिनमें अंटार्कटिका की आइसक्यूब-जेन2, भूमध्य सागर की KM3NeT, प्रशांत महासागर की P-ONE, चाइना सी की TRIDENT और रूस की Baikal-GVD जैसी परियोजनाएं शामिल हैं. इनके जरिए न्यूट्रिनो रिसर्च और बेहतर होगी.

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AMU और नोबेल पुरस्कार का कनेक्शन

इस नोबेल पुरस्कार का भारत से भी एक रोचक संबंध है. अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के शोधकर्ता गोपाल गर्ग, अनुज कुमार उपाध्याय और कृष्णमूर्ति जे ने इंस्टीट्यूट ऑफ फिजिक्स, भुवनेश्वर के प्रोफ़ेसर संजीव कुमार अग्रवाला के साथ मिलकर आइसक्यूब ऑब्जरवेट्री में काम किया है. AMU के फिजिक्स डिपोर्टमेंट के प्रोफेसर मोहम्मद सज्जाद अथर इन तीनों छात्रों के सुपरवाइजर हैं. प्रो. सज्जाद अथर लंबे समय से इंटरनेशनल न्यूट्रिनो रिसर्च से जुड़े हुए हैं और कई वैश्विक वैज्ञानिक परियोजनाओं में योगदान दे रहे. वे प्रो. तकाकी कजीता के साथ भी काफी करीब से कम कर चुके हैं, जिन्हें न्यूट्रिनो के दोलन की खोज के लिए 2015 में फिजिक्स का नोबेल पुरस्कार मिल चुका है.

प्रो. अथर ने बताया कि यह खोज एएमयू के न्यूट्रिनो फिजिक्स प्रोग्राम की बढ़ती इंटरनेशनल प्रेजेंट और आधुनिक कण भौतिकी और खगोल भौतिकी  के रोमांचक क्षेत्रों में निरंतर भागीदारी की इसकी लंबी परंपरा को दर्शाते हैं. उन्होंने कहा कि आइसक्यूब की कहानी यह बताती है कि वैज्ञानिक खोजों के लिए न केवल नए और दूरदर्शी विचारों की जरूरत होती है, बल्कि निरंतर संस्थागत सहयोग, लंबी अवधि की योजना, और समाज के साथ करीबी जुड़ाव की भी जरूरत होती है.

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