धर्म

Pitru Paksha 2026: श्राद्ध में गाय और कौवों को भोजन क्यों कराते हैं? जानिए कैसे मिलता है पितरों का आशीर्वाद


सनातन धर्म में श्राद्ध पक्ष (पितृ पक्ष) के 16 दिन पूर्वजों और पितरों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का सबसे पावन समय माना गया है. इन दिनों पितरों की आत्मा की शांति और उनकी तृप्ति के लिए तर्पण, पिंडदान और दान-पुण्य किए जाते हैं.

श्राद्ध के दौरान ब्राह्मण भोज से पहले गाय और कौवे को भोजन कराने की विशेष परंपरा है. धर्मनगरी हरिद्वार के गंगा घाटों से लेकर घर-घर तक लोग अपने बनाए पकवानों का पहला हिस्सा इन जीवों के लिए निकालते नजर आते हैं. आइए जानते हैं कि शास्त्रों के अनुसार गाय और कौवे को ग्रास देने से पितरों का आशीर्वाद कैसे प्राप्त होता है.

गाय को भोजन कराने का धार्मिक महत्व

हिंदू धर्म में गाय को माता का दर्जा दिया गया है और मान्यता है कि गौमाता में 33 करोड़ देवी-देवताओं का वास होता है.

पावन धाम के महामंत्री एवं तीर्थ पुरोहित अंशुल श्री कुंज के अनुसार, श्राद्ध पक्ष में केवल ब्राह्मणों को ही नहीं, बल्कि ‘पंचबली’ निकालने का भी शास्त्रीय विधान है. पंचबली के तहत गाय, कुत्ता, कौवा, चींटी और देवी-देवताओं (जैसे भगवान विष्णु और मां गंगा) के निमित्त भोजन निकाला जाता है.

अधोगति से मुक्ति: धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, यदि कोई पितृ किसी कारणवश अधोगति (कष्टकारी योनि) में भटक रहा होता है, तो मनुष्य रूप में अगला जन्म लेने से पहले वह गाय के गर्भ में आता है. इसके बाद ही अपने कुल में उसका पुनर्जन्म संभव होता है.

पुण्यफल की प्राप्ति: श्राद्ध के दिनों में गाय को ताजी रोटी, हरा चारा, चोकर, गुड़ और नमक खिलाने से पितरों को शांति मिलती है और वे तृप्त होकर परिवार को सुख-समृद्धि का आशीर्वाद देते हैं.

कौवे को क्यों कराया जाता है भोजन?

श्राद्ध में कौवे (काग) को भोजन कराने का विशेष महत्व है. शास्त्रों में कौवे को यमराज का दूत और पितरों का प्रतीक माना गया है.

दोनों लोकों का संपर्क सूत्र: कौवा पृथ्वी लोक और आकाश लोक (नभ) दोनों आयामों में आसानी से विचरण करता है. मान्यता है कि यदि कोई पितृ सूक्ष्म रूप में वायुमंडल या नभचर में भटक रहे हैं, तो कौवे को दिया गया भोजन सीधे उन तक पहुंच जाता है.

संतुष्टि का संकेत: कौवा हमेशा इंसानी बस्तियों के आसपास रहता है. जब कौवा श्राद्ध का भोजन ग्रहण करता है, तो माना जाता है कि पितरों ने परिवार द्वारा अर्पित किया गया अन्न स्वीकार कर लिया है.

क्या कहते हैं श्रद्धालु और स्थानीय लोग?

हरिद्वार के स्थानीय लोगों का कहना है कि वे वर्षों से श्राद्ध पक्ष में नियमित रूप से कौवों को रोटी, दाना-पानी और गाय को ग्रास देते आ रहे हैं.

श्रद्धालुओं का मानना है कि इस परंपरा के पालन से जीवन की बाधाएं दूर होती हैं, रुके हुए काम बनने लगते हैं और घर में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है. गाय और कौवे की सेवा से पितृ दोष शांत होता है और पूर्वजों की असीम कृपा पूरे परिवार पर बनी रहती है.

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Disclaimer: यहां मुहैया सूचना सिर्फ मान्यताओं और जानकारियों पर आधारित है. यहां यह बताना जरूरी है कि ABPLive.com किसी भी तरह की मान्यता, जानकारी की पुष्टि नहीं करता है. किसी भी जानकारी या मान्यता को अमल में लाने से पहले संबंधित विशेषज्ञ से सलाह लें.



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