
नई दिल्ली:
पहली बार वोट देने वाले वोटरों को रजिस्ट्रेशन के लिए ‘फॉर्म 6’ भरना पड़ता है. इसी ‘फॉर्म 6’ में बदलाव करने के चुनाव आयोग के फैसले से बड़ा विवाद खड़ा हो गया है.
‘इंडियन एक्सप्रेस’ की रिपोर्ट के मुताबिक, दो चुनाव आयुक्तों- विवेक जोशी और सुखबीर सिंह संधू ने इन बदलावों को ‘गैर-कानूनी’ बताया है और नए वोटरों के हित में इन्हें तुरंत वापस लेने की मांग की है.
इस रिपोर्ट के आने के बाद से ही विवाद बढ़ गया है. चुनाव आयोग ने इन बदलावों को जुलाई से लागू किया था. अखबार की रिपोर्ट आने के बाद मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार निशाने पर आ गए हैं.
इस कदम और चुनाव आयुक्तों की आपत्तियों वाली रिपोर्ट ने काफी हलचल मचा दी है और फॉर्म 6 को चर्चा के केंद्र में ला दिया है.
आइए, इस पूरे मामले को विस्तार से समझते हैं.
फॉर्म 6 क्या है?
भारत में वोटर के तौर पर रजिस्टर कराने के लिए ‘फॉर्म 6’ भरना जरूरी है. इसमें पर्सनल जानकारी, एक फोटो, उम्र और पते का प्रूफ मांगा जाता है. यह फॉर्म ‘रजिस्ट्रेशन ऑफ इलेक्टर्स रूल्स, 1960’ के तहत तय किया गया है.
क्या बदलाव हुआ?
जुलाई 2026 में, ECI के ECINet पोर्टल पर फॉर्म 6 के ऑनलाइन वर्जन में एक नया घोषणा-पत्र शामिल करने के लिए बदलाव किया गया.
इस बदलाव के तहत, फॉर्म 6 में ‘स्पेशल इंटेंसिव रिविजन’ (SIR) से जुड़े सवाल शामिल किए गए. आवेदकों से तीन में से कोई एक बात चुनने को कहा गया.
- पहली- क्या 2000 के दशक की शुरुआत में हुए पिछले SIR के दौरान वोटर लिस्ट में उनका नाम था?
- दूसरी- क्या उस लिस्ट में उनके माता-पिता या दादा-दादी/नाना-नानी का नाम था?
- तीसरी- क्या उस लिस्ट में उनका और उनके माता-पिता का नाम नहीं था?
इस सवाल का जवाब दिए बिना आवेदक ऑनलाइन फॉर्म नहीं भर सकते.
कई राज्यों में पिछला SIR 2000 के दशक की शुरुआत में हुआ था, जबकि कुछ राज्यों ने इसे पिछले साल या इसी साल पूरा किया.

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विवाद क्यों?
‘द इंडियन एक्सप्रेस’ की रिपोर्ट के अनुसार, सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने आधिकारिक तौर पर कहा कि चूंकि ‘फॉर्म 6’ ‘रजिस्ट्रेशन ऑफ इलेक्टर्स रूल्स, 1960’ का हिस्सा है, इसलिए इसे केवल सरकारी नोटिफिकेशन और नियमों में संशोधन के जरिए ही बदला जा सकता है, न कि सिर्फ ऑनलाइन फॉर्म में बदलाव करके.
‘रिप्रेजेंटेशन ऑफ द पीपल एक्ट, 1950’ की धारा 28 के तहत, केंद्र सरकार चुनाव आयोग से सलाह लेने के बाद ये नियम बनाती है और उनमें संशोधन करती है. किसी भी संशोधन को संसद के सामने पेश करना होता है और गजट में नोटिफाई करना होता है.
‘द इंडियन एक्सप्रेस’ की रिपोर्ट के अनुसार, संधू और जोशी ने इस बदलाव को ‘गैर-कानूनी’ और ‘बिना अधिकार के किया गया’ फैसला बताया और सुझाव दिया कि इस मामले को सरकार के पास भेजा जाए.
मई में दोनों चुनाव आयुक्तों की आपत्तियों के बावजूद, चुनाव आयोग ने जुलाई में यह बदलाव लागू कर दिया.
रिपोर्ट पर प्रतिक्रिया देते हुए, चुनाव आयोग ने बुधवार को कहा कि आंतरिक चर्चाओं के दौरान चुनाव आयुक्तों के बीच असहमति ‘फैसला लेने की प्रक्रिया’ का सामान्य हिस्सा है. आयोग ने यह भी कहा कि पिछले एक साल में पूरे आयोग के सभी फैसले सर्वसम्मति से लिए गए थे.

इस बदलाव का क्या मतलब है?
किसी व्यक्ति के वोट देने की पात्रता उम्र, नागरिकता और सामान्य निवास जैसी बातों से तय होती है – न कि इस बात से कि उनके माता-पिता पिछली वोटर लिस्ट में शामिल थे या नहीं.
चल रही SIR प्रक्रिया के दौरान, अलग-अलग राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में वोटर लिस्ट से लगभग 13 करोड़ नाम हटा दिए गए हैं. हालांकि इनमें से कई नाम उन मतदाताओं के हैं जिनकी मौत हो चुकी है, जो कहीं और चले गए हैं या जिनके नाम एक से ज्यादा बार दर्ज थे, लेकिन कई लोग अपने नाम हटाए जाने का विरोध भी कर रहे हैं.
नए वोटरों के लिए फॉर्म में पिछली SIR से जुड़ा एक सवाल शामिल किए जाने से उन युवाओं पर इसके असर को लेकर चिंताएं पैदा हो गई हैं जो पहली बार अपना नाम वोटर लिस्ट में दर्ज कराना चाहते हैं.
एक 18 साल का युवा, जिसके माता-पिता या दादा-दादी/नाना-नानी का नाम पिछली संबंधित SIR लिस्ट में नहीं था, वह माता-पिता और दादा-दादी/नाना-नानी से जुड़े पहले दो विकल्पों को नहीं चुन पाएगा. फॉर्म में यह भी नहीं बताया गया है कि अगर आवेदक तीसरा विकल्प – ‘इनमें से कोई नहीं’ चुनता है तो क्या होगा?
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डिलीट तो फर्स्ट टाइम वोटर के तौर पर करें अप्लाई!
जून 2025 में बिहार में शुरू हुई SIR प्रक्रिया के तहत, अलग-अलग राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में वोटर लिस्ट के ड्राफ्ट से 13 करोड़ नाम हटा दिए गए हैं.
इनमें से कई वोटर – जिनमें से कुछ का नाम सालों से लिस्ट में था – से अब कहा जा रहा है कि वे बदली हुई लिस्ट में अपना नाम वापस जुड़वाने के लिए ‘फॉर्म 6’ भरें.
समस्या यह है कि ‘फॉर्म 6’ में एक जरूरी घोषणा (डिक्लेरेशन) होती है जिसमें आवेदक को यह बताना होता है कि वह ‘पहली बार वोटर लिस्ट में शामिल होने के लिए अप्लाई कर रहा है’ और उसका नाम किसी विधानसभा या संसदीय क्षेत्र की वोटर लिस्ट में शामिल नहीं है.

नियम के अनुसार, जिस वोटर का नाम लिस्ट से ‘हटा’ दिया गया है और जो उसे वापस जुड़वाना चाहता है, उसका नाम पहले से ही वोटर लिस्ट में रहा होगा. इसलिए, ‘फॉर्म 6’ पर घोषणापत्र पर साइन करने का मतलब ऐसी बात की पुष्टि करना हो सकता है जो असल में गलत है.
‘रिप्रेजेंटेशन ऑफ द पीपल एक्ट, 1950’ की धारा 31 के तहत, वोटर लिस्ट से जुड़ी गलत घोषणा जानबूझकर करना एक दंडनीय अपराध है, जिसके लिए एक साल तक की जेल, जुर्माना या दोनों हो सकते हैं.
फॉर्म 6 में शामिल नया सवाल यह मानकर चलता है कि परिवार दो पीढ़ियों के बीच दस्तावेजी संबंध साबित कर सकते हैं. आलोचकों का तर्क है कि इसका असर प्रवासी लोगों, गरीब परिवारों और एक राज्य से दूसरे राज्य में जाकर बसने वाले लोगों पर बहुत ज्यादा पड़ सकता है.
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