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DUSU क्यों कहलाता है राजनीति की नर्सरी? अरुण जेटली, रेखा गुप्ता समेत कौन-कौन से दिग्गज यहां से निकले | delhi university nursery of indian politics prominent leaders like arun jaitley rekha gupta battle nsui and abvp



भारतीय राजनीति में एक कहावत कही जाती है ‘देश की सत्ता का रास्ता उत्तर प्रदेश से होकर गुजरता है, नेता बनने का रास्ता दिल्ली विश्वविद्यालय (DU) से होकर जाता है.’ क्योंकि जिस तरह यूपी देश की राजनीति का गढ़ माना जाता है, उसी तरह दिल्ली विश्वविद्यालय भी छात्र राजनीति का गढ़ माना जाता है. दिल्ली विश्वविद्यालय केवल एक शैक्षणिक संस्थान नहीं है, बल्कि यह स्वतंत्र भारत की राजनीति की सबसे बड़ी नर्सरी भी मानी जाती है. यहां से निकले नेता विधायक, मंत्री, सांसद, केंद्रीय मंत्री से लेकर देश के बड़े राजनीतिक दलों के प्रमुख चेहरे बने हैं. यहां हर साल होने वाले छात्र संघ के चुनाव देश की राजनीति के लिहाज से अहम माने जाते हैं. क्योंकि इन चुनावों से जो छात्र नेता निकलते हैं वह अक्सर राजनीति में लंबी पारी खेलते हैं. ऐसे में यह जानना भी जरूरी है कि दिल्ली विश्वविद्यालय देश की छात्र राजनीति के लिए क्यों जरूरी है. 

भारतीय राजनीति में एंट्री का गेट

देश के ज्यादातर विश्वविद्यालयों में क्षेत्रीय या छात्र-केंद्रित दल हावी रहते हैं. लेकिन दिल्ली विश्वविद्यालय की कहानी अलग होती है. यहां राष्ट्रीय राजनीतिक दलों का सीधा प्रभाव रहता है. छात्र संघ के चुनावों में आमतौर पर कांग्रेस समर्थित ‘एनएसयूआई’ (NSUI) और भाजपा समर्थित ‘एबीवीपी’ (ABVP) के बीच ही दिखता है. इसके अलावा कुछ अन्य राजनीतिक दलों के छात्र संघटनों का भी यहां प्रभाव माना जाता है. ऐसे में राष्ट्रीय दलों की नजर सीधे दिल्ली विश्वविद्यालय में होने वाले छात्र संघ पर होती है. यहां से चुनाव जीतने छात्र सीधे मुख्यधारा की पार्टियों में एंट्री लेते हैं और उन्हें आगे जाकर बड़े मौके अक्सर मिलते हैं. इसलिए दिल्ली विश्वविद्यालय को सीधे राष्ट्रीय राजनीति में एंट्री का मंच माना जाता है. 

दिल्ली विश्वविद्यालय से निकले बड़े नेता 

  • अरुण जेटली: 1974 में DUSU अध्यक्ष के तौर पर काम किया और बाद में केंद्रीय वित्त मंत्री और रक्षा मंत्री बने. वे BJP नेता थे.
  • विजय गोयल: 1977 में DUSU अध्यक्ष के तौर पर काम किया और बाद में केंद्रीय राज्य मंत्री बने. वे BJP नेता हैं.
  • अजय माकन: 1985 में DUSU अध्यक्ष के तौर पर काम किया और बाद में केंद्रीय आवास और शहरी गरीबी उन्मूलन मंत्री रहे। वे कांग्रेस नेता हैं.
  • अलका लांबा: 1995 में DUSU अध्यक्ष के तौर पर काम किया और बाद में दिल्ली विधानसभा की MLA और महिला कांग्रेस की राष्ट्रीय अध्यक्ष बनीं. वे कांग्रेस नेता हैं.
  • राजीव गोस्वामी: 1991 में DUSU अध्यक्ष के तौर पर काम किया था. उन्होंने मंडल कमीशन के विरोध में आत्मदाह किया था. जो देशभर में चर्चा में रहे थे. 

रेखा गुप्ता भी रह चुकी हैं अध्यक्ष

दिल्ली की सीएम रेखा गुप्ता भी दिल्ली विश्वविद्यालय छात्र संघ की अध्यक्ष रही है. रेखा गुप्ता 1995-96 में सचिव के पद पर रही थी, जबकि 1996 से 97 के बीच अध्यक्ष रह चुकी है. दिल्ली विधानसभा के अध्यक्ष विजेंद्र गुप्ता, वर्तमान में मंत्री आशीष सूद भी यहां के अध्यक्ष रह चुके हैं. इनके अलावा नूपुर शर्मा, रागिनी नायक और सतीश उपाध्याय (विधायक) जैसे दर्जनों नाम हैं, जिन्होंने अपनी राजनीति की ककहरा इसी विश्वविद्यालय से सीखी और आज राष्ट्रीय टीवी डिबेट्स से लेकर संसद तक अपनी मौजूदगी दर्ज करा रहे हैं.

क्यों खास है दिल्ली विश्वविद्यालय की छात्र राजनीति 

दिल्ली विश्वविद्यालय की अहमियत इसलिए भी ज्यादा है क्योंकि DU में पढ़ने वाले छात्र किसी एक राज्य से नहीं अलग-अलग राज्यों से होते हैं. कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी और पूर्वोत्तर के राज्यों से भी छात्र यहां पढ़ने आते है. ऐसे में जब यहां कोई छात्र संघ का चुनाव लड़ता है, तो वह भारत की विविधता, जातिगत समीकरणों और क्षेत्रीय मुद्दों से सीधा जुड़ता है. राजनीति के छोटे बड़े सभी पहलू यहां देखने को मिलते हैं. यहां चुनाव जीतने के लिए एक छात्र नेता को उसी तरह का कूटनीतिक और सामाजिक संतुलन बनाना पड़ता है, सीधी भाषा में कहे तो एक लोकसभा और विधानसभा चुनाव में जो समीकरण बनते हैं, बिल्कुल वहीं समीकरण दिल्ली विश्वविद्यालय की राजनीति में दिखते हैं. ऐसे में यहां से निकलने वाला छात्र राजनेता सभी दांव पेंच जानता है. 

डीयू से छात्रों को मिलता है बड़ा मौका 

दिल्ली विश्वविद्यालय की अहमियत इसलिए भी ज्यादा है क्योंकि दिल्ली विश्वविद्यालय देश के लगभग हर राज्य के छात्रों का केंद्र है. यहां चुनाव जीतने वाला छात्र नेता सिर्फ कॉलेज कैंपस तक सीमित नहीं रहता, बल्कि उसे हजारों छात्रों के बीच नेतृत्व दिखाने का मौका मिलता है. भाषण, रणनीति, संगठन निर्माण, चुनाव प्रबंधन और जनसंपर्क जैसे राजनीतिक कौशल यहीं विकसित होते हैं. 

चुनावी रणनीति को करीब से समझने का मौका 

डूसू का चुनाव लोकसभा और विधानसभा के तर्ज पर ही होता है. जहां प्रत्याशियों को लाखों छात्रों के बीच प्रचार करना होता है, अलग-अलग कॉलेजों में जाना होता है. घोषणापत्र तैयार करना होता है. रैलियां निकालना होता है, राष्ट्रीय राजनीति के मुद्दे भी यहां हावी होते हैं. वहीं  बदलते दौर में अब प्रचार का आधुनिक तरीका भी अपनाना पड़ता है. यानि एक राजनेता को जो-जो करना होता है, वह डीयू के चुनाव में एक छात्र नेता को भी करने का मौका मिलता है. ऐसे में आप राजनीति की पहली सीढ़ी में ही वह सबकुछ सीख लेते हैं जो एक राजनेता लंबे समय में सीख पाता है. 

दिल्ली विश्वविद्यालय पढ़ाई के साथ-साथ देश के छात्रों को राजनीति में आने का पूरा मौका देता है. अगर यहां के किसी छात्र में काबिलियत है तो आप राजनीति में आगे जा सकते हैं, जिसमें डीयू आपकी पहली सीढ़ी बनता है. 

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