
Parivartini Ekadashi 2026: गणेश उत्सव में घर पर बप्पा विराजमान हों तो सुबह-शाम मोदक, लड्डू और दूसरे पकवानों का भोग लगाया जाता है. लेकिन इस बार गणेश उत्सव के बीच 22 सितंबर 2026 को परिवर्तिनी एकादशी पड़ रही है.
एकादशी पर चावल, गेहूं और दाल जैसे अनाज खाने की मनाही होती है. ऐसे में सवाल उठता है कि क्या उस दिन गणपति को सामान्य मोदक और अन्न का भोग लगाया जा सकता है? अगर भोग लगा दिया तो एकादशी का व्रत रखने वाला व्यक्ति उस प्रसाद का क्या करे?
इसका सीधा जवाब है कि भगवान गणेश की पूजा और भोग बंद करने की आवश्यकता नहीं है. हालांकि घर में कोई व्यक्ति परिवर्तिनी एकादशी का व्रत रख रहा है तो उस दिन बप्पा को फल, सूखे मेवे या बिना अनाज से बने मोदक का भोग लगाना सबसे सरल और विवाद से बचाने वाला तरीका होगा.
गणेश उत्सव के बीच कब पड़ेगी परिवर्तिनी एकादशी?
वर्ष 2026 में गणेश चतुर्थी 14 सितंबर को मनाई जाएगी. मुख्य गणेश विसर्जन 25 सितंबर को अनंत चतुर्दशी के दिन होगा. इस तरह दस दिन तक गणपति रखने वाले घरों और पंडालों में 22 सितंबर को बप्पा विराजमान रहेंगे.
पंचांग के अनुसार परिवर्तिनी एकादशी तिथि 21 सितंबर की रात लगभग 8 बजे शुरू होकर 22 सितंबर की रात 9:43 बजे तक रहेगी. उदया तिथि के कारण व्रत 22 सितंबर, मंगलवार को रखा जाएगा. पारण 23 सितंबर की सुबह किया जाएगा. स्थानीय पंचांग के अनुसार समय में कुछ मिनट का अंतर हो सकता है.
क्या बप्पा को सामान्य मोदक का भोग लगा सकते हैं?
मोदक कई प्रकार से बनाए जाते हैं. महाराष्ट्र में प्रचलित उकड़ीचे मोदक चावल के आटे से बनते हैं, जबकि कई घरों में गेहूं, मैदा, सूजी या बेसन का इस्तेमाल किया जाता है. ये सभी चीजें अनाज की श्रेणी में आती हैं और एकादशी का व्रत रखने वाला व्यक्ति इन्हें ग्रहण नहीं करता.
यहां एक बात समझना जरूरी है. एकादशी का आहार नियम मुख्य रूप से व्रती के लिए होता है. गणपति को भोग लगाने की अपनी पारिवारिक और स्थानीय परंपराएं हैं. इसलिए सामान्य मोदक का भोग लगाना अपने आप में गणेश पूजा की गलती नहीं कहा जा सकता. लेकिन वैष्णव परंपरा में एकादशी पर घर की रसोई में भी अनाज न बनाने और देवताओं को फलाहारी नैवेद्य चढ़ाने का नियम रखा जाता है.
दो अलग परंपराओं के कारण किसी एक नियम को सभी परिवारों पर लागू करना उचित नहीं होगा. जिस घर में एकादशी का कठोर व्रत रखा जाता है, वहां फलाहारी भोग चुनना बेहतर है. जहां गणपति को प्रतिदिन निश्चित नैवेद्य चढ़ाने की कुल परंपरा है, वहां परिवार के पुरोहित या गुरु द्वारा बताए नियम को प्राथमिकता दी जा सकती है.
एकादशी पर बप्पा को क्या भोग लगाएं?
गणपति को भोग लगाने के लिए अनाज का होना आवश्यक नहीं है. परिवर्तिनी एकादशी पर बप्पा को केला, सेब, अमरूद, नारियल, मखाना, दूध से बनी मिठाई या सूखे मेवों का भोग लगाया जा सकता है.
चाहें तो नारियल और मेवे से अनाज रहित मोदक तैयार किए जा सकते हैं. मावा, नारियल, बादाम, काजू और मिश्री से बने मोदक भी विकल्प हो सकते हैं. बाजार से व्रत वाला मोदक खरीदते समय उसकी सामग्री जरूर पढ़ें. कई बार ‘फलाहारी’ लिखे उत्पाद में मैदा, सूजी, कॉर्न फ्लोर या सामान्य नमक मिला हो सकता है.
साबूदाना, राजगिरा या सिंघाड़े के आटे से बने मोदक भी चढ़ाए जा सकते हैं, बशर्ते ये चीजें घर की व्रत परंपरा में मान्य हों. इस तरह गणपति का प्रिय मोदक भी बना रहेगा और एकादशी व्रत का नियम भी नहीं टूटेगा.
मोदक का प्रसाद व्रती ग्रहण कर सकता है?
यदि गणपति को चावल, गेहूं, सूजी, बेसन या मैदा से बना मोदक चढ़ाया गया है तो एकादशी का व्रत रखने वाले व्यक्ति को उसे उसी दिन नहीं खाना चाहिए. प्रसाद का अनादर भी न करें. उसे परिवार के उन सदस्यों में बांटा जा सकता है जो व्रत नहीं रख रहे हैं.
अगर घर के सभी सदस्य व्रत कर रहे हैं तो अन्नयुक्त प्रसाद को साफ और सुरक्षित स्थान पर रखकर द्वादशी के पारण के बाद ग्रहण किया जा सकता है. लेकिन दूध, मावा या जल्दी खराब होने वाले मोदक को अगले दिन तक रखने से बचें. ऐसी स्थिति में पहले से फलाहारी मोदक बनाना ज्यादा व्यावहारिक होगा.
प्रसाद होने का अर्थ यह नहीं है कि व्रत में वर्जित सामग्री स्वतः मान्य हो जाती है. श्रद्धा बनाए रखते हुए व्रत के संकल्प का पालन करना चाहिए.
पहले विष्णु पूजा करें या गणपति की?
पूजा का सामान्य नियम गणेश वंदना से आरंभ करने का है. इसलिए सुबह स्नान के बाद सबसे पहले गणपति को प्रणाम करें. उन्हें दूर्वा, फूल और फलाहारी भोग अर्पित करें. इसके बाद भगवान विष्णु या उनके वामन स्वरूप की पूजा करके परिवर्तिनी एकादशी व्रत का संकल्प लिया जा सकता है.
भगवान विष्णु को पीले फूल, तुलसी दल, फल और पंचामृत अर्पित करें. तुलसी एकादशी वाले दिन न तोड़ें. उसे एक दिन पहले तोड़कर साफ स्थान पर रख लेना चाहिए. शाम को पहले गणपति की आरती और फिर भगवान विष्णु की आरती की जा सकती है. घर की परंपरा अलग हो तो उसी क्रम का पालन करें.
भगवान विष्णु की ‘करवट’ से जुड़ी है यह एकादशी
परिवर्तिनी एकादशी को पार्श्व एकादशी, पद्मा एकादशी और वामन एकादशी भी कहा जाता है. धार्मिक मान्यता है कि चातुर्मास में योगनिद्रा में रहने वाले भगवान विष्णु इस दिन करवट बदलते हैं. इसी कारण इसका नाम परिवर्तिनी एकादशी पड़ा. इस दिन भगवान विष्णु के वामन स्वरूप की पूजा का भी विशेष महत्व माना गया है.
क्या है सबसे आसान समाधान?
अगर घर में गणपति विराजमान हैं और कोई सदस्य परिवर्तिनी एकादशी का व्रत रख रहा है तो बप्पा का भोग बंद न करें. केवल उस दिन सामान्य मोदक के स्थान पर फलाहारी मोदक, फल, नारियल या मेवे का भोग लगा दें.
अगर पारिवारिक परंपरा के कारण अन्नयुक्त मोदक चढ़ाना जरूरी है तो व्रती उसे एकादशी पर ग्रहण न करे. प्रसाद किसी गैर-व्रती को दिया जा सकता है या सुरक्षित होने की स्थिति में द्वादशी के पारण के बाद लिया जा सकता है. इस तरह गणपति की सेवा भी चलती रहेगी और परिवर्तिनी एकादशी का संकल्प भी सुरक्षित रहेगा.
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