
Janmashtami 2026: इस बार जन्माष्टमी की पूजा के दौरान ही अष्टमी तिथि समाप्त हो जाएगी. ऐसे में भक्तों के मन में सवाल है कि लड्डू गोपाल का अभिषेक, जन्म आरती और भोग रात 12 बजे करें या 12:13 बजे से पहले पूजा पूरी कर लें. जानिए सही क्रम.
जन्माष्टमी 4 सितंबर 2026 को मनाई जाएगी. घरों और मंदिरों में कान्हा के जन्म की तैयारियां शुरू हो चुकी हैं. लेकिन इस बार पंचांग के समय ने भक्तों के सामने एक नया सवाल खड़ा कर दिया है.
अष्टमी तिथि 4 सितंबर को तड़के 2 बजकर 25 मिनट पर शुरू होगी और 5 सितंबर को रात 12 बजकर 13 मिनट पर समाप्त हो जाएगी. वहीं, दिल्ली में निशीथ काल की पूजा रात 11 बजकर 57 मिनट से 12 बजकर 43 मिनट तक बताई गई है.
यानी निशीथ पूजा का मुहूर्त जारी रहेगा, लेकिन उसके बीच में ही अष्टमी तिथि खत्म हो जाएगी. ऐसे में कान्हा की जन्म आरती कब करें?
रात 12 बजे ही करें कान्हा की जन्म आरती
घर में जन्माष्टमी मना रहे भक्त रात 11:57 बजे पूजा शुरू कर सकते हैं. इसके बाद रात 12 बजे कान्हा का जन्मोत्सव मनाएं. इसी समय शंख और घंटी बजाकर लड्डू गोपाल की आरती करें.
चूंकि अष्टमी तिथि रात 12:13 बजे तक रहेगी, इसलिए रात 12 बजे की गई जन्म आरती अष्टमी तिथि के भीतर ही होगी. भक्तों को 12:13 बजे तक इंतजार करने की जरूरत नहीं है.
इस्कॉन गुरुग्राम की ओर से जारी जन्माष्टमी कार्यक्रम में भी महाभिषेक रात 11 बजे और महाआरती रात 12 बजे रखी गई है. इससे साफ है कि जन्म आरती का मुख्य समय मध्यरात्रि ही माना गया है.
अभिषेक आरती से पहले करें या बाद में?
अगर आप घर पर लड्डू गोपाल की पूजा कर रहे हैं तो अभिषेक की तैयारी पहले पूरी कर लें. रात 11:57 बजे पूजा शुरू करें. इसके बाद दूध, दही, घी, शहद और गंगाजल से कान्हा का अभिषेक किया जा सकता है.
अभिषेक लंबा होने की स्थिति में इसे रात 11:45 बजे के आसपास शुरू कर सकते हैं. रात 12 बजे कान्हा को नए वस्त्र पहनाकर झूले में बैठाएं. इसके बाद जन्म आरती करें और माखन-मिश्री, पंजीरी या घर में तैयार सात्विक मिठाई का भोग लगाएं.
पूजा का आसान क्रम इस प्रकार रखा जा सकता है:
- रात 11:45 बजे अभिषेक शुरू करें.
- रात 11:55 बजे लड्डू गोपाल को वस्त्र और आभूषण पहनाएं.
- रात 12 बजे शंख बजाकर जन्मोत्सव मनाएं.
- इसके बाद जन्म आरती करें.
- रात 12:13 बजे से पहले भोग और पुष्प अर्पित कर दें.
- मंत्र जाप और भजन निशीथ काल समाप्त होने तक किए जा सकते हैं.
क्या 12:13 बजे के बाद पूजा नहीं कर सकते?
रात 12:13 बजे अष्टमी तिथि समाप्त होने का अर्थ यह नहीं है कि उसी समय पूजा रोकनी होगी. निशीथ पूजा का समय रात 12:43 बजे तक रहेगा. जन्म आरती, भोग और मुख्य पूजन अष्टमी के भीतर करना बेहतर होगा. इसके बाद भक्त भजन, नाम-जप और आरती जारी रख सकते हैं.
दिल्ली NCR के लिए पंचांग अनुसार निशीथ पूजा रात 11:57 से 12:43 बजे तक और अष्टमी की समाप्ति रात 12:13 बजे दी गई है. वैदिक मध्यरात्रि का क्षण रात 12:08 बजे बताया गया है. इस हिसाब से रात 12:08 बजे भी जन्म आरती की जा सकती है और उस समय अष्टमी तिथि मौजूद रहेगी.
हालांकि, ज्यादातर घरों और मंदिरों में घड़ी के अनुसार रात 12 बजे ही कान्हा का जन्मोत्सव मनाने की परंपरा है. इसलिए घर की परंपरा का पालन करते हुए रात 12 बजे आरती करना पूरी तरह उचित रहेगा.
जन्म के बाद ही खोल दें व्रत?
जन्म आरती के बाद तुरंत अन्न ग्रहण करना सभी परंपराओं में सही नहीं माना जाता. कुछ परिवार रात 12 बजे कान्हा के जन्म के बाद चरणामृत और फलाहार लेकर व्रत खोलते हैं. वहीं, धर्मशास्त्रीय विधि से व्रत रखने वाले भक्त अगले दिन निर्धारित पारण समय पर व्रत पूरा करते हैं.
इस्कॉन दिल्ली ने 4 सितंबर को जन्माष्टमी मनाने और मध्यरात्रि तक उपवास रखने की जानकारी दी है. इसलिए व्रत का पारण अपनी पारिवारिक परंपरा, संप्रदाय और स्थानीय मंदिर के निर्देश के अनुसार करें.
शहर बदलते ही बदल जाएगा समय
ऊपर दिए गए पूजा समय दिल्ली और एनसीआर के अनुसार हैं. निशीथ काल स्थानीय सूर्यास्त और सूर्योदय के आधार पर निकाला जाता है. इसलिए मुंबई, कोलकाता, चेन्नई, जयपुर या दूसरे शहरों में पूजा के समय में कुछ मिनट का अंतर हो सकता है.
अपने शहर का पंचांग देखे बिना दिल्ली का समय इस्तेमाल न करें. स्थानीय मंदिर या मान्य पंचांग से समय मिलाना बेहतर रहेगा.
सीधा जवाब यही है कि जन्माष्टमी की मुख्य आरती 4 सितंबर की रात 12 बजे करें. वैदिक मध्यरात्रि मानने वाले भक्त इसे रात 12:08 बजे कर सकते हैं. दोनों समय अष्टमी तिथि मौजूद रहेगी. मुख्य भोग और पूजा रात 12:13 बजे से पहले पूरी कर लें. इसके बाद निशीथ काल में भजन और नाम-जप जारी रखा जा सकता है.
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